बुधवार, 28 जून 2017
शनिवार, 24 जून 2017
गुप्त नवरात्रि प्ररंभ , २४/०६/२१७ मुहूर्त व साधनाएँ
*माघ गुप्त नवरात्रि प्रारंभ 24/06/ 2017*
घट स्थापन प्रयोग:-आज रात 9 बजे , शनिवार
*प्रत्येक वर्ष आने वाले दो नवरात्रों से तो आप सभी लोग परिचित हैं लेकिन इनके अलावा प्रत्येक वर्ष दो और नवरात्री होती हैं जिन्हें गुप्त नवरात्री कहा जाता है। पूर्व काल में इनका ज्ञान केवल उच्च कोटि के साधकों को होता था जो इस समय का उपयोग विशिष्ट साधनाओं को सम्पन्न करने में किया करते थे।*
*गुप्त नवरात्र में पूजा, उपासना सामान्य नवरात्रों के समान ही होती हैा तान्त्रिक समाज में इन नवरात्रों का बहुत ही महत्व है, जो इस समय की लगातार प्रतिक्षा करता है*
*28 जनवरी 2017 ( शनिवार ) घट स्थापना, शैलपुत्री पूजा* आह्मान
*29 जनवरी 2017 ( रविवार ) द्वितीया ब्रह्मचारिणी पूजा*
*30 जनवरी 2017 ( सोमवार ) तृतीया चंद्रघंटा पूजा*
*31 जनवरी 2017 ( मंगलवार) चतुर्थी कुष्मांडा पूजा*
*01 फरवरी 2017 ( बुधवार ) पंचमी स्कंदमाता पूजा*
वसंतपंचमी सरस्वती बिज स्थापन प्रयोग :-
12 बजे से 3 बजे तक दोपहर ।
सरस्वती सर्वकार्य सिद्धि हवन रात :- 8 बजे।
*02 फरवरी 2017 ( गुरुवार) षष्ठी कात्यायनी पूजा*
*03 फरवरी 2017 ( शुक्रवार) सप्तमी कालरात्रि पूजा*
*04 फरवरी 2017 ( शनिवार ) अष्टमी महागौरी पूजा, दुर्गा महा अष्टमी पूजा,*
अष्टमी बगलामुखी प्रत्यंगिरा हवन रात 8 बजे!
*05 फरवरी 2017 ( रविवार ) नवमी सिद्धिदात्री पूजा*
*06 फरवरी 2017 ( सोमवार ) दशमी नवरात्री प्रयाण*
आप श्री यंत्र साधना, या श्री विद्या साधना करना चाहते हैं तो यह आपके लिए स्वर्णिम समय है,
माँ भगवती आपका कल्याण करें ....
Share
घट स्थापन प्रयोग:-आज रात 9 बजे , शनिवार
*प्रत्येक वर्ष आने वाले दो नवरात्रों से तो आप सभी लोग परिचित हैं लेकिन इनके अलावा प्रत्येक वर्ष दो और नवरात्री होती हैं जिन्हें गुप्त नवरात्री कहा जाता है। पूर्व काल में इनका ज्ञान केवल उच्च कोटि के साधकों को होता था जो इस समय का उपयोग विशिष्ट साधनाओं को सम्पन्न करने में किया करते थे।*
*गुप्त नवरात्र में पूजा, उपासना सामान्य नवरात्रों के समान ही होती हैा तान्त्रिक समाज में इन नवरात्रों का बहुत ही महत्व है, जो इस समय की लगातार प्रतिक्षा करता है*
*28 जनवरी 2017 ( शनिवार ) घट स्थापना, शैलपुत्री पूजा* आह्मान
*29 जनवरी 2017 ( रविवार ) द्वितीया ब्रह्मचारिणी पूजा*
*30 जनवरी 2017 ( सोमवार ) तृतीया चंद्रघंटा पूजा*
*31 जनवरी 2017 ( मंगलवार) चतुर्थी कुष्मांडा पूजा*
*01 फरवरी 2017 ( बुधवार ) पंचमी स्कंदमाता पूजा*
वसंतपंचमी सरस्वती बिज स्थापन प्रयोग :-
12 बजे से 3 बजे तक दोपहर ।
सरस्वती सर्वकार्य सिद्धि हवन रात :- 8 बजे।
*02 फरवरी 2017 ( गुरुवार) षष्ठी कात्यायनी पूजा*
*03 फरवरी 2017 ( शुक्रवार) सप्तमी कालरात्रि पूजा*
*04 फरवरी 2017 ( शनिवार ) अष्टमी महागौरी पूजा, दुर्गा महा अष्टमी पूजा,*
अष्टमी बगलामुखी प्रत्यंगिरा हवन रात 8 बजे!
