/* ######## Share widget Css by RSharma Design ######################### */ .share-box { position: relative; padding: 10px; } .share-title { color: #010101; display: inwhe-block; padding-bottom: 7px; font-size: 15px; font-weight: 500; position: relative; top: 2px; float: left; padding-right: 10px; } .share-art { float: left; padding: 0; padding-top: 0; font-size: 13px; font-weight: 400; text-transform: capitalize; } .share-art a { color: #fff; padding: 5px 10px; margin-left: 4px; border-radius: 2px; display: inwhe-block; margin-right: 0; background: #010101; } .share-art i {color:#fff;} .share-art a:hover{color:#fff} .share-art .fac-imh-art{background:#3b5998} .share-art .fac-imh-art:hover{background:rgba(49,77,145,0.7)} .share-art .twi-imh-art{background:#00acee} .share-art .twi-imh-art:hover{background:rgba(7,190,237,0.7)} .share-art .goo-imh-art{background:#db4a39} .share-art .goo-imh-art:hover{background:rgba(221,75,56,0.7)} .share-art .pin-imh-art{background:#CA2127} .share-art .pin-imh-art:hover{background:rgba(202,33,39,0.7)} .share-art .wh-imh-art{background:#06A400} .share-art .wh-imh-art:hover{background:rgba(0,119,181,0.7)} .share-box .post-author { float: right; } .share-box .post-author i { font-family: Montserrat; font-weight: 700; font-style: normal; letter-spacing: 1px; } .sora-author-box { border: 1px solid #f2f2f2; background: #f8f8f8; overflow: hidden; padding: 10px; margin: 10px 0; } .sora-author-box img { float: left; margin-right: 10px; border-radius: 50%; } .sora-author-box p { padding: 10px; } .sora-author-box b { font-family: Montserrat; font-weight: 700; font-style: normal; letter-spacing: 1px; font-size: 20px;

गुरुवार, 10 अक्टूबर 2019

रावण महान कहने वाले महामूर्ख !

