रविवार, 22 मार्च 2026
सप्तशती में हवन
चंडीपाठ में कवच, अर्गला ,कीलक और कुंजिका स्तोत्र से हवन नहीं करना चाहिए सप्रमाण प्रस्तुति~
यो मूर्ख: कवचं हुत्वा प्रतिवाचं नरेश्वरः ।
स्वदेह - पतनं तस्य नरकं च प्रपद्यते ।।
अन्धकश्चैव महादैत्यो दुर्गाहोम-परायणः ।
कवचाहुति - प्रभावेण महेशेन निपातितः ।।
कवच में पाहि, अवतु, रक्ष रक्ष, रक्षतु, पातु आदि शब्दों का प्रयोग हुआ रहता है।
सप्तशती के चतुर्थ अध्याय के 4 मंत्र से इसी कारण होम नहीं होता है।
#सिद्ध #कुंजिका स्तोत्र का होम न करने की आज्ञा स्वयं महादेव नें दी है
इसका प्रथम कारण है की ,
कुंजिका देवी सिद्धियों की एकमात्र कुंजी है ।
ओर कुंजी का रक्षण किया जाता है आहूत नहीं किया जा सकता ।
यदि यदि कुंजी का ही लोप हो जाएगा तो सिद्धी के द्वार का खुलना असम्भव हो जाएगा ।
दूसरा कारण यह की
सप्तशती में आता है की याचना स्तोत्र , कवच एवं कवच मन्त्रों की आहुति नहीं की जाती अन्यथा विनाश ही होता है ।
|| अथ प्रमाण ||
#कवचं #वार्गलाचैव ,#कीलकोकुंजिकास्तथा ।
#स्वप्नेकुर्वन्नहोमं #च ,#जुहुयात्सर्वत्रनष्ट्यते: ।।
भगवान शिव भैरव स्वरूप में स्थित होकर कहते हैं !
कवच , अर्गला , कीलक , तथा कुंजिका का होम स्वप्न में भी न करें
स्वप्न मात्र में भी होम करने से सर्वत्र नाश की संभावनाएँ प्रकट हो जाती है ।
#बुद्धिनाषोहुजेत् #देवि,#अर्गलाऽनर्गलोभवेत् ।
#सिद्धीर्नाषगत:#होता, #विद्यां #च #विस्मृतोर्भभवेत् ।।
अर्गला के होमकर्म से सिद्धीयों का नाश हो जाता है । तथा होता की समस्त विद्याएँ विस्मृत हो जाती है , अर्गला अनर्गल सिद्ध हो जाती है ।
#कीलितोजायतेमन्त्र: ,#होमे #वा #कीलकस्तथा ।
#ममकण्ठसमंयस्य: ,#कीलकोत्कीलकं #हि #च ।।
कीलक के होमकर्म से होता के समस्त मन्त्र सदा सर्वदा के लिए कीलित हो जाते हैं ।
इसे मेरा उत्किलित कण्ठ ही जानें जो जो कीलक का कारक है ।
#धनधान्ययुतंभद्रे ,#पुत्र:#प्राण:#विनष्यते: ।
#रोगशोकोर्व्रिते:#कृत्वा,कवचंहोमकर्मण: ।।
कवच के होम से धन,धान्य, पुत्र तथा प्राण का विनाश निश्चित है एवं वह होता रोग तथा शोकों से घिर जाता है ।
स्वप्ने वा हुज्यते देवि ,* *कुंजिकायं च कुंजिकां ।
षड्मासे च भवेन्मृत्यु , सत्यं सत्यं न संशय: ।
होमे च कुंजिकायास्तु ,* *सकुटुम्बंविनाश्यती: ।
कुंजिका के होमकर्म के प्रभाव से होता की छः मास में मृत्यु निश्चित जानें तथा होता का सकूटुंब विनाश हो जाता है यह सत्य है परम सत्य है इसमें कोई संशय नहीं करना चाहिए ।
शास्त्री प्रवीण त्रिवेदी
■यस्यं च दोषमात्रेण ,प्रसन्नार्मृत्युदेवता: ।
कुंजिकाहोममात्रेण ,रावण:प्रलयंगत: ।।
इसी के दोष से मृत्युदेवता अत्यंत प्रसन्न होकर होता का सकूटुंब भक्षण करते हैं ।
कुंजिका के होममात्र के प्रभाव से ही रावण का सम्पूर्ण विनाश सम्भव हुआ ।
■भैरवयामले भैरवभैरवी संवादे ।।
चतुर्विंश प्रभागे होमप्रकरणे ।।
■मातृका:बीजसंयुक्ता: ,प्राणाप्राणविबोधिनी ।
प्राणदा:कुंजिका:मायां ,सर्वप्राण:प्रभाविनी ।।
कुंजिका में बीज मातृकाएँ उपस्थित हैं ।
प्राण को देविप्राण का बोधप्रदान करती हैं ।
यह प्राणज्ञान प्रदान करने वाली महामाया कुंजिका प्राण को प्रभावित करने वाली हैं ।
।। शक्तियामले शक्तिहोमप्रकरणे ।।
साभार 🙏डाॅ मंगल दत्त द्विवेदी
शनिवार, 23 जुलाई 2022
मंगल दोष
प्रायः यदि मंगल बृहस्पति से युक्त अथवा दृष्ट हो तो यह घोषणा कर दी जाती है कि मंगल-दोष समाप्त हो गया । किन्तु यह विचार सत्य से नितान्त परे है। आघु निक शोध कार्यों द्वारा सिद्ध हो चुका है एवं मेरे अनुभव द्वारा भी प्रमाणित हो चुका है कि मंगल के साथ बृहस्पति की संयुति कुज-दोष को अनेक आयामों में परिवर्तित कर देती है । इस सन्दर्भ में कल्याणवर्मा की सारावली का गम्भीरतापूर्वक अनुशीलन करना चाहिए। अतएव यदि मंगल १, २, ४, ७, ८ एवं १२वें भाव में संस्थित हो एवं बृहस्पति से युक्त हो, अथवा बृहस्पति और मंगल एक दूसरे से सप्तमस्य हों तो कु-दोष सहस्राधिक परिवर्द्धित मानना चाहिए ।
यदि शुक्र, मंगल और बृहस्पति सहसंस्थित हों, परस्पर सप्तमस्थ हों, परस्पर केन्द्र गत हों तो कुज-दोष अत्यन्त तीक्ष्ण हो जाता है।
उपर्युक्त दोनों स्थितियों में न्यायोचित होगा कि मंगल दोष के निरस्तीकरण के लिए वर कन्या के जन्मांगों में एक ही प्रवृत्ति का कुज-दोष हो । यदि कन्या की कुण्डली में बृहस्पति के प्रभाव-स्वरूप कुज दोष की तीक्ष्णता परिवर्तित हो रही हो तोवर के जन्मांग में भी ऐसा ही संयोग होना चाहिए । अन्यथा विघटनात्मक स्थितियाँ समुत्पन्न हो जाती हैं।
यदि कन्या के जन्मांग में मंगल अष्टम भावस्थ हो तो वर के जन्मांग में मंगल सप्तमभावस्थ नहीं होना चाहिए । प्रायः इस स्थिति में ज्योतिषी मंगल दोष विनष्ट होने का अनुमान कर लेते हैं । किन्तु दोनों जन्मांगों में कुज दोष उपस्थित होने का सिद्धान्त यहाँ व्यवहार्य नहीं है । वर की कुण्डली का सप्तमभावस्थ मंगल पत्नी के स्वास्थ्य के निमित्त विपरीत है एवं कन्या की कुण्डली का अष्टमभावस्थ मंगल उसके अपने स्वास्थ्य के लिए विध्वंसक है। इस प्रवृत्ति के जन्मांगों की तुलना करते समय विवाह की अनुमति नहीं प्रदान करनी चाहिए। अन्यथा पाणिगृहीता पत्नी असाध्य व्याधि से ग्रस्त रहती है अथवा अकाल-काल-कवलित होती है ।
यदि जन्मांग में दोपयुक्त मंगल शनि से युक्त अथवा दृष्ट हो तो मंगल-दोप परिवद्धित हो जाता है ।
बृहस्पति की राशि में संस्थित मंगल दोष की दृष्टि से अत्यन्त घातक होता है । इस पर विशिष्ट शोध हुई है । सारावली में कल्याणवर्मा ने मंगल की इस स्थिति को अशुभ बताया है । परस्पर सप्तमस्थ शनि-मंगल मंगलदोष को वद्धित करते हैं ।
यद्यपि स्वगृही मंगल अपेक्षाकृत न्यून घातक होता है किन्तु मेष राशि संस्थित मंगल
प्रवल घातक होता है ।
पापाक्रान्त मंगल अत्यन्त दोषपूर्ण सिद्ध होता है ।
उपर्युक्त स्थितियों के सतर्क परीक्षण निरीक्षण के उपरान्त हो किसी निष्कर्ष की
घोषणा करनी उचित होगी। मंगल की अपवाद परक दोष स्थितियाँ
