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गुरुवार, 23 मार्च 2017

(विनायक रुष्ट होने पर कष्ट श्री कृष्ण द्वारा वर्णित ,,,,,,श्लोक३/४ अध्याय १४४ उत्तर पर्व, भविष्य पुराण )

(विनायक रुष्ट होने पर कष्ट,,,,,,श्लोक३/४ अध्याय १४४ उत्तर पर्व, भविष्य   )
    स्वप्न में जल में डूबना , मुंडित सिरों को देखना ,गेरुआ वस्त्र , मस्तक रहित सिर  देखना बिना किसी कारण खुद का रोना/दुखी देखना,
    यह स्वप्न विनायक द्वारा गृहीत होने पर दिखते हैं,(पहचान है).||

   विनायक द्वारा गृहीत होने पर ,
राजपुत्र भी राज्य प्राप्त नहीं कर पाता

  कुमारी पति को प्राप्त नहीं कर पाती

गर्भ होने पर भी पुत्र प्राप्त न होना.

व्यापारी व्यापार में लाभ न सफल होगा.
 
  योग्य होने पर भी आजीविका कार्य (नौकरी) न मिलना
 
     इसका उपाय भी भविष्य पुराण में वर्णित है , कि किस प्रकार हम एक अनुष्ठान करें
     पहले गणेश जी का विधानानुसार पूजन फिर अभिमन्त्रित जल से यजमान का अभिषेक करें
 तत्पश्चात कुशा को दाहिने हाथ में धारण करके सरसों तेल से हवन करें
  इसके पश्चात बलि नैवेद्य अर्पण करके मण्ल पर अर्ध्य दें , तत्पश्चात पुन: माता अम्बिका की राजोपचार विधि से पूजन करें , ब्राह्मणों को भोजन करायें ,
               गुरु जी को 
(क्युकि इस पूजन के बाद गुरु का आशीर्वाद आवश्यक है, यदि गुरु तक  किसी कारण  वश आप न पहुँच सकें तो फिर महादेव का पूजन कर ) वस्त्र फल दक्षिणा अर्पण करें.
    इस पूजन से , सभी बाधाएँ नष्ट होती हैं , मनुष्य लक्ष्मी प्राप्त करता है.
                   धन्यवाद
(यदि आप कापी पेस्ट करते हैं तो कृपया सूचना देकर करें)

सोमवार, 20 मार्च 2017

सर्पशाप योग , नागपंचमी मेॆ करें नाग पूजन

पुराणों और संहिताओं में वर्णित (मारतण्ड)
       "सर्प श्राप" दोष   जिसके कारण पुत्र प्राप्ति में बाधा या असमय पुत्र क्षय हो जाता है, 



 पुत्र  स्थानेगते राहौ कुजेनापि निरीक्षते |
कुजक्षेत्र गते वापि सर्प शपात् सुतक्षय: ||
      पंचम स्थान में राहु हो मंगल देखे या मंगल की राशि में है तो सर्प शाप के कारण संतान की हानि होती है,
पुत्रेशे राहुसंयुक्ते पुत्रस्थे भानु नन्दने |
चन्द्रदृष्टे युते वापि सर्प शापात सुतक्षय: ||

          पंचमेश राहु के साथ ,पंचम भाव में शनि चंद्र से युक्त हो बैठा है तो सर्प शाप. 

कारके राहु संयुक्ते पुत्रेशे बलविवर्जिते |
विलग्नेशे भौमयुते सर्प शापात सुत क्षय: ||
    
      कारक ग्रह गुरु के साथ यदि राहु हो पंचमेश बलहीन हो (अस्त अथवा नीच हो)  और लग्नेश मंगल से युत हो तो सर्प शाप दोष 


कारके भौम संयुक्ते लग्ने च राहुसंयुते |
पुत्रस्थानेश्वरे दुस्थे सर्प सापात सुत क्षय : || 

         लग्न में राहु, गुरु मंगल से युक्त और पंचमेश ६,८,१२, भाव में हो तो सर्प शाप दोष, 
        गुरु राहु दृष्ट हो , पंचमेष मंगल के साथ हो  तो सर्प श्राप 
पंचम भाव में सूर्य शनि मंगल राहु बुध गुरु साथ हों , पंचमेश व लग्नेश निरबल हों तो सर्प श्राप दोष.
 यदि पंचम भाव में ७या८ राशि पर राहु हो और बुध से दृष्ट हो तो सर्प श्राप दोष ,  