*05 फरवरी 2017 ( रविवार ) नवमी सिद्धिदात्री पूजा*
*06 फरवरी 2017 ( सोमवार ) दशमी नवरात्री प्रयाण*
आप श्री यंत्र साधना, या श्री विद्या साधना करना चाहते हैं तो यह आपके लिए स्वर्णिम समय है,
माँ भगवती आपका कल्याण करें ....
Share
शुक्रवार, 16 जून 2017
श्री कृष्ण द्वारा वर्णित, महादेव कृत "देवी" स्तोत्र, शत्रु विजय , पुत्र प्राप्ति व सभी कष्टों का हरण करता है , (ब्रह्मवैवर्त पुराण )
भगवान शंकर जब त्रिपुर से युद्ध कर रहे थे,
और उसको मारना बहुत मुश्किल हो रहा था तब महादेव ने , भगवान विष्णु द्वारा बतलाये हुए ,
"माँ भगवती"
के स्तोत्र का पाठ किया, व माँ की कृपा से त्रिपुरासुर का वध किया.
यह स्तोत्र स्त्री, पुत्र, भूमि सर्व सम्पत्ति दाता शत्रु पर विजय, व महावन्ध्या को भी पुत्रवती, व किसी भी रोग से मुक्ति दिलाता है....
पुराण में श्री कृष्ण द्वारा नंदबाबा को इसका उपदेश दिया गया, इसी उपाख्यान में
श्री महादेव कृत भगवती स्तोत्र , (ब्रह्मवैवर्त ८८/१५-३८)
Share
और उसको मारना बहुत मुश्किल हो रहा था तब महादेव ने , भगवान विष्णु द्वारा बतलाये हुए ,
"माँ भगवती"
के स्तोत्र का पाठ किया, व माँ की कृपा से त्रिपुरासुर का वध किया.
यह स्तोत्र स्त्री, पुत्र, भूमि सर्व सम्पत्ति दाता शत्रु पर विजय, व महावन्ध्या को भी पुत्रवती, व किसी भी रोग से मुक्ति दिलाता है....
पुराण में श्री कृष्ण द्वारा नंदबाबा को इसका उपदेश दिया गया, इसी उपाख्यान में
श्री महादेव कृत भगवती स्तोत्र , (ब्रह्मवैवर्त ८८/१५-३८)
समस्त कष्टों के निवारण इस दिव्य स्तोत्र से हो जाते हैं,
यह स्वयं श्री कृष्ण के वचन हैं.....
गुरुवार, 11 मई 2017
हनुमान से क्यों डरते है शनि और शनिदेव पर तेल क्यों चढाया जाता है !