मंगल दोष के विषय में अन्तिम अथवा अन्यतम निर्णय देने के पूर्व स्थितियों और योगों का भली-भाँति अध्ययन करना चाहिए । किंचित् असावधानी अत्यन्त घातक निष्कर्ष प्रदान कर सकती है । मंगल दोष के संदर्भ में निम्नलिखित अपवादों को सर्वदा चिन्तन-पटल पर चेतन रखना चाहिए। इन स्थितियों में मंगल-दोष नहीं होता :
यदि मंगल चतुर्थ अथवा सप्तम भावस्य हो तथा किसी क्रूर ग्रह से युक्त या दृष्ट न हो एवं इन भावों में मेष, कर्क, वृश्चिक अथवा मकर राशियाँ विनियोजित हों । यदि लग्न, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम अथवा द्वादश भाव में सबल चन्द्र, बृहस्पति अथवा बुध की मंगल के साथ सहसंस्थिति हो ।
यदि वृष या तुला राशि परक मंगल चतुर्थ अथवा सप्तम भावस्थ हो ।
यदि मिथुन अथवा कन्या परक मंगल द्वितीय भावस्थ हो । यदि बृहस्पति की राशि में अष्टमभावस्थ मंगल हो । परन्तु मंगल वृहस्पति की
शोध के पश्चात् यह स्थिति मंगल दोष में वृद्धि का कारण है न कि निरस्तीकरण का
यदि मंगल कर्क अथवा मकर राशिगत हो ।
यदि मंगल अश्विनी, मघा अथवा मूल नक्षत्र में संस्थित हो ।
की राशि में द्वादशभावस्य मंगल हो । यदि शुक्र
यदि अष्टमभावस्थ मंगल से युक्त जन्मांग की लग्न कर्क या सिंह हो ।
यदि वृष अथवा सिंह लग्न संयुक्त जन्मांग में मंगल द्वितीय भावस्थ हो ।
यदि मंगल सूर्य की राशि अथवा चन्द्र की राशि अथवा आत्मोच्च राशि में अथवा
अर्थात् यदि वर और कन्या के जन्मांग में मंगल द्वितीय, द्वादश, चतुर्थ, सप्तम, अथवा अष्टम भाव में लग्न, चन्द्र अथवा शुक्र से समभाव में स्थित हो तो समता का मंगलदोष होने के कारण वह प्रभावहीन हो जाता है । परस्पर सुख, धनधान्य, संतति, स्वास्थ्य एवं मित्रादि की उपलब्धि रहती है ।
जामित्रे च यदा सौरिलग्ने वा हिदुकेऽथवा । अष्टमे द्वादशे वाऽपि भौमदोषविनाशकृत् ॥
अर्थात् यदि एक जन्मांग में मंगल १, २. ३, ४, ७, ८, १२ में संस्थित हो तथा द्वितीय जन्मांग में शनि इन्हीं भावों में से किसी में संस्थित हो तो मंगल दोष निरस्त हो जाता है ।
सबले गुरौ भृगौ वा लग्ने द्यूनेऽपि वाऽथवा भीमे ।
वक्रिणि नीचगृहे वार्कस्थे न कुजदोषः ॥ अर्थात् यदि लग्न अथवा सप्तम भाव में शुक्र अथवा वृहस्पति संस्थित हो एवं मंगल दुर्बल हो ऐसा कहा गया है परन्तु शोध से सिद्ध हुआ कि मंगल पर बृह स्पति के प्रभाव से मंगल दोष में वृद्धि होती है ।
यदि मंगल शनि द्वारा संचालित राशि में हो । उपर्युक्त योग-संयोगों के परिणामस्वरूप मंगल-दोष नहीं होता । अतएव इन्हें कंठाग्र कर लेना चाहिए ।
मंगल दोष के परिहार :
मंगल-दोष ने जनमानस में आतंक के इतने सशक्त सूत्र प्रारोपित कर लिये हैं कि मंगली जातक अथवा जातिका का विवाह एक दुर्धर्षं समस्या बन जाती है । किन्तु सुविधानित माध्यमों से विचार करने पर इसके परिहार के अनेकानेक विन्दु स्पष्ट हो जाते हैं | मंगल—दोष को सुनिश्चित करने के अनन्तर निम्नांकित निदानों का आचार्या नुमोदित उपयोग-प्रयोग करना चाहिए ।
मंगल दोष दूषित जातिका को एक पंचमुखी दीप प्रज्ज्वलित करके मंगल ग्रह एवं अपने इष्ट का सविधि पोडशोपचार अथवा पंचोपचार पूजन करना चाहिए। पूजनो परान्त श्री मंगल चण्डिका स्तोत्र का १०८ दिवस तक नित्यप्रति ७ अथवा २१ जप करना चाहिए ।
"रक्ष रक्ष जगन्मातर्देवि मंगलचंडिके ।
हारिके विपदां राशे हर्षमंगलकारिके ॥
हर्षमंगलदक्षे हर्ष मंगलदायिके ।
शुभे मंगलदक्षे च शुभे मंगलचंडिके ॥
मंगले मंगला च सर्वमंगलमंगले । सदा मंगलदे देवि सर्वेषां मंगलालये ॥ "
माँ गौरी का पंचमुखी दीप प्रज्ज्वलित करके पंचोपचार अथवा षोडशोपचार पूजन करना चाहिए। तत्पश्चात् १०८ दिन तक ७ अथवा २१ वार पार्वती स्वयंवर का पाठ करना चाहिए ।
"बालार्कायुतसत्प्रभां करतले लोलम्बमालाकुलां मालां सन्दधतीं मनोहरतनुं मन्दस्मितोद्यन्मुखीम् ।
मन्दं मन्दमुपेयुषीं वरयितुं शंभु जगन्मोहिनीं
बन्दे देवमुनीन्द्रवन्दितपदां इष्टार्थदां पार्वतीम् ॥ " मंगल असमराशि - संस्थित होने पर भगवान् सुब्रह्मण्यम् की आराधना करनी हितकर होती है ।
मंगल समराशि - संस्थित होने पर अम्बाला की उपासना करनी चाहिए । मंगल के वैदिक मंत्र का १०८ दिवस तक ७ अथवा २१ माला जप करना चाहिए। जाशु प्रभाव के लिए १०,००० आवृत्ति में जप का एक पुरश्चरण करना चाहिए ।
यदि कन्या भीषण मंगल-दोष दूषित हो तो भावी सौभाग्य को समयोचित करने के लिए कुम्भ, पीपल अथवा विष्णु वर की प्राणप्रतिष्ठित प्रतिमा के साथ परिक्रमा करके चिरंचीव वर के साथ परिणय सम्पन्न हो तो दोप प्रभावी नहीं होता, पुनर्विवाह का दोष भी आक्षेपित होने से मुक्ति मिलती है । यह क्रिया अत्यन्त गुप्त रूप से सम्पन्न होनी चाहिए। उल्लेखनीय है कि कन्या स्वयं आस्पद (कुम्भ, पीपल, विष्णु ) का वरण करे । पिता इसमें निष्क्रिय रहे क्योंकि शास्त्रानुसार कन्या का दान एक बार ही किया जाता है । यदि वर से पूर्व आस्पद को कन्या दान दे दिया जायेगा तो पुनः दान का महापाप आरोपित होगा। अतएव पूर्व परिणय में कन्या स्वयं वरण करे । किन्तु यह परिणय सुपर्णं विधि विधान के साथ निष्पन्न हो, अन्यथा दोष का प्रामाणिक परिहार नहीं होगा । गोपनीयता इस विधि की प्राथमिक और अंतिम प्रतिक्षा होनी चाहिए । परिणय के निमित्त प्रेषणीय लग्न पत्रिका से पूर्व वह परिहार प्रक्रिया संपन्न होनी चाहिए ।
अमंगल व अशुभ की निवृत्ति व शुभ की सिद्धि के लिए मंगल यंत्र प्रयोग एक अमोघ उपाय सिद्ध हुआ है इसका विधान इस प्रकार है ।
सावित्री व्रत
मंगल दोष दूषित जातिकाओं को सविधि-सश्रद्धा सावित्री व्रत का अनुष्ठान करना चाहिए। इस व्रत का विधि-विस्तार प्रतादि से संबद्ध अध्याय में उद्द्भुत है।
मंगला गौरी व्रत
वैधव्य दोष नाश के लिये यह सर्वोत्तम व्रत है जो स्वयं भगवान् शंकर ने सनत्कुमार को बताया था ।
किसी कन्या के जन्मांग में यदि प्रबल कुज दोप हो अथवा वैधव्य कारक ग्रह संस्थित हों तो इस व्रत को निश्चय ही करना चाहिये। इस व्रत को ५ वर्ष तक कर लेने पर वृद्धावस्था में भी वैधव्य नहीं प्राप्त होता है। यह एक अत्यन्त परीक्षित प्रयोग है।
मंगल दोष निर्धारण एक तुलनामत्क गणितीय प्रविधि