       हमने जब कालसर्प योग को नकारा , तो कुछ विद्वानों ने कहा कि पुराणों  में ,  कालसर्प दोष को ही सर्प दोष बताया गया है,    उसी के निराकरण हेतु सर्प दोष पर यह लेख है,
     
   

       (  यह कोई Copy Pest नहीं किया गया है,   आपसे निवेदन है कि यदि आप ऐसा करते हैं तो कृपया बताकर करें )

        
     

रविवार, 19 मार्च 2017

चद्रयोग कथन (नारदपुराण)


नारद पुराण में अनेक योगों का वर्णन है, आप ज्योतिषी बॆधुओं के लिए हमने यह संकलन किया है,

         चद्रयोग कथन (नारदपुराण , पूर्वभाग द्वतीय पाद श्लोक २००-२०२)
     



यदि  चन्द्रमा से द्वतीय भाव में , सूर्य को छोड़कर कोई अन्य ग्रह हो तो "सुनफा" योग. चनद्रमा से १२वें(सूर्य के अतिरिक्त)  में हो तो "अनफा" योग.
 और दोनों २,१२वें में हों तो "दुरुधरा" योग ,
 चन्द्रमा से २,१२ में कोई भी ग्रह न हों तो "केमद्रुम" योग होता है.
सुनफा योग-
             जातक स्वयं के पुरुषार्थ से  कमाये धन पर जीविका  चलाता है व धनवान बनता है.
अनफा योग -
       शुशील , स्वस्थ शरीर वाला, विख्यात व सुन्दर स्वरूप वाला होता है.
दुरुधरा-
        धनवान, दानी ,भोगी , सुखी,
केमद्रुम -
      दुखी, मलिन कांति, निर्धन होता है.

  नोट -  पूर्ण कुण्डली का विश्लेषण किये बिना किसी निर्णय पर न जायें.  

शुक्रवार, 17 मार्च 2017

ग्रह अस्त प्रभाव

       कुण्डली फलीदेश करते समय ग्रहों का अस्त का ध्यान अवश्य रखें

   
       
     
           चन्द्र १२° तक , मंगल १७°, बुध १३° गुरु ११° शुक्र ९° शनि १५° तक  सूर्य के पास हों तो अस्त होते हैं,
 अस्त होते हैं यह नारद पुराण का मत है,
                             नारद पुराण, पूर्वाद्ध श्लोक १६३.
   
                  भृगु संहिता के अनुसार ८°से कम दूरी वाले गृह अस्त ८  से १५° तक आधा अस्त और १५° से ज्यादा दूरी वाले पूर्ण उदय कहलाते हैं,

            अस्त  ग्रह सूर्य मित्र है तो कम हानि  यदि शत्रु हो तो अधिक हानि करेगा।
               अस्त ग्रहों को सुचारू रूप से कार्य करने के लिए अतिरिक्त बल की आवश्यकता होती है तथा कुंडली में किसी अस्त ग्रह का स्वभाव देखने के बाद ही यह निर्णय किया जाता है कि उस अस्त ग्रह को अतिरिक्त बल कैसे प्रदान किया जा सकता है।
            यदि किसी कुंडली में कोई ग्रह अस्त होने के साथ-साथ प्रकृति से शुभ फलदायी है तो उसे अतिरिक्त बल प्रदान करने का सबसे सरल व प्रभावशाली उपाय है, जातक को उस ग्रह विशेष का रत्‍न धारण करवाना। रत्‍न का वज़न अस्त ग्रह की बलहीनता का सही अनुमान लगाने के बाद ही निर्धारित किया जाता है। रत्‍न धारण से अस्त ग्रह को अतिरिक्त बल मिल जाता है और वह अपना कार्य भलीभांति करता है।
            किन्तु यदि किसी कुंडली में कोई ग्रह अस्त होने के साथ साथ प्रकृति से अशुभ फलदायी है तो ऐसे ग्रह को रत्‍न द्वारा अतिरिक्त बल प्रदान नहीं कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में रत्‍न का प्रयोग वर्जित है,
                              !!  जय श्री राम !!

मंगलवार, 14 मार्च 2017

क्या मूर्ति पूजा वेद विरुद्ध है, आर्यसमाज/जाकिर नाइक

कुछ मूर्खों ने ( जाकिर नाईक, स्वघोषित आर्य जैसे)
कहा कि मूर्ति पूजा वेद विरुद्ध है ,
(और मूर्ति पूजकों को गाली देते हैं हमें मूर्ख समझते हैं )
     
मूर्खो..!