रावण महान था ! मूर्खता, माननीय रावण जी की सबसे बड़ी महानता बतायी जाती है कि उन्होंने सीता का अपहरण किया किन्तु इतने संयमी थे कि उनकी इच्छा के बिना उनका स्पर्श नहीं किया । अब इस मूर्ख बुद्धि को क्या कहा जाए समझ से परे की बात है | उनकी इच्छा के बिना स्पर्श नही करना चाहता था तो बाँहों में दबाकर घसीटता हुआ अपहरण कैसे किया ? एक स्त्री की इच्छा के बिना उसका स्पर्श नहीं करना चाहता था किन्तु उसकी इच्छा के बिना उसके घर से अपहरण कर के बंदी जरूर बना लिया था | अरे उसने एक वर्ष का समय दिया था, मानसिक रूप से तोड़कर सदैव के लिए अपनी दासी बना कर रखना चाहता था | वो ये भी नही चाहता रहा होगा कि एक छोटी सी गलती के लिए यह आत्महत्या कर ले और सारा प्रयास बेकार जाए | अब आदरणीय रावण जी के संयम का उदहारण देखिये - बह्वीनामुत्तंस्त्रीणामाह्रितानामितस्तः सर्वासामेव भद्रं ते ममाग्र महिषी भव मैं इधर उधर से बहुत सी सुन्दर स्त्रियों को हर लाया हूँ | उन सबमें तुम मेरी पटरानी बनो | ( रावण देवी सीता से ) - अरण्य काण्ड ४७वाँ सर्ग धर्म की वह जड ही काट देता था और पराई स्त्रियों के सतीत्व का नाश करने वाला था -अरण्यकांड ३२वां सर्ग , सीता के अलावा जिन हजारों औरतों को हर के लाया उन्हें क्यों नही अशोक वाटिका में रखा ? क्या वे सभी अपहृत नाग ,देव गन्धर्व, किन्नर, मानव, असुर आदि जातियों की औरतों उसके साथ सोने के लिए स्वेच्छा से तैयार थीं ? जिस रावण को आज के चपड़गंजू महान बताते हैं उसके भय से तीनों लोकों की स्त्रियाँ त्रस्त थीं | मनुष्य तो मनुष्य देवता, यक्ष , गन्धर्व , असुर आदि की स्त्रियों की भी खैर नहीं थी | रावण के लम्पटता की कहानी ये है कि पहले वो शूर्पणखा की नाक का बदला लेने के लिए तैयार नहीं होता है किन्तु जब शूर्पनखा एक प्रोफेशनल दल्ले की तरह उसके सामने वन में आई हुई राजकुमारी के अंग प्रत्यंगों का कामुक वर्णन करती है तो वो देवी सीता के हरण के लिए तुरंत तैयार हो जाता है | ( अरण्य ३४ ) उसकी दुष्टता की कुछ झलकियाँ देखिये - समाप्ति के निकट पहुँचने वाले यज्ञों को विध्वंश करने वाला ब्राम्हणों की हत्या तथा दुसरे क्रूर कर्म करता था | - अरण्यकांड ३२वां सर्ग , वह इतना उद्दंड हो गया है कि ऋषियों,यक्षों, गन्धर्वों असुरों तथा ब्राम्हणों को पीड़ा देता है उनका अपमान करता है | वह मूर्ख रावण अपने बढे हुए पराक्रम से देवता गन्धर्व तथा ऋषियों को अत्यंत कष्ट दे रहा है | उस रौद्र निशाचर ने ऋषियों तथा अप्सराओं को भी पतित कर दिया है | - बालकाण्ड, पंचदश सर्ग, श्लोक ९,२२,२३ वह तीनों लोकों को पीड़ा देता है और स्त्रियों का भी अपहरण कर लेता है - बालकाण्ड, षोडश सर्ग , श्लोक ७ वह निशाचर तीनों लोकों के निवाशियों को भयंकर कष्ट दे रहा है | बालकाण्ड, बीसवां सर्ग श्लोग १७ श्रीराम ! इस वन में रहने वालले वानप्रस्थ महात्माओं का समुदाय, जिसमे अधिकांश ब्राम्हण हैं तथा जिनके रक्षक आप ही हैं उन्हें राक्षसों द्वारा अनाथ की तरह मारा जा रहा है | आईये देखिये, ये राक्षसों द्वारा मारे गये बहुसंख्यक पुण्यात्मा मुनियों के कंकालों के ढेर दिखाई दे रहे हैं | पाम्पा सरोवर और उसके निकट बहाने वाली तुंगभद्रा नदी के तट पर जिनका निवास है, जो मन्दाकिनी के किनारे रहते हैं तथा जिन्होंने चित्रकूट को अपना निवास बना लिया है उन सभी ऋषियों महर्षियों का राक्षसों द्वारा भयंकर संहार किया जा रहा है | -अरण्य काण्ड सप्तम सर्ग रावण के रूप में सम्पूर्ण दुष्टतायें मूर्त हो गयीं थीं इसलिए लाखों साल से हिन्दू रावण और बुराई को पर्यायवाची मानते आये हैं किन्तु आज बुद्धि भ्रष्ट नीचों को प्रभु श्रीराम के निर्मल चरित्र के स्थान पर रावण अधिक प्रेरणास्पद लगता है | फिर भी रावण महान लगे किसीको तो ,,🙏

