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बुधवार, 22 नवंबर 2017

केमुद्रम योग

केमुद्रम योग-  ( जिस समय यह योग प्रभावी हो व चन्द्रमा                           कमजोर पड़े )

नारद पुराण,  व अन्य प्राचीन ग्रंथों में  इसका उल्लेख है(अाप बेहिचक मुझसे प्रमाण मांग सकते हैं )


किसी कुण्डली में चन्द्रमा से द्वितीय एंव द्वादश स्थान मे जब कोई ग्रह स्थित न हो तो केमुद्रम नाम का दरिद्रतादायक योग बनता है। जब चन्द्रमा किसी ग्रह से युत व दृष्ट न हो और अगले एंव पिछले केन्द्रों में कोई ग्रह स्थित न हो तो भी केमुद्रम नाम के योग का निर्माण होता है।
कारण-
चन्द्रमा जॅहा पर बैठा होता है, उसे चन्द्र लग्न कहते है। धन प्राप्ति में अन्य लग्नों की भाॅति चन्द्र लग्न का विशेष महत्व है। चन्द्र के विषय में यह सिद्धान्त मौलिक रूप से समझ लेना चाहिए कि यदि चन्द्र किसी भी ग्रह के प्रभाव में न हो तो वह निर्बल समझा जाना चाहिए और निर्बल चन्द्र का अर्थ है लग्न का निर्बल होना अर्थात मनुष्य का धन, स्वास्थ्य, यश, बल आदि से वर्जित होना।
सरावली ग्रन्थ में कहा गया है-
कान्तान्नपानगुहवस्त्रसुह्रद्विहीनो,
दारिद्रयदुः खगददैन्यमलैरूपेतः।
प्रेष्यः खलः सकललोकविरूद्धवृतिः,
केमुद्रमे भवति पार्थिववंशजोपि।।
अर्थात यदि कुण्डली में केमुद्रम योग हो तो स्त्री-पुरूष अन्न, पान, गृह, वस्त्र व बन्धुजनों से विहीन होकर दरिद्रता, दुःख, रोग, परतन्त्रता से युक्त, दूसरों से द्वेष करने वाला, दुष्ट एंव दूसरें लोगों का अनिष्ट करने वाला होता है।

बृहत्पाराशर में है   
यह योग नारद पुराण में भी वर्णित है ।


यदि यह योग किसी कुंडली मेॆ मिले तो , अग्निपुराणोक्त महामृत्यंजय, १२५००० , नित्य दशांश हवन , तथा श्री यंत्रार्चन , किशमिस द्वारा खुद करें अथवा किसी  श्रीविद्या साधक द्वारा करायें .  ..  ... .   जय महाकाल ..