हनुमान जी एक बार संध्या समय अपने आराध्य श्री राम का स्मरण करने लगा तो उसी समय ग्रहों में पाप ग्रह, मंद गति सूर्य पुत्र शनि देव पधारे। वह अत्यंत कृष्ण वर्ण के भीषणाकार थे। वह अपना सिर प्रायः झुकाये रखते हैं। जिस पर अपनी दृष्टि डालते हैं वह अवश्य नष्ट हो जाता है। शनिदेव हनुमान के बाहुबल और पराक्रम को नहीं जानते थे। हनुमान ने उन्हें लंका में दशग्रीव के बंधन से मुक्त किया था। वह हनुमान जी से विनयपूर्वक किंतु कर्कश स्वर में बोले हनुमान जी ! मैं आपको सावधान करने आया हूं। त्रेता की बात दूसरी थी, अब कलियुग प्रारंभ हो गया है। मैं सृष्टिकर्ता के विधान से विवश हूं। आप पृथ्वी पर रहते हैं। अतः आप मेरे प्रभुत्व क्षेत्र से बाहर नहीं हैं। पूरे साढे बाईस वर्ष व्यतीत होने पर साढ़े सात वर्ष के अंतर से ढाई वर्ष के लिए मेरा प्रभाव प्राणी पर पड़ता है। किंतु यह गौण प्रभाव है। आप पर मेरी साढ़े साती आज इसी समय से प्रभावी हो रही हो। मैं आपके शरीर पर आ रहा हूं। इसे आप टाल नहीं सकते।फिर हनुमान जी कहते हैं, जब आपको आना ही है तो आइए, अच्छा होता कि आप मुझ वृद्ध को छोड़ ही देते'! फिर शनिदेव कहते हैं, कलियुग में पृथ्वी पर देवता या उपदेवता किसी को नहीं रहना चाहिए। सबको अपना आवास सूक्ष्म लोकों में रखना चाहिए जो पृथ्वी पर रहेगा। वह कलियुग के प्रभाव में रहेगा और उसे मेरी पीड़ा भोगनी पड़ेगी और ग्रहों में मुझे अपने अग्रज यम का कार्य मिला है। मैं मुख्य मारक ग्रह हूं। और मृत्यु के सबसे निकट वृद्ध होते हैं। अतः मैं वृद्धों को कैसे छोड़ सकता हूं।'
हनुमान जी पूछते हैं, आप मेरे शरीर पर कहां बैठने आ रहे हैं। शनिदेव गर्व से कहते हैं प्राणी के सिर पर। मैं ढाई वर्ष प्राणी के सिर पर रहकर उसकी बुद्धि विचलित बनाए रखता हूं। मध्य के ढाई वर्ष उसके उदर में स्थित रहकर उसके शरीर को अस्वस्थ बनाता हूं व अंतिम ढाई वर्ष पैरों में रहकर उसे भटकाता हूं।' फिर शनिदेव हनुमान जी के मस्तक पर आ बैठे तो हनुमान जी के सिर पर खाज हुई। इसे मिटाने के लिए हनुमान जी ने बड़ा पर्वत उठाकर सिर पर रख लिया।शनिदेव चिल्लाते हैं, यह क्या कर रहे हैं आप।' फिर हनुमान जी कहते हैं, जैसे आप सृष्टिकर्ता के विधान से विवश हैं वैसे मैं भी अपने स्वभाव से विवश हूं। मेरे मस्तक पर खाज मिटाने की यही उपचार पद्धति है। और आप अपना कार्य करें और मैं अपना कार्य।'ऐसा कहते ही हुनमान जी ने दूसरा पर्वत उठाकर सिर पर रख लिया। इस पर शनिदेव कहते हैं, आप इन्हें उतारिए, मैं संधि करने को तैयार हूं।' उनके इतना कहते ही हनुमान जी ने तीसरा पर्वत उठाकर सिर पर रख लिया तो शनि देव चिल्ला कर कहते हैं, मैं अब आपके समीप नहीं आऊंगा। फिर भी हनुमान जी नहीं माने और चौथा पर्वत उठाकर सिर पर रख लिया। शनिदेव फिर चिल्लाते हैं, पवनकुमार ! त्राहि माम ताहि माम ! रामदूत ! आंजनेयाय नमः ! मैं उसको भी पीड़ित नहीं करूंगा जो आपका स्मरण करेगा। मुझे उतर जाने का अवसर दें। हनुमान जी कहते हैं, बहुत शीघ्रता की। अभी तो पांचवां पर्वत (शिखर) बाकी है। और इतने में ही शनि मेरे पैरों में गिर गए, और कहा' मैं सदैव आपको दिये वचनों को स्मरण रखूंगा।' आघात के उपचार के लिए शनिदेव तेल मांगने लगे। हनुमान जी तेल कहां देने वाले थे। तभी शनि देव ने अपनी पीढा दूर करने को तेल लगाया !और तभी से तेल चड़ने लगा !वही शनिदेव आज भी तेलदान से तुष्ट होते हैं। और खुशियाँ प्रदान करते है !!(पुराण कथा से ).
