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शुक्रवार, 12 जून 2020

क्या स्त्रियों को , व्यास पीठ पर बैठने या यज्ञोपवीत का अधिकार है !


       पराशर-संहिता के भाष्यकार तथा वैष्णव परंपरा के परम आचार्य मध्वाचार्य जी ने अपनी टीका में लिखा है -“द्विविधा स्त्रियो ब्रह्मवादिन्यः सद्योवधवश्च| तत्र ब्रह्वादिनीनाम् उपनयनम् अग्निबन्धनम् वेदाध्ययनम् स्वगृहे भिक्षा इति, वधूनाम् तु उपस्थिते विवाहे कथंचित् उपनयनं कृत्वा विवाहः कार्यः|” अर्थात् दो प्रकार की स्त्रियाँ होती हैं- एक ब्रह्मवादिनी जिनका उपनयन होता है और जो अग्निहोत्र , वेदाध्ययन तथा अपने घर में भिक्षावृत्ति (घर के लोगों की निष्काम सेवा तथा स्वेच्छा से मिले अन्न-धन से जीवन यापन) करती हैं | दूसरी श्रेणी (सद्योवधु) की स्त्रियाँ वे हैं जिनका शीघ्र ही विवाह होना होता है और इनका भी उपनयन-संस्कार करने के उपरांत ही विवाह करना चाहिए| गोभिलीय गृह्यसूत्र चर्चा आती है :”प्रावृतां यज्ञोपवीतिनीम् अभ्युदानयन् जपेत्, सोमोsददत् गन्धर्वाय इति” अर्थात् कन्या को कपडा पहने हुए, यज्ञोपवीत पहना कर पति के निकट लाकर कहे :”सोमोsददत्”|साथ ही, एक श्लोक है (सन्दर्भ ग्रन्थ मुझे याद नहीं आ रहा) : “पुराकल्पे हि नारीणां मौञ्जीबन्धनमिष्यते| अध्यापनं च वेदानां सावित्रीवाचनं तथा||” अर्थात् प्राचीन-काल में स्त्रियों का यज्ञोपवीत होता था, वे वेद शास्त्रों का अध्ययन करती थीं| ७ वीं शताब्दी में सम्राट हर्षवर्धन की रानी महाश्वेता का वर्णन करते हुए अपने महाकाव्य कादम्बरी में बाणभट्ट ने लिखा है : “ब्रह्मसूत्रेण पवित्रीकृतकायाम्” अर्थात् ब्रह्मसूत्र को धारण करने के कारण पवित्र शरीर वाली | मालवीय जी भी स्त्रियों की वेदादि शिक्षा के प्रबल पक्षधर रहे | लक्ष्मी ने विष्णु भगवान को भागवत सुनाई |ऋग्वेद १०| ८५ में सम्पूर्ण मन्त्रों की ऋषिका ‘सूर्या- सावित्री’ है| ऋषि का अर्थ निरुक्त में इस प्रकार किया है—‘‘ऋषिर्दर्शनात्| स्तोमान् ददर्शेति (२.११)| ऋषयो मन्त्रद्रष्टर: (२.११ दु. वृ.)|’’ अर्थात् मन्त्रों का द्रष्टा उनके रहस्यों को समझकर प्रचार करने वाला ऋषि होता है| ऋग्वेद की ऋषिकाओं की सूची बृहद् देवता के दूसरे अध्याय में इस प्रकार है— घोषा, गोधा, विश्ववारा, अपाला, उपनिषद्, निषद्, ब्रह्मजाया (जुहू), अगस्त्य की भगिनी, अदिति, इन्द्राणी और इन्द्र की माता, सरमा, रोमशा, उर्वशी, लोपामुद्रा और नदियाँ, यमी, शश्वती, श्री, लाक्षा, सार्पराज्ञी, वाक्, श्रद्धा, मेधा, दक्षिणा, रात्री और सूर्या- सावित्री आदि सभी ब्रह्मवादिनी हैं| ऋग्वेद के १०- १३४, १०- ३९, ४०, १०- ९१, १०- ९५, १०- १०७, १०- १०९, १०- १५४, १०- १५९, १०- १८९, ५- २८, ८- ९१ आदि सूक्त की मन्त्रदृष्टा ये ऋषिकाएँ हैं| ऐसे अनेक प्रमाण मिलते हैं, जिनसे स्पष्ट होता है कि स्त्रियाँ भी पुरुषों की तरह वेदाध्ययन व यज्ञ करती और कराती थीं| वे यज्ञ- विद्या और ब्रह्म- विद्या में पारंगत थीं| तैत्तिरीय ब्राह्मण’’ में सोम द्वारा ‘सीता- सावित्री’ ऋषिका को तीन वेद देने का वर्णन विस्तारपूर्वक आता है— तं त्रयो वेदा अन्वसृज्यन्त| अथ ह सीता सावित्री| सोमँ राजानं चकमे| तस्या उ ह त्रीन् वेदान् प्रददौ| -तैत्तिरीय ब्रा०२/३/१०/१,३ इस मन्त्र में बताया गया है कि किस प्रकार सोम ने सीता- सावित्री को तीन वेद दिये|

<<<<<<<<<<<<<<<<||  पाखण्ड की धज्जियां ||>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>