प्रस्तुत विवेचन अत्यन्त विरलज्ञात तथ्य है । इस प्रविधि से मङ्गल दोष दूषित जन्मांगों का विश्लेषण करके प्रामाणिक रूपेण दोप की क्षमता की घोषणा की जा सकती है । प्रायः मङ्गली जातिका का परिणय मङ्गली जातक से करने की शास्त्रानु मोदित लोकरीति है। किन्तु मेलापक के समय मात्र सामान्य रूप से दृष्टिपात उचित नहीं होता, दोष की प्रभाववत्ता एवं भावानुसार उसकी फलवत्ता पर भी ध्यान केन्द्रित रहना चाहिए, यथा चतुर्थ भावस्य अथवा द्वादश भावस्थ मङ्गल मष्टमभावस्थ अथवा सप्तम भावस्थ मङ्गल की अपेक्षा न्यून प्रहार क्षमता रखता है । अतएव इनकी परस्पर तुलना करके दोप के विरेचित होने का निर्णय भ्रामक सिद्ध होता है । वर्तमान काल में ज्योतिष के एक विश्वविद्युत व्यक्तित्व ने स्वमत दिया है कि वर-वधू के जन्मांगों का तुलनात्मक गणितीय विश्लेषण करके निष्कर्ष प्राप्त करना चाहिए कि किसका मङ्गल दोष प्रबल है और किसका क्षीण बल ।
मङ्गल, शनि, सूर्य, राहु और केतु क्रूर ग्रह परिगणित किये गये हैं । इनके १, २, ४, ७, ८, १२ भाव में संस्थित होने से किसी न किसी सन्दर्भ में अवांछित क्लेशद परिस्थितियां समुत्पन्न होती हैं। इनका भी तुलनात्मक विवेचन करना चाहिए । यथा उच्चराशिस्थ मङ्गल शत्रुराशिस्थ अथवा नीचराशिस्थ मङ्गल की अपेक्षा कम, दूषित होता है । दृष्टि इत्यादि के परिणामस्वरूप परिवर्तित परिवर्द्धित होता रहता है । उनकी प्रभावक्षमता एवं मारक क्षमता की भारात्मकता निम्नलिखित प्रविधि से उपलब्ध करनी चाहिए :
स्वगृही हो ।
यदि स्वराशिगत मङ्गल चतुर्थ, सप्तम, अष्टम अथवा द्वादश भावस्थ हो ।
यदि चतुर्थ भावस्य मङ्गला अथवा वृष राशिगत हो ।
यदि द्वादशभावस्थ मङ्गल कन्या, मिथुन, वृष अथवा तुला राशिगत हो । दम्पत्योर्जन्मकाले व्ययधनहियुके सप्तमे लग्नरन्ध्रे
लग्नाच्चन्द्राच्च शुक्रादपि भवति यदा भूमिपुत्रो द्वयोर्वे । तत्साम्यात्पुत्रमित्रप्रचुरधनपती दम्पती दीर्घकालं
जीवतामेकहा न भवति मृतिरिति प्रातुरनात्रिमुख्याः ॥सावित्री व्रत
मंगल दोष दूषित जातिकाओं को सविधि-सश्रद्धा सावित्री व्रत का अनुष्ठान करना चाहिए। इस व्रत का विधि-विस्तार प्रतादि से संबद्ध अध्याय में उद्द्भुत है।
मंगला गौरी व्रत
वैधव्य दोष नाश के लिये यह सर्वोत्तम व्रत है जो स्वयं भगवान् शंकर ने सनत्कुमार को बताया था ।
किसी कन्या के जन्मांग में यदि प्रबल कुज दोप हो अथवा वैधव्य कारक ग्रह संस्थित हों तो इस व्रत को निश्चय ही करना चाहिये। इस व्रत को ५ वर्ष तक कर लेने पर वृद्धावस्था में भी वैधव्य नहीं प्राप्त होता है। यह एक अत्यन्त परीक्षित प्रयोग है।
मंगल दोष निर्धारण एक तुलनामत्क गणितीय प्रविधि
प्रस्तुत विवेचन अत्यन्त विरलज्ञात तथ्य है । इस प्रविधि से मङ्गल दोष दूषित जन्मांगों का विश्लेषण करके प्रामाणिक रूपेण दोप की क्षमता की घोषणा की जा सकती है । प्रायः मङ्गली जातिका का परिणय मङ्गली जातक से करने की शास्त्रानु मोदित लोकरीति है। किन्तु मेलापक के समय मात्र सामान्य रूप से दृष्टिपात उचित नहीं होता, दोष की प्रभाववत्ता एवं भावानुसार उसकी फलवत्ता पर भी ध्यान केन्द्रित रहना चाहिए, यथा चतुर्थ भावस्य अथवा द्वादश भावस्थ मङ्गल मष्टमभावस्थ अथवा सप्तम भावस्थ मङ्गल की अपेक्षा न्यून प्रहार क्षमता रखता है । अतएव इनकी परस्पर तुलना करके दोप के विरेचित होने का निर्णय भ्रामक सिद्ध होता है । वर्तमान काल में ज्योतिष के एक विश्वविद्युत व्यक्तित्व ने स्वमत दिया है कि वर-वधू के जन्मांगों का तुलनात्मक गणितीय विश्लेषण करके निष्कर्ष प्राप्त करना चाहिए कि किसका मङ्गल दोष प्रबल है और किसका क्षीण बल ।
मङ्गल, शनि, सूर्य, राहु और केतु क्रूर ग्रह परिगणित किये गये हैं । इनके १, २, ४, ७, ८, १२ भाव में संस्थित होने से किसी न किसी सन्दर्भ में अवांछित क्लेशद परिस्थितियां समुत्पन्न होती हैं। इनका भी तुलनात्मक विवेचन करना चाहिए । यथा उच्चराशिस्थ मङ्गल शत्रुराशिस्थ अथवा नीचराशिस्थ मङ्गल की अपेक्षा कम, दूषित होता है । दृष्टि इत्यादि के परिणामस्वरूप परिवर्तित परिवर्द्धित होता रहता है । उनकी प्रभावक्षमता एवं मारक क्षमता की भारात्मकता निम्नलिखित प्रविधि से उपलब्ध करनी चाहिए :वर कन्या के जन्मांग में मंगल दोष की तुलना
अष्टम
सप्तम
चतुर्थ
द्वादश
मंगल शनि
सूर्य मंगल
शनि
राहू
राह
केतु
केतु
१००
७५
५०
३७.५०
सूर्य
नीच राशि में
५०
२५
९०
६७.५०
४५
४५
३३७५
२२.५०
पु राशि में
सम राशि में
८०
६०
४०
४०
३०.०० ३५ ३५ २६-२५ १७.५०-२
२०.००
७०
५२.५०
६०
४५
३०
मित्र राशि में
स्व राशि में
३०
२२.५० १५००
उच्च राशि में
५० ३७५०
२५ २५ १८.७५ १२५०
उपरिअंकित तालिका में एक विशिष्ट तथ्य का समावेश है । मंगल का दोष १,२,४,७,८,१२ भाव में सर्वाधिक होता है । मंगल शनि राहु और केतु इन स्थानों में ७५ प्रतिशत दुपकत्व रखते हैं । सूर्य इन भावों में ५० प्रतिशत ही दोष-वल प्रदर्शित करता है। इन विन्दुओं का अन्तर् - अनुधावन उपरिस्थित तालिका में है ।
तालिका के निर्देश में वर-कन्या के जन्मांगों का मंगल दोष के सन्दर्भ में सतर्क तुलनात्मक गणितीय विश्लेषण करना चाहिए। यदि कन्या के जन्मांग में मंगल दोष को दोष-क्षमता वर के जन्मांग की तुलना में मात्र २५ प्रतिशत अधिक है तो परिणय निश्चित किया जा सकता है, अन्यथा नहीं। यदि वर के जम्मांग का मंगल दोष कन्या के जन्मांग की अपेक्षा परिवर्धमान हो तो परिणय का निषेध करना चाहिए। उपर्युक्त तालिकापरक विश्लेषण ज्योतिष-गौरव डॉ० बी० वी० रामन् के एक सिद्धान्त को केन्द्रीय तत्व मानकर प्रारूपित किया गया है ।
इस प्रकार विषय समाहार करते हुये कहा जा सकता है कि मङ्गल दोष एक
विवादास्पद एवं महत्वपूर्ण विषय है। अतएव सर्वप्रथम जन्मांग में मंगल दोष का
सुविधानित निश्चय करना चाहिए। ध्यान रखना चाहिए कि दोष-निरस्ति का कोई
सूत्र तो व्यवहृत नहीं हो रहा है। इस संदर्भ में मङ्गल की अपवादपरक दोषस्थितियों
का अभिज्ञान अत्यन्त सहायक होगा। यदि मङ्गल-दोष निरस्त नहीं हो रहा है तो
परिहार के प्रयास सक्रिय करने चाहिए। परिहार का चयन दोष की तीक्ष्णता अथवा
निर्बलता के आधार पर किया जाता है । किन्तु दूषित होने पर परिहार अन्यतम.