रविवार, 29 सितंबर 2019

पाशुपतास्त्र

पाशुपतास्त्र स्तोत्रम इस पाशुपत स्तोत्र का मात्र एक बार जप करने पर ही मनुष्य समस्त विघ्नों का नाश कर सकता है । सौ बार जप करने पर समस्त उत्पातो को नष्ट कर सकता है तथा युद्ध आदि में विजय प्राप्त के सकता है । इस मंत्र का घी और गुग्गल से हवं करने से मनुष्य असाध्य कार्यो को पूर्ण कर सकता है । इस पाशुपातास्त्र मंत्र के पाठ मात्र से समस्त क्लेशो की शांति हो जाती है । स्तोत्रम ॐ नमो भगवते महापाशुपतायातुलबलवीर्यपराक्रमाय त्रिपन्चनयनाय नानारुपाय नानाप्रहरणोद्यताय सर्वांगडरक्ताय भिन्नांजनचयप्रख्याय श्मशान वेतालप्रियाय सर्वविघ्ननिकृन्तन रताय सर्वसिध्दिप्रदाय भक्तानुकम्पिने असंख्यवक्त्रभुजपादाय तस्मिन् सिध्दाय वेतालवित्रासिने शाकिनीक्षोभ जनकाय व्याधिनिग्रहकारिणे पापभन्जनाय सूर्यसोमाग्नित्राय विष्णु कवचाय खडगवज्रहस्ताय यमदण्डवरुणपाशाय रूद्रशूलाय ज्वलज्जिह्राय सर्वरोगविद्रावणाय ग्रहनिग्रहकारिणे दुष्टनागक्षय कारिणे । ॐ कृष्णपिंग्डलाय फट । हूंकारास्त्राय फट । वज्र हस्ताय फट । शक्तये फट । दण्डाय फट । यमाय फट । खडगाय फट । नैऋताय फट । वरुणाय फट । वज्राय फट । पाशाय फट । ध्वजाय फट । अंकुशाय फट । गदायै फट । कुबेराय फट । त्रिशूलाय फट । मुदगराय फट । चक्राय फट । पद्माय फट । नागास्त्राय फट । ईशानाय फट । खेटकास्त्राय फट । मुण्डाय फट । मुण्डास्त्राय फट । काड्कालास्त्राय फट । पिच्छिकास्त्राय फट । क्षुरिकास्त्राय फट । ब्रह्मास्त्राय फट । शक्त्यस्त्राय फट । गणास्त्राय फट । सिध्दास्त्राय फट । पिलिपिच्छास्त्राय फट । गंधर्वास्त्राय फट । पूर्वास्त्रायै फट । दक्षिणास्त्राय फट । वामास्त्राय फट । पश्चिमास्त्राय फट । मंत्रास्त्राय फट । शाकिन्यास्त्राय फट । योगिन्यस्त्राय फट । दण्डास्त्राय फट । महादण्डास्त्राय फट । नमोअस्त्राय फट । शिवास्त्राय फट । ईशानास्त्राय फट । पुरुषास्त्राय फट । अघोरास्त्राय फट । सद्योजातास्त्राय फट । हृदयास्त्राय फट । महास्त्राय फट । गरुडास्त्राय फट । राक्षसास्त्राय फट । दानवास्त्राय फट । क्षौ नरसिन्हास्त्राय फट । त्वष्ट्रास्त्राय फट । सर्वास्त्राय फट । नः फट । वः फट । पः फट । फः फट । मः फट । श्रीः फट । पेः फट । भूः फट । भुवः फट । स्वः फट । महः फट । जनः फट । तपः फट । सत्यं फट । सर्वलोक फट । सर्वपाताल फट । सर्वतत्व फट । सर्वप्राण फट । सर्वनाड़ी फट । सर्वकारण फट । सर्वदेव फट । ह्रीं फट । श्रीं फट । डूं फट । स्त्रुं फट । स्वां फट । लां फट । वैराग्याय फट । मायास्त्राय फट । कामास्त्राय फट । क्षेत्रपालास्त्राय फट । हुंकरास्त्राय फट । भास्करास्त्राय फट । चंद्रास्त्राय फट । विघ्नेश्वरास्त्राय फट । गौः गां फट । स्त्रों स्त्रौं फट । हौं हों फट । भ्रामय भ्रामय फट । संतापय संतापय फट । छादय छादय फट । उन्मूलय उन्मूलय फट । त्रासय त्रासय फट । संजीवय संजीवय फट । विद्रावय विद्रावय फट । सर्वदुरितं नाशय नाशय फट ।