बुधवार, 26 अप्रैल 2017
पितृ दोष निवारक , पितृसूक्त(ऋग्वेदोक्त)
ऋगवेदके १० वे मण्डलके १५ वे सूक्तकी १-१४ ऋचाएँ 'पितृसूक्त' के नाम से ख्यात हैं । वेदोमें पितृ कृपा और पितृ दोष का विवरण मिलता हैं ।
उदीरतामवर उत् परास उन्मध्यमाः पितरः सोम्यासः।
असुं य ईयुरवृका ऋतज्ञास्ते नोऽवन्तु पितरो हवेषु ।।
नीचे, ऊपर और मध्यस्थानोंमें रहनेवाले, सोमपान करनेके योग्य हमारे सभी पितर उठकर तैयार हों। यज्ञके ज्ञाता सौम्य स्वभावके हमारे जिन पितरोंने नूतन प्राण धारण कर लिये हैं, वे सभी हमारे बुलाने पर आकर हमारी सुरक्षा करें।।
इदं पितृभ्यो नमो अस्त्वद्य ये पूर्वासो य उपरास ईयुः ।
ये पार्थिवे रजस्या निषत्ता ये वा नूनं सुवृजनासु विक्षु।।
जो भी नये अथवा पुराने पितर यहाँ से चले गये है, जो पितर अन्य स्थानोमें हैं और जो उत्तम स्वजनोंके साथ निवास कर रहे हैं अर्थात् यमलोक, मर्त्यलोक और विष्णुलोकमें स्थित सभी पितरोंको आज हमारा यह प्रणाम निवेदित हो ।।
आहं पितृन् त्सुविदत्राँ अवित्सि नपातं च विक्रमणं च विष्णोः।
बर्हिषदो ये स्वधया सुतस्य भजन्त पित्वस्त इहागमिष्ठाः ।।
उत्तम ज्ञानसे युक्त पितरोंको तथा अपानपात् और विष्णुके विक्रमणको मैंने अपने अनुकूल बना लिया है । कुशासनपर बैठनेके अधिकारी पितर प्रसन्नतापूर्वक आकर अपनी इच्छाके अनुसार हमारे द्वारा अर्पित हवि और सोमरस ग्रहण करें।।
बर्हिषदः पितर ऊत्य१र्वागिमा वो हव्या चकृमा जुषध्वम् ।
त आ गतावसा शंतमेनाऽथा नः शं योररपो दधात।।
कुशासनपर अधिष्ठित होनेवाले हे पितर! आप कृपा करके हमारी ओर आइये । यह हवि आपके लिये ही तैयार की गई हैं, इसे प्रेमसे स्वीकार कीजिये। अपने अत्यधिक सुखप्रद प्रसादके साथ आयें और हमें क्लेशरहित सुख तथा कल्याण प्राप्त करायें।।
उपहूताः पितरः सोम्यासो बर्हिष्येषु निधिषु प्रियेषु।
त आ गमन्तु त इह श्रुवन्त्वधि ब्रुवन्तु तेऽवन्त्वस्मान्।।
पितरोंको प्रिय लगनेवाली सोमरुपी निधियोंकी स्थापनाके बाद कुशासनपर हमने पितरोंका आवाहन किया है। वे यहाँ आ जायँ और हमारी प्रार्थना सुनें। वे हमारी सुरक्षा करनेके साथ ही देवोंके पास हमारी ओर से संस्तुति करें।।
आच्या जानु दक्षिणतो निषद्येमं यज्ञमभि गृणीत विश्वे ।
मा हिंसिष्ट पितरः केन चिन्नो यद्व आगः पुरुषता कराम।।