आवश्यकता है । अन्यथा दाम्पत्य विघटन के अध्याय का पुरोवाक् ही सिद्ध होगा 1.
जनसामान्य में इस संदर्भ में जो भ्रान्तियां प्रचलित है एवं जिन अनर्गल तथ्यों का
गहित स्वार्थों के लिए भयात्मक प्रचार करके चंचुप्रवेशी ज्योतिषाचार्य स्थितियों की
वक्र व्याख्या करते हैं, उनके विषय में उपरिविवेचित शोध बिन्दुओं का अवलंब ग्रहण
करके आख्या, आख्यायक एवं आख्येय को रेखांकितेय बनाया जा सकता है।
-:०: साभार डॉ. आशुतोष जी. 🙏
शुक्रवार, 12 जून 2020
क्या स्त्रियों को , व्यास पीठ पर बैठने या यज्ञोपवीत का अधिकार है !
पराशर-संहिता के भाष्यकार तथा वैष्णव परंपरा के परम आचार्य मध्वाचार्य जी ने अपनी टीका में लिखा है -“द्विविधा स्त्रियो ब्रह्मवादिन्यः सद्योवधवश्च| तत्र ब्रह्वादिनीनाम् उपनयनम् अग्निबन्धनम् वेदाध्ययनम् स्वगृहे भिक्षा इति, वधूनाम् तु उपस्थिते विवाहे कथंचित् उपनयनं कृत्वा विवाहः कार्यः|” अर्थात् दो प्रकार की स्त्रियाँ होती हैं- एक ब्रह्मवादिनी जिनका उपनयन होता है और जो अग्निहोत्र , वेदाध्ययन तथा अपने घर में भिक्षावृत्ति (घर के लोगों की निष्काम सेवा तथा स्वेच्छा से मिले अन्न-धन से जीवन यापन) करती हैं | दूसरी श्रेणी (सद्योवधु) की स्त्रियाँ वे हैं जिनका शीघ्र ही विवाह होना होता है और इनका भी उपनयन-संस्कार करने के उपरांत ही विवाह करना चाहिए| गोभिलीय गृह्यसूत्र चर्चा आती है :”प्रावृतां यज्ञोपवीतिनीम् अभ्युदानयन् जपेत्, सोमोsददत् गन्धर्वाय इति” अर्थात् कन्या को कपडा पहने हुए, यज्ञोपवीत पहना कर पति के निकट लाकर कहे :”सोमोsददत्”|साथ ही, एक श्लोक है (सन्दर्भ ग्रन्थ मुझे याद नहीं आ रहा) : “पुराकल्पे हि नारीणां मौञ्जीबन्धनमिष्यते| अध्यापनं च वेदानां सावित्रीवाचनं तथा||” अर्थात् प्राचीन-काल में स्त्रियों का यज्ञोपवीत होता था, वे वेद शास्त्रों का अध्ययन करती थीं| ७ वीं शताब्दी में सम्राट हर्षवर्धन की रानी महाश्वेता का वर्णन करते हुए अपने महाकाव्य कादम्बरी में बाणभट्ट ने लिखा है : “ब्रह्मसूत्रेण पवित्रीकृतकायाम्” अर्थात् ब्रह्मसूत्र को धारण करने के कारण पवित्र शरीर वाली | मालवीय जी भी स्त्रियों की वेदादि शिक्षा के प्रबल पक्षधर रहे | लक्ष्मी ने विष्णु भगवान को भागवत सुनाई |ऋग्वेद १०| ८५ में सम्पूर्ण मन्त्रों की ऋषिका ‘सूर्या- सावित्री’ है| ऋषि का अर्थ निरुक्त में इस प्रकार किया है—‘‘ऋषिर्दर्शनात्| स्तोमान् ददर्शेति (२.११)| ऋषयो मन्त्रद्रष्टर: (२.११ दु. वृ.)|’’ अर्थात् मन्त्रों का द्रष्टा उनके रहस्यों को समझकर प्रचार करने वाला ऋषि होता है| ऋग्वेद की ऋषिकाओं की सूची बृहद् देवता के दूसरे अध्याय में इस प्रकार है— घोषा, गोधा, विश्ववारा, अपाला, उपनिषद्, निषद्, ब्रह्मजाया (जुहू), अगस्त्य की भगिनी, अदिति, इन्द्राणी और इन्द्र की माता, सरमा, रोमशा, उर्वशी, लोपामुद्रा और नदियाँ, यमी, शश्वती, श्री, लाक्षा, सार्पराज्ञी, वाक्, श्रद्धा, मेधा, दक्षिणा, रात्री और सूर्या- सावित्री आदि सभी ब्रह्मवादिनी हैं| ऋग्वेद के १०- १३४, १०- ३९, ४०, १०- ९१, १०- ९५, १०- १०७, १०- १०९, १०- १५४, १०- १५९, १०- १८९, ५- २८, ८- ९१ आदि सूक्त की मन्त्रदृष्टा ये ऋषिकाएँ हैं| ऐसे अनेक प्रमाण मिलते हैं, जिनसे स्पष्ट होता है कि स्त्रियाँ भी पुरुषों की तरह वेदाध्ययन व यज्ञ करती और कराती थीं| वे यज्ञ- विद्या और ब्रह्म- विद्या में पारंगत थीं| तैत्तिरीय ब्राह्मण’’ में सोम द्वारा ‘सीता- सावित्री’ ऋषिका को तीन वेद देने का वर्णन विस्तारपूर्वक आता है— तं त्रयो वेदा अन्वसृज्यन्त| अथ ह सीता सावित्री| सोमँ राजानं चकमे| तस्या उ ह त्रीन् वेदान् प्रददौ| -तैत्तिरीय ब्रा०२/३/१०/१,३ इस मन्त्र में बताया गया है कि किस प्रकार सोम ने सीता- सावित्री को तीन वेद दिये|
<<<<<<<<<<<<<<<<|| पाखण्ड की धज्जियां ||>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>
ब्रह्मवादिनी शब्द का अर्थ वेद वादिनी नहीं क्योंकि मन्वादि प्रबल शास्त्रप्रमाणों से उसका सर्वथा निषेध प्राप्त है | ब्रह्म शब्द अनेकार्थावाची होता है इसका अर्थ तप वेद , ब्रह्मा , विप्र प्रजापति (ब्रह्मशब्दं तपो वेदो ब्रह्मा विप्रः) आदि होता है | वैसे भी सामान्य दृष्टि से ब्रह्म + वादिनी = ब्रह्म को कहने वाली यह अर्थ हुआ , ब्रह्म तो वस्तुतः आत्मतत्त्व को कहते हैं आत्मेति तु उपगच्छन्ति ग्राहयन्ति च ब्रह्मसूत्र ४/१/३ ) , यह ॐकारमय वेद भी उसी का वाचक है ( तस्य वाचकः प्रणवः – योगसूत्र १/२७) तूने ये वेदान्तप्रसिद्ध अर्थ क्यों न लिया; वेद ही क्यों लिया बांकी क्यों नहीं ? क्योंकि तुझे मर्कट -उत्पात मचाना है न इसलिए | इतना ही नहीं अपितु अन्न , प्राण , मन , विज्ञान , आनंद , सब को भी प्रसंग प्रकरण से ब्रह्म ही कहते हैं (तैत्तिरीयोप ० भृगुवल्ली ) संस्कृत के किसी भी शब्द का अर्थ करने से पूर्व उसके पूर्वापर प्रकरण , उसके मर्म को , उसके बह्वार्थों को जानना अत्यंत आवश्यक है , अन्यथा वही स्थिति होगी कि भोजनार्थ प्रवृत्त हो रहे व्यक्ति द्वारा नमक मंगाने के लिए सैन्धवमानय ! कहा गया और श्रोता लाया घोड़ा ! (क्योंकि सैन्धव शब्द के नमक और घोडा दो दो अर्थ होते हैं ) अस्तु , उक्त मर्म को समझाने से पूर्व पहले तुम्हारा ध्यान ‘ब्रह्म’ शब्द पर लाते हैं कि ब्रह्म कहते किसको हैं ? इस प्रश्न के उत्तर में स्वयं वेद कहता है कि – ये समस्त प्राणी जिस निरतिशयं निर्विशेषं महत् तत्त्वम् तत्त्व से पैदा होते हैं , जिसमें स्थित रहते और जिस में प्रविष्ट होते हैं , वही जिज्ञास्य तत्त्व ब्रह्म है , उपनिषत्सु प्रतिपादितस्य तत्त्वस्य ‘ब्रह्म’ इति नाम |
यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते | येन जातानि जीवन्ति |
यत् प्रयन्त्यभिसंविशन्ति | तद्विजिज्ञासस्व | तद् ब्रह्मेति || – तैत्तिरीयोपनिषत् ३-१-३
इमानि भूतानि यतो जायन्ते, जातानि येन जीवन्ति, यदेव अभिसंविशन्ति प्रयन्ति, तदेव ब्रह्म,
तदेव विजिज्ञासस्व | अर्थात् – समस्तम् इदम् विश्वं यस्माद् उत्पद्यते, येनैव जीवति, यस्मिन्नेव च लीयते तदेव ब्रह्म | एवं समस्तस्यापि जगतः सृष्टिस्थितिलयकारणभूतं तत्त्वं वेदान्तेषु ब्रह्मशब्देन गीयते | सकलस्यास्य विश्वस्य ब्रह्म उपादानं निमित्तं च कारणं भवति | अतः ब्रह्म नैव कार्यं भवेत् | जगत्कारणत्वेन ब्रह्मण एव प्रतिपादितत्वात् कापिलसांख्यदर्शने प्रतिपादितं प्रधानं वा वैशेषिकदर्शने प्रतिपादितः परमाणुर्वा जगतः कारणं नैव भवति इत्यभिप्रायः ||