ब्रह्मवादिनी शब्द का अर्थ वेद वादिनी नहीं क्योंकि मन्वादि प्रबल शास्त्रप्रमाणों से उसका सर्वथा निषेध प्राप्त है | ब्रह्म शब्द अनेकार्थावाची होता है इसका अर्थ तप वेद , ब्रह्मा , विप्र प्रजापति (ब्रह्मशब्दं तपो वेदो ब्रह्मा विप्रः) आदि होता है | वैसे भी सामान्य दृष्टि से ब्रह्म + वादिनी = ब्रह्म को कहने वाली यह अर्थ हुआ , ब्रह्म तो वस्तुतः आत्मतत्त्व को कहते हैं आत्मेति तु उपगच्छन्ति ग्राहयन्ति च ब्रह्मसूत्र ४/१/३ ) , यह ॐकारमय वेद भी उसी का वाचक है ( तस्य वाचकः प्रणवः – योगसूत्र १/२७) तूने ये वेदान्तप्रसिद्ध अर्थ क्यों न लिया; वेद ही क्यों लिया बांकी क्यों नहीं ? क्योंकि तुझे मर्कट -उत्पात मचाना है न इसलिए | इतना ही नहीं अपितु अन्न , प्राण , मन , विज्ञान , आनंद , सब को भी प्रसंग प्रकरण से ब्रह्म ही कहते हैं (तैत्तिरीयोप ० भृगुवल्ली ) संस्कृत के किसी भी शब्द का अर्थ करने से पूर्व उसके पूर्वापर प्रकरण , उसके मर्म को , उसके बह्वार्थों को जानना अत्यंत आवश्यक है , अन्यथा वही स्थिति होगी कि भोजनार्थ प्रवृत्त हो रहे व्यक्ति द्वारा नमक मंगाने के लिए सैन्धवमानय ! कहा गया और श्रोता लाया घोड़ा ! (क्योंकि सैन्धव शब्द के नमक और घोडा दो दो अर्थ होते हैं ) अस्तु , उक्त मर्म को समझाने से पूर्व पहले तुम्हारा ध्यान ‘ब्रह्म’ शब्द पर लाते हैं कि ब्रह्म कहते किसको हैं ? इस प्रश्न के उत्तर में स्वयं वेद कहता है कि – ये समस्त प्राणी जिस निरतिशयं निर्विशेषं महत् तत्त्वम् तत्त्व से पैदा होते हैं , जिसमें स्थित रहते और जिस में प्रविष्ट होते हैं , वही जिज्ञास्य तत्त्व ब्रह्म है , उपनिषत्सु प्रतिपादितस्य तत्त्वस्य ‘ब्रह्म’ इति नाम |
यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते | येन जातानि जीवन्ति |
यत् प्रयन्त्यभिसंविशन्ति | तद्विजिज्ञासस्व | तद् ब्रह्मेति || – तैत्तिरीयोपनिषत् ३-१-३

इमानि भूतानि यतो जायन्ते, जातानि येन जीवन्ति, यदेव अभिसंविशन्ति प्रयन्ति, तदेव ब्रह्म,
तदेव विजिज्ञासस्व | अर्थात् – समस्तम् इदम् विश्वं यस्माद् उत्पद्यते, येनैव जीवति, यस्मिन्नेव च लीयते तदेव ब्रह्म | एवं समस्तस्यापि जगतः सृष्टिस्थितिलयकारणभूतं तत्त्वं वेदान्तेषु ब्रह्मशब्देन गीयते | सकलस्यास्य विश्वस्य ब्रह्म उपादानं निमित्तं च कारणं भवति | अतः ब्रह्म नैव कार्यं भवेत् | जगत्कारणत्वेन ब्रह्मण एव प्रतिपादितत्वात् कापिलसांख्यदर्शने प्रतिपादितं प्रधानं वा वैशेषिकदर्शने प्रतिपादितः परमाणुर्वा जगतः कारणं नैव भवति इत्यभिप्रायः ||
अस्तु , अब प्रश्न ये है कि ब्रह्म का ज्ञान कैसे होता है ? अब इसके उत्तर में आगे देखो –

वेद कहता है तपस्या से ब्रह्म को जानो क्योंकि तप ही ब्रह्म है – तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व| तपो ब्रह्मेति| – तैत्तिरीयोपनिषत् / भृगुवल्ली / ० १