हे पितरो!बायाँ घुटना मोडकर और वेदीके दक्षिणमें नीचे बैठकर आप सभी हमारे इस यज्ञकी प्रशंसा करें । मानव-स्वभावके अनुसार हमने आपके विरुद्ध कोई भी अपराध किया हो तो उसके कारण हे पितरो! आप हमें दण्ड मत दें (पितर बायाँ घुटना मोड़कर बैठते हैं और देवता दाहिना घुटना मोड़कर बैठनापसन्द करतेहैं)।।
आसीनासो अरुणीनामुपस्थे रयिं धत्त दाशुषे मर्त्याय।
पुत्रेभ्यः पितरस्तस्य वस्वः प्र यच्छत त इहोर्जं दधात ।।
अरुणवर्णकी उषादेवीके अंकमें विराजित हे पितर! अपने इस मर्त्यलोकके याजकको धन दें, सामर्थ्य दें तथा अपनी प्रसिद्ध सम्पत्तिमेंसे कुछ अंश हम पुत्रों को दें।।
ये नः पूर्वे पितरः सोम्यासो ऽनूहिरे सोमपीथं वसिष्ठाः।
तेभिर्यमः संरराणो हवींष्युशन्नुशद्भिः प्रतिकाममत्तु।।
(यमके सोमपानके बाद) सोमपानके योग्य हमारे वसिष्ठकुलके सोमपायी पितर यहाँ उपस्थित हो गये हैं। वे हमें उपकृत करनेके लिये सहमत होकर और स्वयं उत्कण्ठित होकर यह राजा यम हमारे द्वारा समर्पित हविको अपने इच्छानुसार ग्रहण करें ।।
ये तातृषुर्देवत्रा जेहमाना होत्राविदः स्तोमतष्टासो अर्कैः।
आग्ने याहि सुविदत्रेभिरर्वाड् सत्यैः कव्यैः पितृभिर्घर्मसद्भिः।।
अनेक प्रकारके हवि-द्रवव्योंके ज्ञानी अर्कोसे, स्तोमोंकी सहायतासे जिन्हें निर्माण किया हैं, ऐसे उत्तम ज्ञानी, विश्वासपात्र घर्म नामक हविके पास बैठनेवाले 'कव्य' नामक हमारे पितर देवलोकमें साँस लगनेकी अवस्थातक प्याससे व्याकुल हो गये हैं। उनको साथ लेकर हे अग्निदेव! आप यहाँ उपस्थित हों ।।
ये सत्यासो हविरदो हविष्पा इन्द्रेण देवैः सरथं दधानाः।
आग्ने याहि सहस्त्रं देववन्दैः परैः पूर्वैः पितृभिर्घर्मसद्भिः।।
कभी न बिछुडनेवाले, ठोस हविका भक्षण करनेवाले, द्रव हविका पान करनेवाले, इन्द्र और अन्य देवोंके साथ एक ही रथमें प्रयाण करनेवाले, देवोंकी वन्दना करनेवाले, घर्म नामक हविके पास बैठनेवाले जो हमारे पूर्वज पितर हैं, उन्हें सहस्त्रकी संख्यामें लेकर हे अग्निदेव!यहाँ पधारें।।
अग्निष्वाताः पितर एह गच्छत सदः सदः सदत सुप्रणीतयः।
अत्ता हवींषि प्रयतानि बर्हिष्यथा रयिं सर्ववीरं दधातन।।
अग्निके द्वारा पवित्र किये गये हे उत्तम पथ-प्रदर्शक पितर! यहाँ आइये और अपने -अपने आसनों पर अधिष्ठित हो जाइये। कुशासनपर समर्पित हविर्द्रव्योंका भक्षण कीजिये और ( अनुग्रहस्वरुप) पुत्रोंसे युक्त सम्पदा हमें समर्पित कराइये।।
त्वमग्न ईळितो जातवेदो ऽवाड्ढव्यानि सुरभीणि कृत्वी।
प्रादाः पितृभ्यः स्वधया ते अक्षन्नद्धि त्वं देव प्रयता हवींषि।।