अस्तु , अब प्रश्न ये है कि ब्रह्म का ज्ञान कैसे होता है ? अब इसके उत्तर में आगे देखो –
वेद कहता है तपस्या से ब्रह्म को जानो क्योंकि तप ही ब्रह्म है – तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व| तपो ब्रह्मेति| – तैत्तिरीयोपनिषत् / भृगुवल्ली / ० १
अपनी तपस्या से पूर्वकाल में स्त्रियाँ वेद मन्त्रों का साक्षात्कार कर लेतीं थी, उनकी तपस्या क्या है ? स्वधर्म पर चलने से उनको वेद्य तत्त्व का ज्ञान हो जाता था वो तपस्या है स्वधर्मपालन, देव, द्विज, गुरु, प्राज्ञों का पूजन , आर्जव , इन्द्रियों पर निग्रह , अहिंसा , इसी से वे पापदेहा स्त्रियाँ शुद्धता को प्राप्त होती हैं | (देवस्य द्विजस्य आचार्यस्य पण्डितस्य च अर्चनम्, शुद्धता, आर्जवम्, ब्रह्मचर्यम्, अहिंसा च शारीरं तपः इत्युच्यते) –
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् | ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते || (-भगवद्गीता १४/१४ ) ऋषन्ति ज्ञानसंसारयोः पारं गच्छन्ति ऋषयः| ऋषी श गतौ नाम्नीति किः| रिषिर्हसादिश्च| विद्याविदग्धमतयो रिषयः प्रसिद्धाः| इति प्रयोगात्| स्त्रियां ऋषी च| इत्यमरटीकायां भरतः इति हि श्रूयते |अथवा ऋषन्ति अवगच्छन्ति इति ऋषयो मन्त्राः| · ऋषि दर्शनात् (नि०२|१९|१). · स्तोमान् ददर्शेत्यौपमन्यवः| · तद् यद् एतांस्तपस्यमानान् ब्रह्म (वेदं) स्वयम्भवभ्यानर्षत्, त ऋषयोऽभवन्, तद् ऋषिणामृषित्वम्| -निरुक्त २/१९/१ ऋषि गोत्र प्रवर्तक , दीर्घायु , मन्त्रसाक्षात्कर्ता, दिव्यद्रष्टा आदि हुए | दीर्घायुषो मन्त्रकृत ईश्वरा दिव्यचक्षुषः| बुद्धाः प्रत्यक्षधर्माणो गोत्रप्रवर्तकाश्च ये || (वायुपु० पूर्वार्ध ६१/९४ ) ऋषि शब्द का ही स्त्रीत्व विवक्षा में प्रयोग हुआ है ऋषिका , क्यों कहा है ऋषिका ? क्योंकि किसी एक समानधर्म से उसे वह कहा गया , यथा लोक में शौर्य या क्रौर्य आदि किसी सामान धर्म के आधार पर बालक को भी सिंह कह दिया जाता है (सिंहोsयं माणवकः) | क्या समानता है ? समानता है दीर्घायुत्व की , दिव्य-द्रष्टृत्व की , प्रत्यक्षा धर्मा होने की | स्त्रियाँ भी तो दिव्यदर्शिणी हो सकती हैं | किन्तु क्या कभी तुमने किसी ऋषिका के नाम से गोत्र सुना ? नहीं न ! क्यों ? क्या किसी शास्त्र में कभी स्त्रियों की शिष्या परम्परा सुनी ? कोई स्थान विशेष में पाठ शाला पढी , जहां उनको वेदाध्ययन कराया जाता था ? नहीं न ! वो इसलिए क्योंकि उनका ऋषिका होना ऋषियों के मार्ग की भांति न रहा | उनका सिद्धि प्राप्ति का मार्ग दूसरा है | इसी प्रकार वेदोक्य सीता , सावित्री आदि सभी शब्द लौकिक अर्थ तुल्य ग्राह्य नहीं , लौकिक शब्दों तथा वैदिक शब्दों के अर्थ में बहुत भेद होता है | जैसे लोक में कवि शब्द का अर्थ कविता करने वाला होता है किन्तु वेद में त्रिकालज्ञ , लोक में क्रतु का अर्थ यज्ञ होता है किन्तु वेद में इसी शब्द का अर्थ बुद्धि हो जाता है – अग्निर्होता कविक्रतु: (ऋग्वेद , अग्निसूक्त ५ ) वेद के एक ही शब्द का ब्राह्मण ग्रन्थ अनेक अर्थ प्रकाशित करते हैं, विचक्षणता के बिना इसे नहीं समझा जा सकता | बहुभक्तिवादीनि हि ब्राह्मणानि भवन्ति | पृथिवी वैश्वानर:, संवत्सरो वैश्वानरो, ब्राह्मणो वैश्वानर इति” (- निरुक्त ७/७/२४ ) अस्तु ,
शास्त्रकारों का कथन है कि मनुस्मृति के विरुद्ध जो स्मृति वचन है वह प्रशस्त नहीं माना गया है क्योंकि वेदार्थ के अनुसार निबद्ध होने से सर्वप्रथम मनु की मान्यता है (सर्वधर्ममयो मनु : ) , जैसा कि –
मनुस्मृति विरुद्धा या सा स्मृतिर्न प्रशस्यते |
वेदार्थोपनिबद्धत्त्वात् प्राधान्यं हि मनोः स्मृतेः | | तथाहि ——–>
यद् वै किञ्च मनुरवदत् तद् भेषजम् | ( तैत्तिरीय सं०२/२/१०/२)
मनु र्वै यत् किञ्चावदत् तत् भेषज्यायै | (- ताण्ड्य-महाब्रा०२३/१६/१७)
अथापि निष्प्रचमेव मानव्यो हि प्रजाः | ऋग्वे० १/८०/१६ अपि द्रष्टव्यम् |
……..ये तो हो गया पाराशर संहिता पर द्विविधा स्त्रियो ० और “पुराकल्पे हि नारीणां मौञ्जीबन्ध ० आदि का उत्तर |
अब सुनिए ब्रह्मसूत्रेण पवित्रीकृतकायाम् का उत्तर —>
ब्रह्मसूत्र शब्द विविध अर्थों वाला है , ब्रह्म शब्द के अर्थ तप , वेद , ब्रह्मा , विप्र , प्रजापति आदि माने गए हैं | अतः महाश्वेता स्वधर्म पालन रूप तपस्या से ही पवित्र काया हुई थी ऐसा सिद्ध होता है —->
ब्रह्मशब्दं तपो वेदो ब्रह्मा विप्रः प्रजापतिः इति वचनेन अत्र ब्रह्मसूत्रशब्दस्य तपः सूत्रेण पवित्रीकृतकायामिति तात्पर्यं समीचीनम् | बह्वर्थको हि ब्रह्मसूत्रशब्दः, तथाहि यज्ञोपवीतभिन्नार्थे – ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैरिति गीतायाम् |
अब आगे देखिये –
स्त्री का पति ही उसका गुरु है | शास्त्र कहता है –
गुरुरग्निर्द्विजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः |
पतिरेव गुरुः स्त्रीणां सर्वस्याऽभ्यागतो गुरुः ||
(-पद्मपुराण स्वर्ग॰५१/५१, ब्रह्मपुराण ८०/४७ )
अग्नि द्विजातियोँ का गुरु है, ब्राह्मण चारोँ वर्णोँ का गुरु है, एकमात्र पति ही स्त्रियोँ का गुरु है और अतिथि सबका गुरु है |’ स्त्रियों का जनेऊ संस्कार घोर पाखंड है , किं च –
वैवाहिको विधिः स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः स्मृतः |
पतिसेवा गुरौ वासो गृहार्थोँऽग्निपरिक्रिया || (मनुस्मृति २/६७ )
‘स्त्रियोँ के लिये वैवाहिक विधि का पालन ही वैदिक-संस्कार (यज्ञोपवीत), पति की सेवा ही गुरुकुलवास और गृह-कार्य ही अग्निहोत्र कहा गया है |’
इस महामूर्ख मालवीय का परम पूज्य धर्मसम्राट् स्वामि श्री करपात्री जी महाराज ने ऐसा भ्रम भंग किया था कि याद कर गया था | ऋषिकेश में तीन दिन तक अपने सुई से लेकर सब्बल तक के सारे तर्क शास्त्रार्थ में ( जिसके मध्यस्थ जयदयाल गोयन्दका आदि रहे ) इसने प्रस्तुत किये , अंततः इस पाखंडी का वही हाल हुआ जो सिंह की खाल पहने हुए सिंह के सम्मुख आकर उसे ललकारने वाले सियार का होता है | पर बेशर्मों का क्या है भला ! अस्तु ,