भगवान् जगन्नाथ की दारुमयी मूर्ति का सुस्पष्ट उल्लेख ऋग्वेद में है-
“अदो यद्दारु प्लवते सिन्धो: पारे अपूरुषम् ।”
-अ.-१०/१५५/३,
“वह दूर समुद्र के किनारे दारुमय जगन्नाथ भगवान् का शरीर जल के ऊपर है ।”
यहां काष्ठमयी प्रतिमा का प्रमाण जाकिर नाइक (जो इसी मंत्र का प्रमाण लेकर वेद द्वारा मूर्ति पूजा खंडन बताकर हिन्दू धर्म का अपमान करता है ) की नाक में नकेल डाल रहा हूँ
“न तस्य प्रतिमाSस्ति” का विवेचन
प्रतिमा का अर्थ उपमा, उपमान और सदृश भी होता है

वेद स्वयं मूर्तिपूजा का प्रतीक दृष्टिगोचर होते हैं क्योंकि उन्हें ईश्वर प्रदत्त ज्ञान माना जाता है। अनेक वेद-मंत्र इसकी साक्षी देते है। अथर्ववेद 3/10/3 में उल्लेख है-
“संवत्सरस्य प्रतिमा याँ त्वा रात्र्युपास्महे। सा न आयुश्मतीं प्रजाँ रायस्पोशेण सं सृज॥”
अर्थात् “ हे रात्रे ! संवत्सर की प्रतिमा ! हम तुम्हारी उपासना करते हैं। तुम हमारे पुत्र-पौत्रादि को चिर आयुष्य बनाओ और पशुओं से हमको सम्पन्न करो।”
अथर्ववेद 2/13/4 में प्रार्थना है- एह्याश्मा तिष्ठाश्मा भवतु ते तनूः ० “हे भगवान! आइये और इस पत्थर की बनी मूर्ति में अधिष्ठित होइये। आपका यह शरीर पत्थर की बनी मूर्ति हो जाये।”
मा असि प्रमा असि प्रतिमा असि | [तैत्तीरिय प्रपा० अनु ० ५ ]
हे महावीर तुम इश्वर की प्रतिमा हो |
सह्स्त्रस्य प्रतिमा असि | [यजुर्वेद १५.६५]
हे परमेश्वर , आप सहस्त्रो की प्रतिमा [मूर्ति ] हैं |
अर्चत प्रार्चत प्रिय्मेधासो अर्चत | (अथर्ववेद-20.92.5)
हे बुद्धिमान मनुष्यों उस प्रतिमा का पूजन करो,भली भांति पूजन करो |
ऋषि नाम प्रस्त्रोअसि नमो अस्तु देव्याय प्रस्तराय| [अथर्व ० १६.२.६ ]
हे प्रतिमा,, तू ऋषियों का पाषण है तुझ दिव्य पाषण के लिए नमस्कार है |
गणपति अथर्व शीर्षम् की फलश्रुती है-
"सूर्यग्रहे महानद्यां प्रतिमासन्निधौ वा जप्त्वा सिद्धमनत्रो भवति ।।"
- सूर्यग्रहणके समय महानदीमें अथवा ***प्रतिमाके*** निकट इस उपनिषद्का जप करके साधक सिद्धमन्त्र हो जाता है ।
इसी प्रकार देवी अथर्वशीर्षम् की फलश्रुती है -
निशीथे तुरीयसन्ध्यायां जप्त्वा वाक्सिद्धिर्भवति । नूतनायां प्रतिमायां जप्त्वा देवतासान्निध्यं भवति । प्र्ाणप्रतिष्ठा
यां जप्त्वा प्राणानां प्रतिष्ठा भवति ।।
प्रतिमा में शक्ति का अधिष्ठान किया जाता है, प्राणप्रतिष्ठा की जाती है। सामवेद के 36 वें ब्राह्मण में उल्लेख है-
“देवतायतनानि कम्पन्ते दैवतप्रतिमा हसन्ति। रुदान्त नृत्यान्त स्फुटान्त स्विद्यन्त्युन्मालान्त निमीलन्ति॥
अर्थात्- देवस्थान काँपते हैं, देवमूर्ति हँसती, रोती और नृत्य करती हैं, किसी अंग में स्फुटित हो जाती है, वह पसीजती है, अपनी आँखों को खोलती और बन्द भी करती है।

         
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