अपनी तपस्या से पूर्वकाल में स्त्रियाँ वेद मन्त्रों का साक्षात्कार कर लेतीं थी, उनकी तपस्या क्या है ? स्वधर्म पर चलने से उनको वेद्य तत्त्व का ज्ञान हो जाता था वो तपस्या है स्वधर्मपालन, देव, द्विज, गुरु, प्राज्ञों का पूजन , आर्जव , इन्द्रियों पर निग्रह , अहिंसा ,  इसी  से  वे  पापदेहा  स्त्रियाँ  शुद्धता  को  प्राप्त  होती  हैं  | (देवस्य द्विजस्य आचार्यस्य पण्डितस्य च अर्चनम्, शुद्धता, आर्जवम्, ब्रह्मचर्यम्, अहिंसा च शारीरं तपः इत्युच्यते) –
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् | ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते || (-भगवद्गीता १४/१४ ) ऋषन्ति ज्ञानसंसारयोः पारं गच्छन्ति ऋषयः| ऋषी श गतौ नाम्नीति किः| रिषिर्हसादिश्च| विद्याविदग्धमतयो रिषयः प्रसिद्धाः| इति प्रयोगात्| स्त्रियां ऋषी च| इत्यमरटीकायां भरतः इति हि श्रूयते |अथवा ऋषन्ति अवगच्छन्ति इति ऋषयो मन्त्राः| · ऋषि दर्शनात् (नि०२|१९|१). · स्तोमान् ददर्शेत्यौपमन्यवः| · तद् यद् एतांस्तपस्यमानान् ब्रह्म (वेदं) स्वयम्भवभ्यानर्षत्, त ऋषयोऽभवन्, तद् ऋषिणामृषित्वम्| -निरुक्त २/१९/१ ऋषि गोत्र प्रवर्तक , दीर्घायु , मन्त्रसाक्षात्कर्ता, दिव्यद्रष्टा आदि हुए | दीर्घायुषो मन्त्रकृत ईश्वरा दिव्यचक्षुषः| बुद्धाः प्रत्यक्षधर्माणो गोत्रप्रवर्तकाश्च ये || (वायुपु० पूर्वार्ध ६१/९४ ) ऋषि शब्द का ही स्त्रीत्व विवक्षा में प्रयोग हुआ है ऋषिका , क्यों कहा है ऋषिका ? क्योंकि किसी एक समानधर्म से उसे वह कहा गया , यथा लोक में शौर्य या क्रौर्य आदि किसी सामान धर्म के आधार पर बालक को भी सिंह कह दिया जाता है (सिंहोsयं माणवकः) | क्या समानता है ? समानता है दीर्घायुत्व की , दिव्य-द्रष्टृत्व की , प्रत्यक्षा धर्मा होने की | स्त्रियाँ भी तो दिव्यदर्शिणी हो सकती हैं | किन्तु क्या कभी तुमने किसी ऋषिका के नाम से गोत्र सुना ? नहीं न ! क्यों ? क्या किसी शास्त्र में कभी स्त्रियों की शिष्या परम्परा सुनी ? कोई स्थान विशेष में पाठ शाला पढी , जहां उनको वेदाध्ययन कराया जाता था ? नहीं न ! वो इसलिए क्योंकि उनका ऋषिका होना ऋषियों के मार्ग की भांति न रहा | उनका सिद्धि प्राप्ति का मार्ग दूसरा है | इसी प्रकार वेदोक्य सीता , सावित्री आदि सभी शब्द लौकिक अर्थ तुल्य ग्राह्य नहीं , लौकिक शब्दों तथा वैदिक शब्दों के अर्थ में बहुत भेद होता है | जैसे लोक में कवि शब्द का अर्थ कविता करने वाला होता है किन्तु वेद में त्रिकालज्ञ , लोक में क्रतु का अर्थ यज्ञ होता है किन्तु वेद में इसी शब्द का अर्थ बुद्धि हो जाता है – अग्निर्होता कविक्रतु: (ऋग्वेद , अग्निसूक्त ५ ) वेद के एक ही शब्द का ब्राह्मण ग्रन्थ अनेक अर्थ प्रकाशित करते हैं, विचक्षणता के बिना इसे नहीं समझा जा सकता |  बहुभक्तिवादीनि हि ब्राह्मणानि भवन्ति | पृथिवी वैश्वानर:, संवत्सरो वैश्वानरो, ब्राह्मणो वैश्वानर इति” (- निरुक्त ७/७/२४ ) अस्तु ,
शास्त्रकारों का कथन है कि मनुस्मृति के विरुद्ध जो स्मृति वचन है वह प्रशस्त नहीं माना गया है क्योंकि वेदार्थ के अनुसार निबद्ध होने से सर्वप्रथम मनु की मान्यता है (सर्वधर्ममयो मनु : ) , जैसा कि –

मनुस्मृति विरुद्धा या सा स्मृतिर्न प्रशस्यते |
वेदार्थोपनिबद्धत्त्वात् प्राधान्यं हि मनोः स्मृतेः | | तथाहि ——–>

यद् वै किञ्च मनुरवदत् तद् भेषजम् | ( तैत्तिरीय सं०२/२/१०/२)

मनु र्वै यत् किञ्चावदत् तत् भेषज्यायै | (- ताण्ड्य-महाब्रा०२३/१६/१७)

अथापि निष्प्रचमेव मानव्यो हि प्रजाः | ऋग्वे० १/८०/१६ अपि द्रष्टव्यम् |

……..ये तो हो गया पाराशर संहिता पर द्विविधा स्त्रियो ० और “पुराकल्पे हि नारीणां मौञ्जीबन्ध ० आदि का उत्तर |

अब सुनिए ब्रह्मसूत्रेण पवित्रीकृतकायाम् का उत्तर —>

ब्रह्मसूत्र शब्द विविध अर्थों वाला है , ब्रह्म शब्द के अर्थ तप , वेद , ब्रह्मा , विप्र , प्रजापति आदि माने गए हैं | अतः महाश्वेता स्वधर्म पालन रूप तपस्या से ही पवित्र काया हुई थी ऐसा सिद्ध होता है —->

ब्रह्मशब्दं तपो वेदो ब्रह्मा विप्रः प्रजापतिः इति वचनेन अत्र ब्रह्मसूत्रशब्दस्य तपः सूत्रेण पवित्रीकृतकायामिति तात्पर्यं समीचीनम् | बह्वर्थको हि ब्रह्मसूत्रशब्दः, तथाहि यज्ञोपवीतभिन्नार्थे – ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैरिति गीतायाम् |

अब आगे देखिये –

स्त्री का पति ही उसका गुरु है | शास्त्र कहता है –

गुरुरग्निर्द्विजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः |
पतिरेव गुरुः स्त्रीणां सर्वस्याऽभ्यागतो गुरुः ||
(-पद्मपुराण स्वर्ग॰५१/५१, ब्रह्मपुराण ८०/४७ )
अग्नि द्विजातियोँ का गुरु है, ब्राह्मण चारोँ वर्णोँ का गुरु है, एकमात्र पति ही स्त्रियोँ का गुरु है और अतिथि सबका गुरु है |’   स्त्रियों का जनेऊ संस्कार  घोर पाखंड  है , किं च –

वैवाहिको विधिः स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः स्मृतः |
पतिसेवा गुरौ वासो गृहार्थोँऽग्निपरिक्रिया || (मनुस्मृति २/६७ )

‘स्त्रियोँ के लिये वैवाहिक विधि का पालन ही वैदिक-संस्कार (यज्ञोपवीत), पति की सेवा ही गुरुकुलवास और गृह-कार्य ही अग्निहोत्र कहा गया है |’