लक्ष्मी ने भागवत विष्णु को सुनाई तो भला इससे स्त्रियों के व्यासासन पर भागवत की सिद्धि कैसे हो गयी लक्ष्मी कोइ स्त्री देह धारिणी मानव तो हैं नही , वे तो सबके हृदय मे व्याप्त स्वयं परमात्मतत्त्व हैं, और आत्मा को लौकिक स्त्रियों के तुल्य किसी एक जाति विशेष से जोड़ लेना ही मूर्खता है, ( त्वं स्त्री त्वं पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारीति श्वेताश्वतरोप० ४/३ ) दूसरी बात ये है कि लक्ष्मी भी व्यासासन पर बैठकर विष्णु को भागवत नहीं सुनातीं अपितु भागवती वार्त्ता वे करती हैं , जिसका अभिप्राय है , भगवान की लीला कथाओं का परस्पर संवाद करना | संवाद अलग चीज है और व्यासासन पूर्वक भागवत अनुष्ठान संपन्न करना अलग | स्वयं श्री भगवान् गीता में कहते हैं कि – येषां चित्तं मयि संलग्नं भवति, येषाम् इन्द्रियाणि मयि सन्ति तादृशाः बुधाः भावसमन्विताः अन्योन्यं मां बोधयन्तः कीर्तयन्तः च सदा सन्तोषं प्राप्नुवन्ति, मय्येव च विहरन्ति यथा – –
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् |
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च || (-श्रीमद्भागवद्गीता १०/९ )
वे दृढ निश्चयवाले मेरे भक्तजन निरन्तर मेरे नाम और गुणोंका कीर्तन करते हुए तथा मेरी प्राप्तिके लिये यत्न करते हुए सदा मेरे ध्यानमें युक्त होकर अनन्य प्रेमसे मेरी उपासना करते हैं |
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः |
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते || (-श्रीमद्भागवद्गीता ९/१४)
स्वयं को वेद की अधिकारिणी बना कर जिस भागवत को ये स्त्रियां व्यासासन से सुनाना चाहती है, वह किस मुख से उसका पारायण करती हैं ? क्योंकि स्वयं श्रीमद्भागवत ही उनको अनधिकारिणी बता रही है यथा – स्त्रीशूद्रद्विजबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा| (- श्रीमद्भागवत १/४/२५) महर्षि वेदव्यास से अधिक जानकार तो होंगे नहीं आप !
प्रत्येक द्वापर युग में विष्णु व्यास के रूप में अवतरित होकर वेदों के विभाग प्रस्तुत करते हैं| इस प्रकार अट्ठाईस बार वेदों का विभाजन किया गया| पहले द्वापर में स्वयं ब्रह्मा वेदव्यास हुए, दूसरे में प्रजापति, तीसरे द्वापर में शुक्राचार्य , चौथे में बृहस्पति वेदव्यास हुए| इसी प्रकार सूर्य, मृत्यु, इन्द्र, धनजंय, कृष्ण द्वैपायन अश्वत्थामा आदि अट्ठाईस वेदव्यास हुए| समय-समय पर वेदों का विभाजन किस प्रकार से हुआ, इसके लिए यह एक उदाहरण प्रस्तुत है| कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने ब्रह्मा की प्रेरणा से चार शिष्यों को चार वेद पढ़ाये—
(१) मुनि पैल को ॠग्वेद
(२) वैशंपायन को यजुर्वेद
(३) जैमिनि को सामवेद
(४) सुमन्तु को अथर्ववेद
महर्षि वेदव्यास के ये उत्तराधिकारी पुरुष ही थे , स्त्री नहीं और इनकी जो परम्परा चली वह भी पुरुषों में ही चली , जो अद्यावधि पर्यन्त स्व-स्व शाखाध्यायी ब्राह्मण पुरुषों में विस्तार को प्राप्त होकर व्याप्त है | केवल महर्षि वेदव्यास के साक्षात् शिष्यों अथवा उनकी शिष्य परम्परा में आने वाले पुरुषों को ही व्यास आसन पर बैठने का अधिकार है |
मनुस्मृति ने स्पष्ट किया है कि स्त्रियाँ निरिन्द्रिय, मन्त्ररहिता, असत्यस्वरूपिणी हैं- निरिन्द्रिया ह्यमन्त्राश्च स्त्रियोऽनृतमिति स्थिति:| —मनु० ९/१८
स्त्री पापयोनि है , उसके जन्म का कारण पाप है , इस विषय में गीता का यह श्लोक स्पष्ट प्रमाण है –
हे अर्जुन ! स्त्री, वैश्य, शूद्र या पापयोनि- चाण्डालादि चाहे जो कोई भी हों, वे यदि मेरे आश्रित हो, तो परमगतिको ही प्राप्त होते हैं –
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः |
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् || (- श्रीमद्भगवद्गीता९/ ३२)
आक्षेप – यहाँ ‘पापयोनि’ –यह शब्द स्त्रियों वैश्यों आदि का विशेषण मानना आयुक्त है क्योंकि छान्दोग्योपनिषद् में वैश्य को उत्तमयोनि कहा अतः श्रुति विरुद्ध अर्थ अग्राह्य है |
समाधान – “रमणीयां योनिम्” विशेषण ही कहा है , “पुण्ययोनिम्” नहीं कह दिया है जो शुरू हो गए हो खंडन करने ; गीतोक्त “पापयोनि” का निषेध नहीं हुआ है यहाँ ! पापयोनि शब्द का अर्थ ही तुमको ज्ञात नहीं अन्यथा ये भारी भूल न करते ! स्त्री वैश्य तथा शूद्र के प्रति “पापयोनि” विशेषण की संगति करने वाले आचार्य शंकर स्वयं यहाँ स्पष्ट करते हैं कि द्विजत्व की प्राप्ति में पुण्यत्व नहीं है -ऐसी बात नहीं पुण्यत्व तो है , तभी तो द्विजत्व मिला | इसलिये वे इस मन्त्र पर लिखते हैं – /// रमणीयचरणेनोपलक्षितः शोभनोऽनुशयः पुण्यं कर्म येषां ते रमणीयचरणा: ////, //// ये तु रमणीयचरणा द्विजातयस्ते // आदि (तत्रैव शांकरभाष्य )
……………… अतः ज्ञातव्य ये है कि मानव योनि में जन्म लेने वाला जीव , स्त्री वैश्य और शूद्र – इन तीन के रूप में पाप के प्रभाव से जन्म लेता है और ब्राह्मण – इस योनि में पुण्य के प्रभाव से | याने पूर्वपुण्य का प्रभाव इनको मानव तो बना देता है किन्तु पाप का प्रभाव ही इनको ब्राह्मण पुरुष नहीं बनने देता , ये सिद्धान्त है अन्यथा तो ब्राह्मण ही होते वैश्य या शूद्र क्यों होते ? इसलिए पापयोनि हैं |जन्तूनां नरजन्म दुर्लभमतः पुंस्त्वं ततो विप्रता-इत्यादिपूर्वक यही मर्म भगवान् शंकर ने विवेकचूडामणि में समझाया है अर्थात् संसार में जन्म लेने वालों में पहले तो नर जन्म ही दुर्लभ होता है, फिर पुरुषत्व मिलना दुर्लभ है , मानव जन्म हो गया , पुरुष भी हो गया तो फिर ब्राह्मण होना तो और भी दुर्लभ होता है |
अभी अभिधारणा और दृढ होगी , आगे देखो –
प्रश्न – उत्तम योनि कह दिया तो स्पष्ट है अधम योनि तो है नहीं ! दिन है कह दिया तो स्पष्ट है कि रात नहीं है |
उत्तर – ये तर्क तो तब काम करता जब श्रुति ने पुण्ययोनि विशेषण श्रुति ने दिया होता , सो तो दिया नहीं | तो फिर कैसे कहते हो कि पापयोनि का न होना सिद्ध हुआ ? यहाँ रमणीय विशेषण पर “शास्त्रीयचरणम् आचरणम् कर्मं येषां तथाभूताः ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यसम्बन्धिनीं रमणीयां निजोद्धारक्षमां योनिम् आपद्यन्ते ” ऐसा राघवकृपाभाष्यकार का कथन है , (तत्रैव, राघवकृपाभाष्य पृष्ठ ५६०) याने के जिनको शास्त्रीय आचरणपूर्वक स्वयं का उद्धार करने की सक्षमता है वे हैं रमणीयचरण – ऐसा कह रहे हैं अर्थात् स्पष्ट है कि द्विजत्वप्राप्तिपूर्वक शास्त्रीय विधि-निषेध कासम्पादन करने वाली योनियाँ – ये अभिप्राय राघवकृपाभाष्यकार कहना चाहते हैं| (अर्थात् पुण्ययोनि के स्थान पर शास्त्रीय आचरण में सक्षम योनि -ऐसा अभिप्राय स्वीकृत किया है ) अब बताइये क्या कहोगे ?