सोमवार, 18 मार्च 2019

हनुमत् ताण्डव...स्तोत्र

श्री हनुमत्ताण्डव स्तोत्रम् ॥ वन्दे सिन्दूरवर्णाभं लोहिताम्बरभूषितम् । रक्ताङ्गरागशोभाढ्यं शोणापुच्छं कपीश्वरम्॥ भजे समीरनन्दनं, सुभक्तचित्तरञ्जनं, दिनेशरूपभक्षकं, समस्तभक्तरक्षकम् । सुकण्ठकार्यसाधकं, विपक्षपक्षबाधकं, समुद्रपारगामिनं, नमामि सिद्धकामिनम् ॥ १॥ सुशङ्कितं सुकण्ठभुक्तवान् हि यो हितं वचस्त्वमाशु धैर्य्यमाश्रयात्र वो भयं कदापि न । इति प्लवङ्गनाथभाषितं निशम्य वानराऽधिनाथ आप शं तदा, स रामदूत आश्रयः ॥ २॥ सुदीर्घबाहुलोचनेन, पुच्छगुच्छशोभिना, भुजद्वयेन सोदरीं निजांसयुग्ममास्थितौ कृतौ हि कोसलाधिपौ, कपीशराजसन्निधौ, विदहजेशलक्ष्मणौ, स मे शिवं करोत्वरम् ॥ ३॥ सुशब्दशास्त्रपारगं, विलोक्य रामचन्द्रमाः, कपीश नाथसेवकं, समस्तनीतिमार्गगम् । प्रशस्य लक्ष्मणं प्रति, प्रलम्बबाहुभूषितः कपीन्द्रसख्यमाकरोत्, स्वकार्यसाधकः प्रभुः ॥ ४॥ प्रचण्डवेगधारिणं, नगेन्द्रगर्वहारिणं, फणीशमातृगर्वहृद्दृशास्यवासनाशकृत् । विभीषणेन सख्यकृद्विदेह जातितापहृत्, सुकण्ठकार्यसाधकं, नमामि यातुधतकम् ॥ ५॥ नमामि पुष्पमौलिनं, सुवर्णवर्णधारिणं गदायुधेन भूषितं, किरीटकुण्डलान्वितम् । सुपुच्छगुच्छतुच्छलङ्कदाहकं सुनायकं विपक्षपक्षराक्षसेन्द्र-सर्ववंशनाशकम् ॥ ६॥ रघूत्तमस्य सेवकं नमामि लक्ष्मणप्रियं दिनेशवंशभूषणस्य मुद्रीकाप्रदर्शकम् । विदेहजातिशोकतापहारिणम् प्रहारिणम् सुसूक्ष्मरूपधारिणं नमामि दीर्घरूपिणम् ॥ ७॥ नभस्वदात्मजेन भास्वता त्वया कृता महासहा यता यया द्वयोर्हितं ह्यभूत्स्वकृत्यतः । सुकण्ठ आप तारकां रघूत्तमो विदेहजां निपात्य वालिनं प्रभुस्ततो दशाननं खलम् ॥ ८॥ इमं स्तवं कुजेऽह्नि यः पठेत्सुचेतसा नरः कपीशनाथसेवको भुनक्तिसर्वसम्पदः प्लवङ्गराजसत्कृपाकताक्षभाजनस्सदा न शत्रुतो भयं भवेत्कदापि तस्य नुस्त्विह ॥ ९॥नेत्राङ्गनन्दधरणीवत्सरेऽनङ्गवासरे । लोकेश्वराख्यभट्टेन हनुमत्ताण्डवं कृतम् ॥ १०॥ इति श्री हनुमत्ताण्डव स्तोत्रम्॥