रविवार, 29 अक्टूबर 2017

महाभैरवाष्टकम्


 
भैरवाष्टकम् ॥
ॐ यं यं यं यक्षरूपं दशदिशिविदितं भूमिकम्पायमानं सं सं संहारमूर्तिं शिरमुकुटजटा शेखरंचन्द्रबिम्बम् । दं दं दं दीर्घकायं विक्रितनख मुखं चोर्ध्वरोमं करालं पं पं पं पापनाशं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालम् ॥ १॥ रं रं रं रक्तवर्णं, कटिकटिततनुं तीक्ष्णदंष्ट्राकरालं घं घं घं घोष घोषं घ घ घ घ घटितं घर्झरं घोरनादम् । कं कं कं कालपाशं द्रुक् द्रुक् दृढितं ज्वालितं कामदाहं तं तं तं दिव्यदेहं, प्रणामत सततं, भैरवं क्षेत्रपालम् ॥ २॥ लं लं लं लं वदन्तं ल ल ल ल ललितं दीर्घ जिह्वा करालं धूं धूं धूं धूम्रवर्णं स्फुट विकटमुखं भास्करं भीमरूपम् । रुं रुं रुं रूण्डमालं, रवितमनियतं ताम्रनेत्रं करालम् नं नं नं नग्नभूषं , प्रणमत सततं, भैरवं क्षेत्रपालम् ॥ ३॥ वं वं वायुवेगं नतजनसदयं ब्रह्मसारं परन्तं खं खं खड्गहस्तं त्रिभुवनविलयं भास्करं भीमरूपम् । चं चं चलित्वाऽचल चल चलिता चालितं भूमिचक्रं मं मं मायि रूपं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालम् ॥ ४॥ शं शं शं शङ्खहस्तं, शशिकरधवलं, मोक्ष सम्पूर्ण तेजं मं मं मं मं महान्तं, कुलमकुलकुलं मन्त्रगुप्तं सुनित्यम् । यं यं यं भूतनाथं, किलिकिलिकिलितं बालकेलिप्रदहानं आं आं आं आन्तरिक्षं , प्रणमत सततं, भैरवं क्षेत्रपालम् ॥ ५॥ खं खं खं खड्गभेदं, विषममृतमयं कालकालं करालं क्षं क्षं क्षं क्षिप्रवेगं, दहदहदहनं, तप्तसन्दीप्यमानम् । हौं हौं हौंकारनादं, प्रकटितगहनं गर्जितैर्भूमिकम्पं बं बं बं बाललीलं, प्रणमत सततं, भैरवं क्षेत्रपालम् ॥ ६॥ var वं वं वं वाललीलं सं सं सं सिद्धियोगं, सकलगुणमखं, देवदेवं प्रसन्नं पं पं पं पद्मनाभं, हरिहरमयनं चन्द्रसूर्याग्नि नेत्रम् । ऐं ऐं ऐं ऐश्वर्यनाथं, सततभयहरं, पूर्वदेवस्वरूपं रौं रौं रौं रौद्ररूपं, प्रणमत सततं, भैरवं क्षेत्रपालम् ॥ ७॥ हं हं हं हंसयानं, हसितकलहकं, मुक्तयोगाट्टहासं, ? धं धं धं नेत्ररूपं, शिरमुकुटजटाबन्ध बन्धाग्रहस्तम् । तं तं तंकानादं, त्रिदशलटलटं, कामगर्वापहारं, ?? भ्रुं भ्रुं भ्रुं भूतनाथं, प्रणमत सततं, भैरवं क्षेत्रपालम् ॥ ८॥ इति महाकालभैरवाष्टकं सम्पूर्णम् । नमो भूतनाथं नमो प्रेतनाथं नमः कालकालं नमः रुद्रमालम् । नमः कालिकाप्रेमलोलं करालं नमो भैरवं काशिकाक्षेत्रपालम् ॥ <iframe style="width:120px;height:240px;" marginwidth="0" marginheight="0" scrolling="no" frameborder="0" src="//ws-in.amazon-adsystem.com/widgets/q?ServiceVersion=20070822&OneJS=1&Operation=GetAdHtml&MarketPlace=IN&source=ac&ref=qf_sp_asin_til&ad_type=product_link&tracking_id=madhavji-21&marketplace=amazon&region=IN&placement=B06XZVQXGN&asins=B06XZVQXGN&linkId=029d2ea80edd01971d9af37ee1a248fd&show_border=false&link_opens_in_new_window=false&price_color=333333&title_color=0066C0&bg_color=FFFFFF"> </iframe>

गुरुवार, 7 सितंबर 2017

मंगलदोष परिहार

मंगलिक दोष का परिहार ---

 लग्ने व्यये च पाताले यामित्रे चाष्टमे कुजे .                                                  कन्या भर्तु विनाशाय भर्तु कन्या विनाशकृत ॥(मंगल दोष)


 अंजे लग्ने व्यये चापे पाताले वृश्चिके कुजे।                                                                 वृषे जाए घटे रन्ध्रे भौमदोषो न विद्यते॥ 
मेष का मंगल लग्न मे, धनु का द्वादश भाव मे वृश्चिक का चौथे भाव मे,वृष का सप्तम मे कुम्भ का आठवे भाव मे हो तो भौम दोष नही रहता ॥

अर्केन्दु क्षेत्रजातां कुज दोषो न विद्यते ।                                                         
 स्वोच्चमित्रभ जातानां तद् दोषो न विद्यते ॥

सिंह लग्न और कर्क लग्न मे भी लग्नस्थ मंगल का दोष नही होता है\

नीचस्थो रिपुराशिस्थः खेटो भाव विनाशकः ।                                                              
मूलस्वतुंगा मित्रस्था भावबृद्धि करोत्यलमः ॥

कुंडली मे मंगल यदि सिंह,धनु,मीन मे हो तो भौम दोष नही रहता है                                                                       शनि भौमोथवा कश्चित्पापो वा तादृशो भवेत् ।                                                         
तेष्वेव भवनेष्वेव भौम दोष विनाशकृत ॥