पुनश्च यहाँ तो द्विजत्वप्राप्ति में सक्षम या कहिये शास्त्रीयविधिनिषेधों के पालन के अधिकारी योनियों का ही पृथकीकरण हुआ ! तो कहाँ पर गीतोक्त “पापयोनि ” विशेषण का खंडन हुआ है यहाँ भला ? ये पापयोनि द्विजत्व प्राप्ति की अधिकारिणी योनियाँ नहीं हैं ऐसा तो आचार्य शंकर ने कहा नहीं ! (अर्थात् न हैं कहा न नहीं हैं कहा ), वे तो उतना ही बोल रहे हैं जितना कि अखण्डनीय सिद्धान्त है , फिर आक्षेप किस आधार पर ?
पापयोनि, पुण्ययोनि , पापकर्मा , पुण्यकर्मा – प्रत्येक शब्द स्वयं में अलग -अलग अभिप्राय लिए है | पुण्यकर्मा होकर पाप – प्राधान्यत्वेन पापयोनि हो सकता है, पापकर्मा होकर पुण्य-प्राधान्यत्वेन पुण्ययोनि हो सकता है | -ये शास्त्रीय सिद्धान्त है |
अस्तु , आगे चलिए –
क्या ये सिद्धांत है कहीं वर्णित कि द्विजत्व की अधिकारिणी योनि पापयोनि हो ही नहीं सकती ? “पुण्ययोनि” विशेषण यदि द्विजमात्र को प्राप्त हो जावे तब तो आपका मत संगतहो सकता है किन्तु ऐसा भी नहीं ; ये तो केवल ब्राह्मण को ही श्री भगवान द्वारा स्वीकृत है |
किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या ——तत्रैव गीतायाम् ९/३३
यहाँ पुण्या से पुण्ययोनयः – ऐसा ही अर्थ उचित है क्योंकि पीछे से पापयोनि विषयकपूर्वार्ध स्पष्ट हुआ है |
बांकी इस स्त्रियो वैश्यास्तथा० पर वेंकटनाथ वेदान्तदेशिक ने इस श्लोक की व्याख्या पर देखो कैसे समझाते हैं आप हठधर्मियों को –
///त्रैवर्णिकस्य विद्यादिमतोsपि वैश्यस्य शूद्रादिभिः सह पापयोनित्वेन परिगणनं सत्रानधिकारित्वात् /// ……इस प्रकार सविस्तार आप आक्षेपकर्त्ताओं की हठधर्मिता की धज्जियां वेदान्तदेशिकाचार्य ने सविस्तार उडाई ही की है , स्वयं पढ़ना उठाकर ,तुम्हारे लिए इतना संकेत ही बहुत है |
|| जय श्रीराम ||
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पराशर-संहिता के भाष्यकार तथा वैष्णव परंपरा के परम आचार्य मध्वाचार्य जी ने अपनी टीका में लिखा है -“द्विविधा स्त्रियो ब्रह्मवादिन्यः सद्योवधवश्च| तत्र ब्रह्वादिनीनाम् उपनयनम् अग्निबन्धनम् वेदाध्ययनम् स्वगृहे भिक्षा इति, वधूनाम् तु उपस्थिते विवाहे कथंचित् उपनयनं कृत्वा विवाहः कार्यः|” अर्थात् दो प्रकार की स्त्रियाँ होती हैं- एक ब्रह्मवादिनी जिनका उपनयन होता है और जो अग्निहोत्र , वेदाध्ययन तथा अपने घर में भिक्षावृत्ति (घर के लोगों की निष्काम सेवा तथा स्वेच्छा से मिले अन्न-धन से जीवन यापन) करती हैं | दूसरी श्रेणी (सद्योवधु) की स्त्रियाँ वे हैं जिनका शीघ्र ही विवाह होना होता है और इनका भी उपनयन-संस्कार करने के उपरांत ही विवाह करना चाहिए| गोभिलीय गृह्यसूत्र चर्चा आती है :”प्रावृतां यज्ञोपवीतिनीम् अभ्युदानयन् जपेत्, सोमोsददत् गन्धर्वाय इति” अर्थात् कन्या को कपडा पहने हुए, यज्ञोपवीत पहना कर पति के निकट लाकर कहे :”सोमोsददत्”|साथ ही, एक श्लोक है (सन्दर्भ ग्रन्थ मुझे याद नहीं आ रहा) : “पुराकल्पे हि नारीणां मौञ्जीबन्धनमिष्यते| अध्यापनं च वेदानां सावित्रीवाचनं तथा||” अर्थात् प्राचीन-काल में स्त्रियों का यज्ञोपवीत होता था, वे वेद शास्त्रों का अध्ययन करती थीं| ७ वीं शताब्दी में सम्राट हर्षवर्धन की रानी महाश्वेता का वर्णन करते हुए अपने महाकाव्य कादम्बरी में बाणभट्ट ने लिखा है : “ब्रह्मसूत्रेण पवित्रीकृतकायाम्” अर्थात् ब्रह्मसूत्र को धारण करने के कारण पवित्र शरीर वाली | मालवीय जी भी स्त्रियों की वेदादि शिक्षा के प्रबल पक्षधर रहे | लक्ष्मी ने विष्णु भगवान को भागवत सुनाई |ऋग्वेद १०| ८५ में सम्पूर्ण मन्त्रों की ऋषिका ‘सूर्या- सावित्री’ है| ऋषि का अर्थ निरुक्त में इस प्रकार किया है—‘‘ऋषिर्दर्शनात्| स्तोमान् ददर्शेति (२.११)| ऋषयो मन्त्रद्रष्टर: (२.११ दु. वृ.)|’’ अर्थात् मन्त्रों का द्रष्टा उनके रहस्यों को समझकर प्रचार करने वाला ऋषि होता है| ऋग्वेद की ऋषिकाओं की सूची बृहद् देवता के दूसरे अध्याय में इस प्रकार है— घोषा, गोधा, विश्ववारा, अपाला, उपनिषद्, निषद्, ब्रह्मजाया (जुहू), अगस्त्य की भगिनी, अदिति, इन्द्राणी और इन्द्र की माता, सरमा, रोमशा, उर्वशी, लोपामुद्रा और नदियाँ, यमी, शश्वती, श्री, लाक्षा, सार्पराज्ञी, वाक्, श्रद्धा, मेधा, दक्षिणा, रात्री और सूर्या- सावित्री आदि सभी ब्रह्मवादिनी हैं| ऋग्वेद के १०- १३४, १०- ३९, ४०, १०- ९१, १०- ९५, १०- १०७, १०- १०९, १०- १५४, १०- १५९, १०- १८९, ५- २८, ८- ९१ आदि सूक्त की मन्त्रदृष्टा ये ऋषिकाएँ हैं| ऐसे अनेक प्रमाण मिलते हैं, जिनसे स्पष्ट होता है कि स्त्रियाँ भी पुरुषों की तरह वेदाध्ययन व यज्ञ करती और कराती थीं| वे यज्ञ- विद्या और ब्रह्म- विद्या में पारंगत थीं| तैत्तिरीय ब्राह्मण’’ में सोम द्वारा ‘सीता- सावित्री’ ऋषिका को तीन वेद देने का वर्णन विस्तारपूर्वक आता है— तं त्रयो वेदा अन्वसृज्यन्त| अथ ह सीता सावित्री| सोमँ राजानं चकमे| तस्या उ ह त्रीन् वेदान् प्रददौ| -तैत्तिरीय ब्रा०२/३/१०/१,३ इस मन्त्र में बताया गया है कि किस प्रकार सोम ने सीता- सावित्री को तीन वेद दिये|