इस महामूर्ख मालवीय का परम पूज्य  धर्मसम्राट् स्वामि श्री करपात्री जी महाराज ने ऐसा   भ्रम  भंग  किया  था कि याद कर गया था | ऋषिकेश में तीन दिन तक अपने सुई से लेकर सब्बल तक के सारे तर्क शास्त्रार्थ में ( जिसके मध्यस्थ जयदयाल गोयन्दका आदि रहे ) इसने प्रस्तुत किये , अंततः इस पाखंडी का वही हाल हुआ जो सिंह की खाल पहने हुए सिंह के सम्मुख आकर उसे ललकारने वाले सियार का होता है | पर बेशर्मों  का  क्या  है भला    ! अस्तु  ,
लक्ष्मी ने भागवत विष्णु को सुनाई तो भला इससे स्त्रियों के व्यासासन पर भागवत की सिद्धि कैसे हो गयी लक्ष्मी कोइ स्त्री देह धारिणी मानव तो हैं नही , वे तो सबके हृदय मे व्याप्त स्वयं परमात्मतत्त्व हैं, और आत्मा को लौकिक स्त्रियों के तुल्य किसी एक जाति विशेष से जोड़ लेना ही मूर्खता है, ( त्वं स्त्री त्वं पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारीति श्वेताश्वतरोप० ४/३ ) दूसरी बात ये है कि लक्ष्मी भी व्यासासन पर बैठकर विष्णु को भागवत नहीं सुनातीं अपितु भागवती वार्त्ता वे करती हैं , जिसका अभिप्राय है , भगवान की लीला कथाओं का परस्पर संवाद करना | संवाद अलग चीज है और व्यासासन पूर्वक भागवत अनुष्ठान संपन्न करना अलग | स्वयं श्री भगवान् गीता में कहते हैं कि – येषां चित्तं मयि संलग्नं भवति, येषाम् इन्द्रियाणि मयि सन्ति तादृशाः बुधाः भावसमन्विताः अन्योन्यं मां बोधयन्तः कीर्तयन्तः च सदा सन्तोषं प्राप्नुवन्ति, मय्येव च विहरन्ति यथा – –

मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् |

कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च || (-श्रीमद्भागवद्गीता १०/९ )

वे दृढ निश्चयवाले मेरे भक्तजन निरन्तर मेरे नाम और गुणोंका कीर्तन करते हुए तथा मेरी प्राप्तिके लिये यत्न करते हुए सदा मेरे ध्यानमें युक्त होकर अनन्य प्रेमसे मेरी उपासना करते हैं |
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः |
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते || (-श्रीमद्भागवद्गीता ९/१४)

स्वयं को वेद की अधिकारिणी बना कर जिस भागवत को ये स्त्रियां व्यासासन से सुनाना चाहती है, वह किस मुख से उसका पारायण करती हैं ? क्योंकि स्वयं श्रीमद्भागवत ही उनको अनधिकारिणी बता रही है यथा – स्त्रीशूद्रद्विजबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा| (- श्रीमद्भागवत १/४/२५) महर्षि वेदव्यास से अधिक जानकार तो होंगे नहीं आप !

प्रत्येक द्वापर युग में विष्णु व्यास के रूप में अवतरित होकर वेदों के विभाग प्रस्तुत करते हैं| इस प्रकार अट्ठाईस बार वेदों का विभाजन किया गया| पहले द्वापर में स्वयं ब्रह्मा वेदव्यास हुए, दूसरे में प्रजापति, तीसरे द्वापर में शुक्राचार्य , चौथे में बृहस्पति वेदव्यास हुए| इसी प्रकार सूर्य, मृत्यु, इन्द्र, धनजंय, कृष्ण द्वैपायन अश्वत्थामा आदि अट्ठाईस वेदव्यास हुए| समय-समय पर वेदों का विभाजन किस प्रकार से हुआ, इसके लिए यह एक उदाहरण प्रस्तुत है| कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने ब्रह्मा की प्रेरणा से चार शिष्यों को चार वेद पढ़ाये—
(१) मुनि पैल को ॠग्वेद
(२) वैशंपायन को यजुर्वेद
(३) जैमिनि को सामवेद
(४) सुमन्तु को अथर्ववेद

महर्षि वेदव्यास के ये उत्तराधिकारी पुरुष ही थे , स्त्री नहीं और इनकी जो परम्परा चली वह भी पुरुषों में ही चली , जो अद्यावधि पर्यन्त स्व-स्व शाखाध्यायी ब्राह्मण पुरुषों में विस्तार को प्राप्त होकर व्याप्त है | केवल महर्षि वेदव्यास के साक्षात् शिष्यों अथवा उनकी शिष्य परम्परा में आने वाले पुरुषों को ही व्यास आसन पर बैठने का अधिकार है |
मनुस्मृति ने स्पष्ट किया है कि स्त्रियाँ निरिन्द्रिय, मन्त्ररहिता, असत्यस्वरूपिणी हैं- निरिन्द्रिया ह्यमन्त्राश्च स्त्रियोऽनृतमिति स्थिति:| —मनु० ९/१८
स्त्री पापयोनि है , उसके जन्म का कारण पाप है , इस विषय में गीता का यह श्लोक स्पष्ट प्रमाण है –

हे अर्जुन ! स्त्री, वैश्य, शूद्र या पापयोनि- चाण्डालादि चाहे जो कोई भी हों, वे यदि मेरे आश्रित हो, तो परमगतिको ही प्राप्त होते हैं –

मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः |
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् || (- श्रीमद्भगवद्गीता९/ ३२)

आक्षेप – यहाँ ‘पापयोनि’ –यह शब्द स्त्रियों वैश्यों आदि का विशेषण मानना आयुक्त है क्योंकि छान्दोग्योपनिषद् में वैश्य को उत्तमयोनि कहा अतः श्रुति विरुद्ध अर्थ अग्राह्य है |