शुक्रवार, 14 दिसंबर 2018

क्या गुरु जिस भाव मैं बैठता है, उस भाव की हानि करता..! नहीं

आज एक जन्म पत्रिका देख रहा था, जो क्षेत्र के प्रसिद्ध ज्योतिषी द्वारा बनाई गई थी, उन्होंने, मीन लग्न की कुंडली में लग्न में ही बैठा हुआ अकेला बृहस्पति, का फलादेश करते हुए उसे लग्न क्षय करने वाला ही बता दिया,और कैप्सन में लिखा,(स्थान हानि करो जीव:स्थानवृद्धि करो शनि:) ,,, , , जबकि यह अर्धश्लोक है, पूरा श्लोक है, "जीव क्षेत्रे यदा शनि:,शनि क्षेत्रे यदा जीव:, स्थान हानि करो जीव:स्थानवृद्धि करो शनि: || अर्थात गुरु के क्षेत्र में शनि हो और शनि के क्षेत्र में गुरु हो,, तब गुरु उस स्थान की हानि करता है और शनि फल वृद्धि... इसलिए ध्यान रखें, हर जगह गुरु हानिकारक नहीं और हर जगह शनि की स्थिति उस भाव के लिए वृद्धिकारक नहीं होती...

शनिवार, 11 अगस्त 2018

गुरुत्वाकर्षण.

सेक्युलर संस्कृत से क्यों डरते हैं ?

आज हमें पढ़ाया जाता है कि गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त न्यूटन (1642
-1726) ने दिया.

 यदि विद्यार्थी संस्कृत पढेंगे तो जान जाएंगे कि
यह झूठ है.
---
प्राचीन भारत के एक प्रसिद्ध गणितज्ञ भास्कराचार्य (1114 –
1185) के द्वारा रचित एक मुख्य ग्रन्थ *सिद्धान्त शिरोमणि* है हैं।
भास्कराचार्य ने अपने सिद्धान्तशिरोमणि में यह कहा है-
.
*आकृष्टिशक्तिश्चमहि तया यत् खस्थं गुरूं स्वाभिमुखं स्वशक्त्या ।*
*आकृष्यते तत् पततीव भाति समे समन्तात् क्व पतत्वियं खे ।।*
– सिद्धान्त० भुवन० १६
.
अर्थात – पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है जिसके कारण वह ऊपर
की भारी वस्तु को अपनी ओर खींच लेती है । वह वस्तु पृथ्वी पर
गिरती हुई सी लगती है । पृथ्वी स्वयं सूर्य आदि के आकर्षण से रुकी हुई है,अतः वह निराधार आकाश में स्थित है तथा अपने स्थान से हटती नहीं
है और न गिरती है । वह अपनी कील पर घूमती है।
-------------------

वराहमिहिर ( 57 BC ) ने अपने ग्रन्थ *पञ्चसिद्धान्तिका*में कहा है-
.
*पंचभमहाभूतमयस्तारा गण पंजरे महीगोलः।*
*खेयस्कान्तान्तःस्थो लोह इवावस्थितो वृत्तः ।।*
– पञ्चसिद्धान्तिका पृ०३१
.
अर्थात- तारासमूहरूपी पंजर में गोल पृथ्वी इसी प्रकार रुकी हुई है जैसे दो बड़े चुम्बकों के बीच में लोहा ।
--------------------
अपने ग्रन्थ सिद्धान्तशेखर में आचार्य श्रीपति ने कहा है –

*उष्णत्वमर्कशिखिनोः शिशिरत्वमिन्दौ,.. निर्हतुरेवमवनेःस्थितिरन्तरिक्षे ।।*
– सिद्धान्तशेखर १५/२१ )

नभस्ययस्कान्तमहामणीनां मध्ये स्थितो लोहगुणो यथास्ते ।
आधारशून्यो पि तथैव सर्वधारो धरित्र्या ध्रुवमेव गोलः ।।
–सिद्धान्तशेखर १५/२२

अर्थात -पृथ्वी की अन्तरिक्ष में स्थिति उसी प्रकार स्वाभाविक है, जैसे सूर्य्य में गर्मी, चन्द्र में शीतलता और वायु में गतिशीलता । दो बड़े चुम्बकों nके बीच में लोहे का गोला स्थिर रहता है, उसी प्रकार पृथ्वी भी अपनी धुरी पर रुकी हुई है ।

ऐसे अनेकों प्रामाणिक उदाहरण हैं परन्तु भारतीयों की भारतीयता के तन्द्रावस्था में लीन होने के कारण प्राचीन भारतीय विज्ञान के स्रोत विलुप्त प्रायः हैं ।

आओ ज्ञान बढ़ाये