शनि मंगल या कोई भी पाप ग्रह जैसे राहु,सूर्य,केतु अगर मंगलिक भावो(1,4,7,8,12)मे कन्या कि कुंडली हो और उन्ही भावो मे वर के भी हो तो भौम दोषनष्ट होता है ।यानि यदि एक कुंडली मे मांगलिक स्थान मे मंगल हो तथा दूसरे की मे इन्ही स्थानो मे शनि,सूर्य,मंगल,राहु,केतु मे से कोई एक ग्रह हो तो उअस दोष को काटता है।
केन्द्रे कोणे शुभाढ्याश्चते् च त्रिषडा़येप्य सद्ग्रहाः ।                                                                    तदा भौमस्य दोषो न मदने मदपस्तथा ॥ 
          
 यानी 3,6,11वे भावो मे अशुभ ग्रह हो और केन्द्र (1,4,7,10)व त्रिकोण (5,9) मे शुभ ग्रह हो,सप्तमेष सातवे भाव मे हो तो मंगल दोष नही रहता है ।

 वाचस्पतौ नवपंच केन्द्र संस्थे जातांगना भवति पूर्णविभूतियुक्ता ।                                  
  साध्वी सुपुत्रजननी सुखिनीगुढ्यां सप्ताष्टके यदि भवेदशुभ ग्रहोपि ॥

 कन्या की कुंडली मे गुरू यदि केन्द्र या त्रिकोण मे हो तो मांगलिक दोष नही लगता अपितु उसके सुख-सौभाग्य को बढाने वाला होता है ।  त्रिषट्‍ एकादशे राहु त्रिषड़कादशे शनिः। त्रिषड़कादशे भौमः सर्वदोष विनाशकृतः॥
यदि एक कुंडली मे मांगलिक योग हो और दूसरे कि कुंडली के (3,6,11)वे भाव मे से किसी भाव मे राहु ,मंगल या शनि मे से कोई ग्रह हो तो मांगलिक दोष नष्ट हो जाता है । 

द्वितीय भौमदोषस्तु कन्यामिथुन योर्विना,                                                                चतुर्थ कुजदोषःस्याद्‍ तुलाबृषभयोर्विना।                                                          अष्टमो भौमदोषस्तु धनु मीनद्व योर्विना,                                                                                 व्यये तु कुजदोषःस्याद् कन्यामिथुन योर्विना॥ 

द्वितीय भाव मे यदि बुध राशि (मिथुन,कन्या) का मंगल हो तो मांगलिक दोष नही लगेगा ऐसा बृष व सिंह लग्न की कुंडली मे ही होगा ।चतुर्थ भाव मे शुक्र राशि (बृष,तुला) का मंगल दोषकृत नही है, ऐसा कर्क व कुम्भ लग्न मे होगा।अष्टम भाव मे गुरू राशि (धनु,मीन) का मंगल दोष पैदा नही करेगा ।ऐस बृष और सिंह लग्न मे ही सम्भव है और बारहवे भाव मे मंगल का दोष बुध कि राशि (मिथुन,कन्या) मे नही होगा ।ऐसा कर्क और तुला लग्नो मे ही होगा तथा 1,4,7,8,12 वे भाव मे मंगल यदि चर राशि मेष कर्क ,तुला और मकर मे हो तो भी मांगलिक दोष नही लगता है ॥

भौमेन सदृषो भौमः पापोवा तादृशो भवेत।                                                   विवाह शुभदः प्रोक्ततिश्चरायुः पुत्र पौत्रदः ॥

मंगल के समान ही कोई पापग्रह (सूर्य,शनि,राहु,केतु) दूसरे कि कुंडली के मांगलिक स्थान मे हो तो दोनो का विवाह करना चाहिए ,ऐसे दाम्पत्ति आयु,पुत्र,पौत्रादि से सम्पन्न होकर सुखी जीवन व्यतीत करेगे ।    
                   
यामित्रे च यदा सौरि लग्ने वा हिबूकेथवा ।                                                           अष्टमे द्वादशे चैव- भौम दोषो न विद्यते ॥
जिस वर –कन्या के (1,4,7,8,12) इन स्थनो मे शनि हो तो मंगली दोष मिट जाता है|

गुरु भौम समायुक्तश्च भौमश्च निशाकरः                                                        केन्द्रे वा वर्तते चन्द्र एतद्योग न मंगली ।                                                           गुरु लग्ने त्रिकोणेवा लाभ स्थाने यदा शनिः,                                                         दशमे च यदा राहु मंगली दोष नाश कृत॥