हे ज्ञानी अग्निदेव ! हमारी प्रार्थनापर आप इस हविको मधुर बनाकर पितरोंके पास ले गये, उन्हें पितरोंको समर्पित किया और पितरोंने भी अपनी इच्छाके अनुसार उस हविका भक्षण किया । हे अग्निदेव! (अब हमारे द्वारा) समर्पित हविको आप भी ग्रहण करें।।
ये चेह पितरो ये च नेह याँश्च विद्म याँ उ च न प्रविद्म।
त्वं वेत्थ यति ते जातवेदः स्वधाभिर्यज्ञं सुकृतं जुषस्व।।
जो हमारे पितर यहाँ (आ गये)हैं और जो यहाँ नहीं आये है, जिन्हे हम जानते है और जिन्हे हम अच्छी प्रकार जानते भी नहीं; उन सभीको, जितने (और जैसे ) हैं, उन सभीको हे अग्निदेव! आप भलीभाँति पहचानते हैं । उन सभीकी इच्छाके अनुसार अच्छी प्रकार तैयार किये गये इस हविको (उन सभीके लिये) प्रसन्नताके साथ स्वीकार करें।।
ये अग्निदग्धा ये अनग्निदग्धा मध्ये दिवः स्वधया मादयन्ते।
तेभिः स्वराळसुनीतिमेतां यथावशं तन्वं कल्पयस्व ।।
हमारे जिन पितरोंको अग्निने पावन किया हैं और जो अग्निद्वारा भस्मसात् किये बिना ही स्वयं पितृभूत हैं तथा जो अपनी इच्छाके अनुसार स्वर्गके मध्यमें आनन्दसे निवास करते हैं । उन सभीकी अनुमतिसे हे स्वराट् अग्ने ! (पितृलोकमें इस नूतन मृतजीवके) प्राण धारण करने योग्य (उसके) इस शरीरको उसकी इच्छाके अनुसार ही बना दो और उसे दे दो ।।
पितृ प्रसन्नताके लिये व पितृ दोष निवारण के लिए
इस सुक्त के १०८ पाठ करें/करवायें ।।
Share
उदीरतामवर उत् परास उन्मध्यमाः पितरः सोम्यासः।
असुं य ईयुरवृका ऋतज्ञास्ते नोऽवन्तु पितरो हवेषु ।।
नीचे, ऊपर और मध्यस्थानोंमें रहनेवाले, सोमपान करनेके योग्य हमारे सभी पितर उठकर तैयार हों। यज्ञके ज्ञाता सौम्य स्वभावके हमारे जिन पितरोंने नूतन प्राण धारण कर लिये हैं, वे सभी हमारे बुलाने पर आकर हमारी सुरक्षा करें।।
इदं पितृभ्यो नमो अस्त्वद्य ये पूर्वासो य उपरास ईयुः ।
ये पार्थिवे रजस्या निषत्ता ये वा नूनं सुवृजनासु विक्षु।।
जो भी नये अथवा पुराने पितर यहाँ से चले गये है, जो पितर अन्य स्थानोमें हैं और जो उत्तम स्वजनोंके साथ निवास कर रहे हैं अर्थात् यमलोक, मर्त्यलोक और विष्णुलोकमें स्थित सभी पितरोंको आज हमारा यह प्रणाम निवेदित हो ।।
आहं पितृन् त्सुविदत्राँ अवित्सि नपातं च विक्रमणं च विष्णोः।
बर्हिषदो ये स्वधया सुतस्य भजन्त पित्वस्त इहागमिष्ठाः ।।
उत्तम ज्ञानसे युक्त पितरोंको तथा अपानपात् और विष्णुके विक्रमणको मैंने अपने अनुकूल बना लिया है । कुशासनपर बैठनेके अधिकारी पितर प्रसन्नतापूर्वक आकर अपनी इच्छाके अनुसार हमारे द्वारा अर्पित हवि और सोमरस ग्रहण करें।।