समाधान – “रमणीयां योनिम्” विशेषण ही कहा है , “पुण्ययोनिम्” नहीं कह दिया है जो शुरू हो गए हो खंडन करने ; गीतोक्त “पापयोनि” का निषेध नहीं हुआ है यहाँ ! पापयोनि शब्द का अर्थ ही तुमको ज्ञात नहीं अन्यथा ये भारी भूल न करते ! स्त्री वैश्य तथा शूद्र के प्रति “पापयोनि” विशेषण की संगति करने वाले आचार्य शंकर स्वयं यहाँ स्पष्ट करते हैं कि द्विजत्व की प्राप्ति में पुण्यत्व नहीं है -ऐसी बात नहीं पुण्यत्व तो है , तभी तो द्विजत्व मिला | इसलिये वे इस मन्त्र पर लिखते हैं – /// रमणीयचरणेनोपलक्षितः शोभनोऽनुशयः पुण्यं कर्म येषां ते रमणीयचरणा: ////, //// ये तु रमणीयचरणा द्विजातयस्ते // आदि (तत्रैव शांकरभाष्य )
……………… अतः ज्ञातव्य ये है कि मानव योनि में जन्म लेने वाला जीव , स्त्री वैश्य और शूद्र – इन तीन के रूप में पाप के प्रभाव से जन्म लेता है और ब्राह्मण – इस योनि में पुण्य के प्रभाव से | याने पूर्वपुण्य का प्रभाव इनको मानव तो बना देता है किन्तु पाप का प्रभाव ही इनको ब्राह्मण पुरुष नहीं बनने देता , ये सिद्धान्त है अन्यथा तो ब्राह्मण ही होते वैश्य या शूद्र क्यों होते ? इसलिए पापयोनि हैं |जन्तूनां नरजन्म दुर्लभमतः पुंस्त्वं ततो विप्रता-इत्यादिपूर्वक यही मर्म भगवान् शंकर ने विवेकचूडामणि में समझाया है अर्थात् संसार में जन्म लेने वालों में पहले तो नर जन्म ही दुर्लभ होता है, फिर पुरुषत्व मिलना दुर्लभ है , मानव जन्म हो गया , पुरुष भी हो गया तो फिर ब्राह्मण होना तो और भी दुर्लभ होता है |

अभी अभिधारणा और दृढ होगी , आगे देखो –

प्रश्न – उत्तम योनि कह दिया तो स्पष्ट है अधम योनि तो है नहीं ! दिन है कह दिया तो स्पष्ट है कि रात नहीं है |

उत्तर – ये तर्क तो तब काम करता जब श्रुति ने पुण्ययोनि विशेषण श्रुति ने दिया होता , सो तो दिया नहीं | तो फिर कैसे कहते हो कि पापयोनि का न होना सिद्ध हुआ ? यहाँ रमणीय विशेषण पर “शास्त्रीयचरणम् आचरणम् कर्मं येषां तथाभूताः ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यसम्बन्धिनीं रमणीयां निजोद्धारक्षमां योनिम् आपद्यन्ते ” ऐसा राघवकृपाभाष्यकार का कथन है , (तत्रैव, राघवकृपाभाष्य पृष्ठ ५६०) याने के जिनको शास्त्रीय आचरणपूर्वक स्वयं का उद्धार करने की सक्षमता है वे हैं रमणीयचरण – ऐसा कह रहे हैं अर्थात् स्पष्ट है कि द्विजत्वप्राप्तिपूर्वक शास्त्रीय विधि-निषेध कासम्पादन करने वाली योनियाँ – ये अभिप्राय राघवकृपाभाष्यकार कहना चाहते हैं| (अर्थात् पुण्ययोनि के स्थान पर शास्त्रीय आचरण में सक्षम योनि -ऐसा अभिप्राय स्वीकृत किया है ) अब बताइये क्या कहोगे ?

पुनश्च यहाँ तो द्विजत्वप्राप्ति में सक्षम या कहिये शास्त्रीयविधिनिषेधों के पालन के अधिकारी योनियों का ही पृथकीकरण हुआ ! तो कहाँ पर गीतोक्त “पापयोनि ” विशेषण का खंडन हुआ है यहाँ भला ? ये पापयोनि द्विजत्व प्राप्ति की अधिकारिणी योनियाँ नहीं हैं ऐसा तो आचार्य शंकर ने कहा नहीं ! (अर्थात् न हैं कहा न नहीं हैं कहा ), वे तो उतना ही बोल रहे हैं जितना कि अखण्डनीय सिद्धान्त है , फिर आक्षेप किस आधार पर ?

पापयोनि, पुण्ययोनि , पापकर्मा , पुण्यकर्मा – प्रत्येक शब्द स्वयं में अलग -अलग अभिप्राय लिए है | पुण्यकर्मा होकर पाप – प्राधान्यत्वेन पापयोनि हो सकता है, पापकर्मा होकर पुण्य-प्राधान्यत्वेन पुण्ययोनि हो सकता है | -ये शास्त्रीय सिद्धान्त है |

अस्तु , आगे चलिए –

क्या ये सिद्धांत है कहीं वर्णित कि द्विजत्व की अधिकारिणी योनि पापयोनि हो ही नहीं सकती ? “पुण्ययोनि” विशेषण यदि द्विजमात्र को प्राप्त हो जावे तब तो आपका मत संगतहो सकता है किन्तु ऐसा भी नहीं ; ये तो केवल ब्राह्मण को ही श्री भगवान द्वारा स्वीकृत है |

किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या ——तत्रैव गीतायाम् ९/३३

यहाँ पुण्या से पुण्ययोनयः – ऐसा ही अर्थ उचित है क्योंकि पीछे से पापयोनि विषयकपूर्वार्ध स्पष्ट हुआ है |

बांकी इस स्त्रियो वैश्यास्तथा० पर वेंकटनाथ वेदान्तदेशिक ने इस श्लोक की व्याख्या पर देखो कैसे समझाते हैं आप हठधर्मियों को –

///त्रैवर्णिकस्य विद्यादिमतोsपि वैश्यस्य शूद्रादिभिः सह पापयोनित्वेन परिगणनं सत्रानधिकारित्वात् /// ……इस प्रकार सविस्तार आप आक्षेपकर्त्ताओं की हठधर्मिता की धज्जियां वेदान्तदेशिकाचार्य ने सविस्तार उडाई ही की है , स्वयं पढ़ना उठाकर ,तुम्हारे लिए इतना संकेत ही बहुत है |



|| जय श्रीराम ||

सोमवार, 27 अप्रैल 2020

क्या बाल्मीकि रामायण में मिलावट हुई है, क्या सीता परित्याग(पुनः वनगमन) शम्बूक बध कभी हुआ ही नहीं!