गुरु भौम के साथ पडने से अथवा चन्द्रमा भौम एक साथ और केन्द्र मे (1,4,7,10) इन स्थानो मे चन्द्रमा होवे तो भी मंगली दोष मिट जाता है , जिसके लग्न मे गुरु बैठा हो अथवा त्रिकोण स्थान (5,9) मे गुरु बैठा और 11 भाव शनि हो 10 वे स्थान राहु बैठा हो तो भी मंगली दोष मिट जाता है ॥ 
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बुधवार, 16 अगस्त 2017

गुरुत्वाकर्षण की खोज न्यूटन ने नहीं, बल्कि इसका वर्णन संस्कृत ग्रन्थों में पहले से है.

                       
               हमें पढ़ाया जाता है कि गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त न्यूटन (1642 -1726) ने दिया. यदि विद्यार्थी संस्कृत पढेंगे तो जान जाएंगे कि यह झूठ है.
 
--- तुलसी दास जी ने कवितावली में लिखा,  हनुमान जी के द्वारा  अमर राक्षसों को,  पृथ्वी से वहाँ फेंका गया जहाँ से न उपर जा सकते हैं न नीचे.



प्राचीन भारत के एक प्रसिद्ध गणितज्ञ भास्कराचार्य (1114 –
1185) के द्वारा रचित एक मुख्य ग्रन्थ *सिद्धान्त शिरोमणि* है हैं।
भास्कराचार्य ने अपने सिद्धान्तशिरोमणि में यह कहा है-
*आकृष्टिशक्तिश्चमहि तया यत् खस्थं गुरूं स्वाभिमुखं स्वशक्त्या ।*
*आकृष्यते तत् पततीव भाति समे समन्तात् क्व पतत्वियं खे ।।*
– सिद्धान्त० भुवन० १६
अर्थात – पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है जिसके कारण वह ऊपर
की भारी वस्तु को अपनी ओर
खींच लेती है । वह वस्तु पृथ्वी पर
गिरती हुई सी लगती है । पृथ्वी
स्वयं सूर्य आदि के आकर्षण से रुकी हुई है,अतः वह निराधार
आकाश में स्थित है तथा अपने स्थान से हटती नहीं
है और न गिरती है । वह अपनी कील पर
घूमती है।
-------------------
वराहमिहिर ( 57 BC ) ने अपने ग्रन्थ *पञ्चसिद्धान्तिका*में कहा है-
*पंचभमहाभूतमयस्तारा गण पंजरे महीगोलः।*
*खेयस्कान्तान्तःस्थो लोह इवावस्थितो वृत्तः ।।*
– पञ्चसिद्धान्तिका पृ०३१
अर्थात- तारासमूहरूपी पंजर में गोल पृथ्वी
इसी प्रकार रुकी हुई है जैसे दो बड़े चुम्बकों के
बीच में लोहा ।
--------------------
अपने ग्रन्थ सिद्धान्तशेखर में आचार्य श्रीपति ने कहा है –
*उष्णत्वमर्कशिखिनोः शिशिरत्वमिन्दौ,.. निर्हतुरेवमवनेःस्थितिरन्तरिक्षे ।।*
– सिद्धान्तशेखर १५/२१ )
नभस्ययस्कान्तमहामणीनां मध्ये स्थितो लोहगुणो यथास्ते ।
आधारशून्यो पि तथैव सर्वधारो धरित्र्या ध्रुवमेव गोलः ।।
–सिद्धान्तशेखर १५/२२
अर्थात -पृथ्वी की अन्तरिक्ष में स्थिति उसी
प्रकार स्वाभाविक है, जैसे सूर्य्य में गर्मी, चन्द्र में
शीतलता और वायु में गतिशीलता । दो बड़े चुम्बकों के बीच में लोहे का गोला स्थिर रहता है, उसी प्रकार पृथ्वी भी अपनी धुरी पर
रुकी हुई है ।
ऐसे अनेकों प्रामाणिक उदाहरण हैं परन्तु भारतीयों के तन्द्रावस्था में लीन होने के कारण प्राचीन भारतीय विज्ञान के स्रोत विलुप्त प्रायः हैं ।

बुधवार, 26 जुलाई 2017

सूर्य शुक्र

सूर्य और शुक्र , एक दूसरे से कभी ४८° दूरी पर नहीं रह सकते.