बर्हिषदः पितर ऊत्य१र्वागिमा वो हव्या चकृमा जुषध्वम् ।
त आ गतावसा शंतमेनाऽथा नः शं योररपो दधात।।
कुशासनपर अधिष्ठित होनेवाले हे पितर! आप कृपा करके हमारी ओर आइये । यह हवि आपके लिये ही तैयार की गई हैं, इसे प्रेमसे स्वीकार कीजिये। अपने अत्यधिक सुखप्रद प्रसादके साथ आयें और हमें क्लेशरहित सुख तथा कल्याण प्राप्त करायें।।
उपहूताः पितरः सोम्यासो बर्हिष्येषु निधिषु प्रियेषु।
त आ गमन्तु त इह श्रुवन्त्वधि ब्रुवन्तु तेऽवन्त्वस्मान्।।
पितरोंको प्रिय लगनेवाली सोमरुपी निधियोंकी स्थापनाके बाद कुशासनपर हमने पितरोंका आवाहन किया है। वे यहाँ आ जायँ और हमारी प्रार्थना सुनें। वे हमारी सुरक्षा करनेके साथ ही देवोंके पास हमारी ओर से संस्तुति करें।।
आच्या जानु दक्षिणतो निषद्येमं यज्ञमभि गृणीत विश्वे ।
मा हिंसिष्ट पितरः केन चिन्नो यद्व आगः पुरुषता कराम।।
हे पितरो!बायाँ घुटना मोडकर और वेदीके दक्षिणमें नीचे बैठकर आप सभी हमारे इस यज्ञकी प्रशंसा करें । मानव-स्वभावके अनुसार हमने आपके विरुद्ध कोई भी अपराध किया हो तो उसके कारण हे पितरो! आप हमें दण्ड मत दें (पितर बायाँ घुटना मोड़कर बैठते हैं और देवता दाहिना घुटना मोड़कर बैठनापसन्द करतेहैं)।।
आसीनासो अरुणीनामुपस्थे रयिं धत्त दाशुषे मर्त्याय।
पुत्रेभ्यः पितरस्तस्य वस्वः प्र यच्छत त इहोर्जं दधात ।।
अरुणवर्णकी उषादेवीके अंकमें विराजित हे पितर! अपने इस मर्त्यलोकके याजकको धन दें, सामर्थ्य दें तथा अपनी प्रसिद्ध सम्पत्तिमेंसे कुछ अंश हम पुत्रों को दें।।
ये नः पूर्वे पितरः सोम्यासो ऽनूहिरे सोमपीथं वसिष्ठाः।
तेभिर्यमः संरराणो हवींष्युशन्नुशद्भिः प्रतिकाममत्तु।।
(यमके सोमपानके बाद) सोमपानके योग्य हमारे वसिष्ठकुलके सोमपायी पितर यहाँ उपस्थित हो गये हैं। वे हमें उपकृत करनेके लिये सहमत होकर और स्वयं उत्कण्ठित होकर यह राजा यम हमारे द्वारा समर्पित हविको अपने इच्छानुसार ग्रहण करें ।।
ये तातृषुर्देवत्रा जेहमाना होत्राविदः स्तोमतष्टासो अर्कैः।
आग्ने याहि सुविदत्रेभिरर्वाड् सत्यैः कव्यैः पितृभिर्घर्मसद्भिः।।
अनेक प्रकारके हवि-द्रवव्योंके ज्ञानी अर्कोसे, स्तोमोंकी सहायतासे जिन्हें निर्माण किया हैं, ऐसे उत्तम ज्ञानी, विश्वासपात्र घर्म नामक हविके पास बैठनेवाले 'कव्य' नामक हमारे पितर देवलोकमें साँस लगनेकी अवस्थातक प्याससे व्याकुल हो गये हैं। उनको साथ लेकर हे अग्निदेव! आप यहाँ उपस्थित हों ।।