क्या सीताजी का पुनः वनगमन नहीं हुआ !

आज यह प्रश्न फिर उठा है, क्योंकि कुछ बड़े सन्तों ने और कवि से राजनेता बने और कथावाचक बनने का प्रयास करने वालों ने कहा , ऐसा हुआ ही नहीं यह मिलावट हुई है । और यदि है तो तुलसीदास जी ने क्यों नहीं लिखा (तो अन्य ग्रंथों में तो लिखा है उसके प्रमाण क्रमशः देंगें)

पर जानते हैं इस पर संदेह फैलाने वाले पहले व्यक्ति
1949 में कामिल बुल्के(पादरी) ने लिखा था बाल्मीकि रामायण में उत्तर काण्ड प्रक्षिप्त(मिलावट है) ! सीता परित्याग/लवकुश का वन में जन्म हुआ ही नहीं । (तर्कों के साथ)

उस समय उत्तर मिला था - वस्तुतः ऐसे कथन उत्तरदायित्व हीन हैं, किसी ठोस प्रमाण के अभाव में किसी भी ग्रंथ के किसी भी अंश को मिलावट कह देना, और उन्हीं अंशों में से अपने स्वार्थानुसार कुछ अंशों को स्वीकार कर लेना साभिप्राय कुतर्क ही है,
कहने वाले से पूछा जाये किसने मिलावट की क्यों की कब की किस वर्ष मास तिथि में तो उत्तर नहीं दे पायेंगे ।
• उत्तर काण्ड (सीता परित्याग इत्यादि ) को प्रक्षिप्त (मिलावट) कह देना, अर्ध कुक्कुटी न्याय है,
• और फिर पूर्णतः तर्कों के साथ इसका खण्डन करने वालेथे ब्रह्मलीन
धर्म सम्राट जगद्गुरु स्वामी श्री करपात्री जी महाराज

आगे क्रमशः प्रमाण मिलेंगे, और जो ऊपर लिखा है उसका भी नि:संदेह प्रमाण मांग सकते हैं ।
क्रमशः ! 
अब आते हैं, उनके दूसरे तर्क पर
कि बाल्मीकि रामायण में लिखा है, गर्भवती श्री सीता परित्याग/लवकुश का वन में जन्म पर तुलसीदास जी ने नहीं लिखा (इसलिये मानते हैं कि बाल्मीकि रामायण में मिलावट हुई है)
उत्तर - ठीक कहा तुलसीकृत रामचरितमानस में नहीं लिखा पर उसमें बहुत सी बातें नहीं लिखीं, जैसे शत्रुघ्न जी द्वारा लवणासुर को मारकर मथुरा पुरी बसाना आदि। तो क्या यह सभी असत्य है ।
कहाँ लिखा है, यद्यपि यहाँ बाल्मीकि रामायण के प्रमाण नहीं देगें क्योंकि आप उसे प्रक्षिप्त मानते हैं,
• श्रीमद्भागवत नवम् स्कन्ध अध्याय 11, 8 से 11 श्लोकों में देखिये स्पष्ट लिखा है, श्रीराम द्वारा लोकोपवाद के भय से श्री सीता जी का गर्भावस्था में परित्याग, बाल्मीकि आश्रम में ही लवकुश जन्म ।
• अग्निपुराण 11वाँ अध्याय, 10 से 13वें श्लोक तक, उपरोक्त लिखा हुआ स्पष्ट लिखा है ।
• पद्मपुराण पाताल खण्ड, में स्पष्ट रूप से इसी वर्णन के साथ धोबी के पूर्वजन्म व माता सीता को श्राप लगने का वर्णन है श्रीराम अश्वमेध यज्ञ प्रसंग में (संक्षिप्त पद्मपुराण geetaprees page 513-519)
और फिर भी ना मानें तो बतायें, रामायण में 24000 श्लोक हैं, जिनकी संख्या पुराणों में उल्लेखित है, तो यदि 500-600श्लोक मिलावट हैं, तो अब भी संख्या 24000 क्यों,? क्रमशः,,,


 तृतीय- श्रीसीता परित्याग(पुनः वन गमन) और लवकुश का जन्म वन में, हुआ ही नहीं, उत्तर काण्ड प्रक्षिप्त (मिलावट) है, ऐसा कुछ विद्वान कहते हैं, --- प्रसंग में क्रमशः,,,,,
पिछले भाग में, पुराणों से प्रमाण दिया कि श्रीसीता परित्याग(धोबी ने अपशब्द कहे) और लवकुश जन्म वन में, यह वहाँ भी लिखा है । अब वो कह सकते हैं, पुराणों में भी मिलावट हो सकती है।
तो आपको ज्ञात होगा महाकवि कालिदास जी द्वारा रचित रघुवंश महाकाव्य में भी यही लिखा है कुछ श्लोक देखते हैं,




यह प्रमाण, 14वें सर्ग के 31 वें श्लोक से प्रारम्भ होकर ,15 वें सर्ग में भी है । वही सब लिखा है सीता परित्याग लवकुश जन्म उत्तर काण्ड,
अब क्या कहेंगे यह भी प्रक्षिप्त है यहाँ भी मिलावट है ? पर
वस्तुतः कोई मिलावट नहीं है, उत्तर काण्ड सहित पुरी बाल्मीकि रामायण वही है, जो बाल्मीकि जी ने लिखी ।
क्रमशः,,,,,





बुधवार, 11 दिसंबर 2019

नष्ट धन/फंसा हुआ धन - वापिस प्राप्ति के लिए श्रीकार्तवीर्यार्जुन (अनुष्ठान मन्त्र)

       




                           ॥श्रीकार्तवीर्यार्जुनाय नमः ।।





विनियोगः -
      ॐ अस्य श्री कार्तवीर्यार्जुनमन्त्रस्य दत्तात्रेय ऋषिः
अनुष्टप् छन्दः श्री कार्तवीर्यार्जुनो देवता कामनासिद्धयर्थे
जपे विनियोगः
 
   
करन्यासः -
ॐ दत्तात्रेयप्रियतमाय - अङ्गष्ठाभ्यां नमः
ॐ माहिष्मतीनाथाय. तर्जनीभ्यां नमः
ॐ रेवाजलक्रीडासक्ताय मध्यमाभ्यां नमः
ॐ हैहयाधिपतये अनामिकाभ्यां नमः
ॐ सहस्रबाहवे - कनिष्ठिकाभ्यां नमः
   
       ऊँ दत्तात्रेय प्रियतमाय, माहिष्मतीनाथाय,
रेव्राजलक्रीडासक्ताय, हैहयाधिपतये, सहस्त्रबाहवे नमः,
करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।।
 
   हृदयादिन्यासः -

ऊँ दत्तात्रेयप्रियतमाय - हृदयाय नमः
ॐ माहिष्मतीनाथाय - शिरसे स्वाहा 
ॐ रेवाजलक्रीडासक्ताय - शिखायैवषट्
ॐ हैहयाधिपतये - कवचाय हुम्
ॐ सहस्रबाहवे - नेत्रत्रयाय वौषट्
ॐ दत्तात्रेय - प्रियतमाय, माहिष्मतीनाथाय,
रेवाजलक्रीडासक्ताय, हैहयाधिपतये, सहस्त्रबाहवे नमः,अस्त्राय फट् ।

                      ध्यानम् -

सहस्रबाहुं सशरं सचापं,

             रक्ताम्बरं रक्तकिरीटकुण्डलम् ।
चौरादिदुष्टभयनाशनमिष्टदं तं,

              वन्दे महाबलविजृम्भितकार्तवीर्यम् ।।

मूलमन्त्र

ॐ नमो भगवते श्री कार्तवीर्यार्जुनाय हैहयनाथाय
कार्तवीर्यार्जुन सहस्रकर - सदृश - सर्व - दुष्टान्तक सर्वानुदधे
आगन्तुकास्मदवस्तुविलुम्पकान् चौरसमूहान् चक्रसहस्रा
कर्षयाकर्षय स्वचापोदगत - बाणसह्रैः भिन्धि भिन्धि,
स्वहस्तोद्गत - मुसलसहस्त्रैर्भीषयभीषय, स्वशङ्खोद्गत
नादिसहस्त्रैन्निकृन्तय निकून्तय त्रासय त्रासय गर्जय गर्जय
आकर्षयाकर्षय भ्रामय भ्रामय मोहय मोहय उन्मादयोन्मादय
तापय तापय विदारय विदारय स्तम्भय स्तम्भय निकृन्तयः
"कृन्तय मारय मारय उत्पाटयोत्पाटय   उच्चाटयोच्चाटय विनाशय विनाशय वशीकुरु कुरु चौरसमूहान् सम्यगन्मूलयोन्मूलय हुं फट् स्वाहा ॥

             समर्पण-ध्यानम्
 
दोर्दण्डैकसहस्रसम्मितकरेष्वेतेष्वजस्त्रंदधत्,
कोदण्डं स्वशरैरुदनविशिखैरुद्यद्विवस्वत्प्रभः ।
ब्रह्माण्डं परिपूरयन्स्विदखिलं गण्डस्थलालोलितम्,
द्योतत्कुण्डलमण्डितंविजयतेश्रीकार्तवीर्यार्जुनः।। १ ।।
ॐ कार्तवीर्यार्जुनो नाम राजा बाहुसहस्रभृत् ।
तस्य स्मरणमात्रेण हृतं नष्टञ्च लभ्यते ।।२।।
ॐ कार्तवीर्यः खलद्वेषी कृतवीर्यसुतो बली ।
सहस्रबाहुः शत्रुघ्नो रक्तवासा धनुर्धरः ।। ३ ।।
रक्तगन्धो रक्तमाल्यो राजा स्मर्तुरभीष्टदः)।
द्वादशैतानि नामानि कार्तवीर्यस्य यः पठेत् ।। ४ ।।
अनष्टद्रव्यता तस्य नष्टद्रव्यस्यचागमः ।
सम्पदस्तस्य जायन्ते राजानश्च वशङ्गताः ।।५ ।।
आनयेत्स तु दूरस्थं क्षेमलाभयुतं प्रियम् ।
हैहयाधिपतेः स्तोत्रं सहस्रावर्तितं यदि ।
वाञ्छितार्थफलं दद्यात् शूद्राद्यैर्न श्रुतं यदि ।।६।।
दक्षे पञ्चशतं बाणान् वामे पञ्चशतं धनुः ।
तमेव शरणं प्राप्तः सर्वतो रक्ष रक्ष माम ।। ७ ।।

।। श्रीकार्तवीर्यार्जुनस्तोत्रं सम्पूर्णम्॥॥

    किसी ने आपका धन लिया है वापिस नहीं कर रहा है - कहीं किसी कारण वश आपको मिलने वाला धन फंसा हुआ है है, तो यह अनुष्ठान (मन्त्र जप)  11000 
किसी (इसकी विधि के जानकार) ब्राह्मण द्वारा कराये जाने पर निश्चित ही उस धन की प्राप्ति होती है ||


नोट- यह कहीं से कापी नहीं किया है लिखने में यदि कुछ त्रुटि रह गई हो तो अवश्य सूचित करें, 
      धन्यवाद 🙏🙏🙏 ऊँ काली



नरसिंह कवचम् (सर्वव्याधि विनाशक)

                 
               श्रीनृसिंहकवचम्


 ध्यानम्
             वागीशा यस्य वदने लक्ष्मीर्यस्य च वक्षसि ।
             यस्यास्ते हृदये संवित् तं नृसिंहमहं भजे ।।
 श्रीनारदउवाच