ये सत्यासो हविरदो हविष्पा इन्द्रेण देवैः सरथं दधानाः।
आग्ने याहि सहस्त्रं देववन्दैः परैः पूर्वैः पितृभिर्घर्मसद्भिः।।
कभी न बिछुडनेवाले, ठोस हविका भक्षण करनेवाले, द्रव हविका पान करनेवाले, इन्द्र और अन्य देवोंके साथ एक ही रथमें प्रयाण करनेवाले, देवोंकी वन्दना करनेवाले, घर्म नामक हविके पास बैठनेवाले जो हमारे पूर्वज पितर हैं, उन्हें सहस्त्रकी संख्यामें लेकर हे अग्निदेव!यहाँ पधारें।।
अग्निष्वाताः पितर एह गच्छत सदः सदः सदत सुप्रणीतयः।
अत्ता हवींषि प्रयतानि बर्हिष्यथा रयिं सर्ववीरं दधातन।।
अग्निके द्वारा पवित्र किये गये हे उत्तम पथ-प्रदर्शक पितर! यहाँ आइये और अपने -अपने आसनों पर अधिष्ठित हो जाइये। कुशासनपर समर्पित हविर्द्रव्योंका भक्षण कीजिये और ( अनुग्रहस्वरुप) पुत्रोंसे युक्त सम्पदा हमें समर्पित कराइये।।
त्वमग्न ईळितो जातवेदो ऽवाड्ढव्यानि सुरभीणि कृत्वी।
प्रादाः पितृभ्यः स्वधया ते अक्षन्नद्धि त्वं देव प्रयता हवींषि।।
हे ज्ञानी अग्निदेव ! हमारी प्रार्थनापर आप इस हविको मधुर बनाकर पितरोंके पास ले गये, उन्हें पितरोंको समर्पित किया और पितरोंने भी अपनी इच्छाके अनुसार उस हविका भक्षण किया । हे अग्निदेव! (अब हमारे द्वारा) समर्पित हविको आप भी ग्रहण करें।।
ये चेह पितरो ये च नेह याँश्च विद्म याँ उ च न प्रविद्म।
त्वं वेत्थ यति ते जातवेदः स्वधाभिर्यज्ञं सुकृतं जुषस्व।।
जो हमारे पितर यहाँ (आ गये)हैं और जो यहाँ नहीं आये है, जिन्हे हम जानते है और जिन्हे हम अच्छी प्रकार जानते भी नहीं; उन सभीको, जितने (और जैसे ) हैं, उन सभीको हे अग्निदेव! आप भलीभाँति पहचानते हैं । उन सभीकी इच्छाके अनुसार अच्छी प्रकार तैयार किये गये इस हविको (उन सभीके लिये) प्रसन्नताके साथ स्वीकार करें।।
ये अग्निदग्धा ये अनग्निदग्धा मध्ये दिवः स्वधया मादयन्ते।
तेभिः स्वराळसुनीतिमेतां यथावशं तन्वं कल्पयस्व ।।
हमारे जिन पितरोंको अग्निने पावन किया हैं और जो अग्निद्वारा भस्मसात् किये बिना ही स्वयं पितृभूत हैं तथा जो अपनी इच्छाके अनुसार स्वर्गके मध्यमें आनन्दसे निवास करते हैं । उन सभीकी अनुमतिसे हे स्वराट् अग्ने ! (पितृलोकमें इस नूतन मृतजीवके) प्राण धारण करने योग्य (उसके) इस शरीरको उसकी इच्छाके अनुसार ही बना दो और उसे दे दो ।।
पितृ प्रसन्नताके लिये व पितृ दोष निवारण के लिए
इस सुक्त के १०८ पाठ करें/करवायें ।।
Share
सदस्यता लें
संदेश (Atom)