 इन्द्रादिदेववृन्देश, ईड्येश्वर जगत्पते
महाविष्णो नृसिंहस्य कवचं ब्रूहि मे प्रभो ।।
 यस्य प्रपठनाद् विद्वांस्त्रैलोक्यविजयीभवेत्

ब्रह्मोवाच शृणु नारद वक्ष्यामि पुत्र श्रेष्ठ तपोधन ।
 कवचं नरसिंहस्य त्रैलोक्यविजयाभिधम् ।।
यस्य प्रपठनाद् वाग्मी त्रैलोक्यविजयी भवेत् ।
स्त्ष्टाऽहं जगतां वत्स पठ्नाद् धारणाद्यतः ।।
लक्ष्मीर्जगत्त्रयं पाति संहर्ता च महेश्वरः ।
 पाठाद्धारणाद्देवा बभूवुश्च दिगीश्वराः ।।

 ब्रह्ममन्त्रमयं वक्ष्ये भ्रान्त्यादिविनिवारकम् ।
 यस्य प्रसादादुर्वासस्त्रैलोक्य विजयो मुनिः ।।
 पठनाद्धारणाद्यस्य शास्ता च क्रोध भैरवः ।
त्रैलोक्य विजयस्यास्य कवचस्य प्रजापतिः ॥
 ऋषिश्छन्दश्च गायत्री नृसिंहो देवता विभुः ।
चतुर्वर्गे च शान्तौ च विनियोगः प्रकीर्तितः ।।
 क्षौं बीजं मे शिरः पातु चन्द्रवर्णोमहामनुः ।।

 नृसिंह-कवचम्
             अथ मन्त्रः
ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम् ।
 नृसिंह भीषणं भद्रं मृत्यु-मृत्युं नमाम्यहम् ।
 द्वात्रिंशदक्षरो मन्त्रो मन्त्रराजः सुरद्रुमः ।
कण्ठं पातु ध्रुवं क्षौं हृद् भगवते चक्षुषी मनः ।।

नरसिंहाय च तथाऽग्निनेत्राय च नासिका।
 सर्वरक्षोघ्नाय च सर्वभूतहिताय च ।।
सर्वज्वरविनाशाय दह दह पच पच द्वयम् ।
रक्ष रक्ष वर्म चास्त्रं स्वाहा पातु मुखं मम ।।
तारादि रामचन्द्राय नमः पायाद् गुदं मम ।
 क्लीं पायाद् भुजयुग्मं च तारं नमः पदन्ततः
नारायणाय पार्श्वञ्च आं ह्रीं क्रौँ छौँ च हुंफट् ।
 षडक्षरः कटिं पातु नमो भगवते पदम् ।
वासुदेवाय पृष्ठं क्लीं कृष्णाय क्लीं ऊरु द्वयम् ।।
क्लीं कृष्णाय सदा पातु जानुनी च मनूत्तमः ।
क्लीं ग्लौं क्लीं श्यामलाङ्गाय नमः पायात्पदद्वयम् ।।
क्षौं नृसिंहाय क्षौं च सर्वाङ्गे मे सदावतु ।


      फलश्रुति

 इति कथितं वत्स सर्वमन्त्रौघविग्रहम् ।
 तव स्नेहान्मयाख्यातं प्रवक्तव्यं न कस्यचित् ।
 गुरुपूजां विधायाथ गृह्णीयात् कवचं ततः ।
सर्वपुण्ययुतो भूत्वा सर्वसिद्धियुतो भवेत् ।
 शतमष्टोत्तरञ्चास्य पुरश्चर्याविधिः स्मृतः ।
हवनादीन् दशांशेन कृत्वा तत्साधयेद् ध्रुवम् ।।
 ततस्तु सिद्धकवचः पुण्यात्मा मदनोपमः ।।
 स्पद्द्धामुद्धय भवने लक्ष्मीर्वाणी वसेन्मुखे ।।
पुष्पाञ्जल्यष्टकं दत्वा मूलेनैव पठेत् सकृत् ।
 अपि वर्षसहस्राणां पूजानां फलमाप्नुयात् ॥
 भूर्जे विलिख्य गुटिकां स्वर्णस्थां धारयेद्यदि ।
 कण्ठे वा दक्षिणे बाहौ नरसिंहो भवेत् स्वयम् ।।
 योषिद् वामभुजे चैव पुरुषो दक्षिणे भुजे ।
विभृयाद् कवचं पुण्यं सर्वसिद्धियुतो भवेत् ।
 काकबन्ध्या च या नारी मृतवत्सा च या भवेत् ।
जन्मबन्ध्या नष्टपुष्पा बहुपुत्रवती भवेत् ।।
कवचस्य प्रसादेन जीवन्मुक्तो भवेन्नरः ।
त्रैलोक्यं क्षोभयत्येव त्रैलोक्यविजयी भवेत् ।।
 भूतप्रेतपिशाचाश्च राक्षसा दानवाश्च ये ।।
तं दृष्ट्वा प्रपलायन्ते देशाद् देशान्तरं ध्रुवम् ।।
यस्मिन् गेहे च कवचं ग्रामे वा यदि तिष्ठति ।
तं देशन्तु परित्यज्य प्रयान्ति चाति दूरतः ।। 
तप्त-हाटक-केशाग्र-ज्वलत्पावकलोचने ।
वज्राधिक-नखस्पर्श-दिव्यसिंह नमोऽस्तुते ।।

 || इति ब्रह्मसंहितायां त्रैलोक्यविजयं श्रीनृसिंहकवचं सम्पूर्णम् ।।


विशेष-  इस कवच का  पाठ या अनुष्ठान करने से पूर्व गुरु आज्ञा एवं किसी जानकार शास्त्रज्ञ द्वारा सलाह अवश्य लें- निश्चित करलें आप इस कवच को करने के योग्य हैं अथवा नहीं, ,
                 
 नोट- यह कहीं से कापी नहीं किया है लिखने में यदि कुछ त्रुटि रह              गई  हो तो अवश्य सूचित करें,
   
                     धन्यवाद

                               🙏  ॥॥ऊँ काली॥॥