<<<<<<<<<<<<<<<<|| पाखण्ड की धज्जियां ||>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>
ब्रह्मवादिनी शब्द का अर्थ वेद वादिनी नहीं क्योंकि मन्वादि प्रबल शास्त्रप्रमाणों से उसका सर्वथा निषेध प्राप्त है | ब्रह्म शब्द अनेकार्थावाची होता है इसका अर्थ तप वेद , ब्रह्मा , विप्र प्रजापति (ब्रह्मशब्दं तपो वेदो ब्रह्मा विप्रः) आदि होता है | वैसे भी सामान्य दृष्टि से ब्रह्म + वादिनी = ब्रह्म को कहने वाली यह अर्थ हुआ , ब्रह्म तो वस्तुतः आत्मतत्त्व को कहते हैं आत्मेति तु उपगच्छन्ति ग्राहयन्ति च ब्रह्मसूत्र ४/१/३ ) , यह ॐकारमय वेद भी उसी का वाचक है ( तस्य वाचकः प्रणवः – योगसूत्र १/२७) तूने ये वेदान्तप्रसिद्ध अर्थ क्यों न लिया; वेद ही क्यों लिया बांकी क्यों नहीं ? क्योंकि तुझे मर्कट -उत्पात मचाना है न इसलिए | इतना ही नहीं अपितु अन्न , प्राण , मन , विज्ञान , आनंद , सब को भी प्रसंग प्रकरण से ब्रह्म ही कहते हैं (तैत्तिरीयोप ० भृगुवल्ली ) संस्कृत के किसी भी शब्द का अर्थ करने से पूर्व उसके पूर्वापर प्रकरण , उसके मर्म को , उसके बह्वार्थों को जानना अत्यंत आवश्यक है , अन्यथा वही स्थिति होगी कि भोजनार्थ प्रवृत्त हो रहे व्यक्ति द्वारा नमक मंगाने के लिए सैन्धवमानय ! कहा गया और श्रोता लाया घोड़ा ! (क्योंकि सैन्धव शब्द के नमक और घोडा दो दो अर्थ होते हैं ) अस्तु , उक्त मर्म को समझाने से पूर्व पहले तुम्हारा ध्यान ‘ब्रह्म’ शब्द पर लाते हैं कि ब्रह्म कहते किसको हैं ? इस प्रश्न के उत्तर में स्वयं वेद कहता है कि – ये समस्त प्राणी जिस निरतिशयं निर्विशेषं महत् तत्त्वम् तत्त्व से पैदा होते हैं , जिसमें स्थित रहते और जिस में प्रविष्ट होते हैं , वही जिज्ञास्य तत्त्व ब्रह्म है , उपनिषत्सु प्रतिपादितस्य तत्त्वस्य ‘ब्रह्म’ इति नाम |
यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते | येन जातानि जीवन्ति |
यत् प्रयन्त्यभिसंविशन्ति | तद्विजिज्ञासस्व | तद् ब्रह्मेति || – तैत्तिरीयोपनिषत् ३-१-३
इमानि भूतानि यतो जायन्ते, जातानि येन जीवन्ति, यदेव अभिसंविशन्ति प्रयन्ति, तदेव ब्रह्म,
तदेव विजिज्ञासस्व | अर्थात् – समस्तम् इदम् विश्वं यस्माद् उत्पद्यते, येनैव जीवति, यस्मिन्नेव च लीयते तदेव ब्रह्म | एवं समस्तस्यापि जगतः सृष्टिस्थितिलयकारणभूतं तत्त्वं वेदान्तेषु ब्रह्मशब्देन गीयते | सकलस्यास्य विश्वस्य ब्रह्म उपादानं निमित्तं च कारणं भवति | अतः ब्रह्म नैव कार्यं भवेत् | जगत्कारणत्वेन ब्रह्मण एव प्रतिपादितत्वात् कापिलसांख्यदर्शने प्रतिपादितं प्रधानं वा वैशेषिकदर्शने प्रतिपादितः परमाणुर्वा जगतः कारणं नैव भवति इत्यभिप्रायः ||
अस्तु , अब प्रश्न ये है कि ब्रह्म का ज्ञान कैसे होता है ? अब इसके उत्तर में आगे देखो –
वेद कहता है तपस्या से ब्रह्म को जानो क्योंकि तप ही ब्रह्म है – तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व| तपो ब्रह्मेति| – तैत्तिरीयोपनिषत् / भृगुवल्ली / ० १
अपनी तपस्या से पूर्वकाल में स्त्रियाँ वेद मन्त्रों का साक्षात्कार कर लेतीं थी, उनकी तपस्या क्या है ? स्वधर्म पर चलने से उनको वेद्य तत्त्व का ज्ञान हो जाता था वो तपस्या है स्वधर्मपालन, देव, द्विज, गुरु, प्राज्ञों का पूजन , आर्जव , इन्द्रियों पर निग्रह , अहिंसा , इसी से वे पापदेहा स्त्रियाँ शुद्धता को प्राप्त होती हैं | (देवस्य द्विजस्य आचार्यस्य पण्डितस्य च अर्चनम्, शुद्धता, आर्जवम्, ब्रह्मचर्यम्, अहिंसा च शारीरं तपः इत्युच्यते) –
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् | ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते || (-भगवद्गीता १४/१४ ) ऋषन्ति ज्ञानसंसारयोः पारं गच्छन्ति ऋषयः| ऋषी श गतौ नाम्नीति किः| रिषिर्हसादिश्च| विद्याविदग्धमतयो रिषयः प्रसिद्धाः| इति प्रयोगात्| स्त्रियां ऋषी च| इत्यमरटीकायां भरतः इति हि श्रूयते |अथवा ऋषन्ति अवगच्छन्ति इति ऋषयो मन्त्राः| · ऋषि दर्शनात् (नि०२|१९|१). · स्तोमान् ददर्शेत्यौपमन्यवः| · तद् यद् एतांस्तपस्यमानान् ब्रह्म (वेदं) स्वयम्भवभ्यानर्षत्, त ऋषयोऽभवन्, तद् ऋषिणामृषित्वम्| -निरुक्त २/१९/१ ऋषि गोत्र प्रवर्तक , दीर्घायु , मन्त्रसाक्षात्कर्ता, दिव्यद्रष्टा आदि हुए | दीर्घायुषो मन्त्रकृत ईश्वरा दिव्यचक्षुषः| बुद्धाः प्रत्यक्षधर्माणो गोत्रप्रवर्तकाश्च ये || (वायुपु० पूर्वार्ध ६१/९४ ) ऋषि शब्द का ही स्त्रीत्व विवक्षा में प्रयोग हुआ है ऋषिका , क्यों कहा है ऋषिका ? क्योंकि किसी एक समानधर्म से उसे वह कहा गया , यथा लोक में शौर्य या क्रौर्य आदि किसी सामान धर्म के आधार पर बालक को भी सिंह कह दिया जाता है (सिंहोsयं माणवकः) | क्या समानता है ? समानता है दीर्घायुत्व की , दिव्य-द्रष्टृत्व की , प्रत्यक्षा धर्मा होने की | स्त्रियाँ भी तो दिव्यदर्शिणी हो सकती हैं | किन्तु क्या कभी तुमने किसी ऋषिका के नाम से गोत्र सुना ? नहीं न ! क्यों ? क्या किसी शास्त्र में कभी स्त्रियों की शिष्या परम्परा सुनी ? कोई स्थान विशेष में पाठ शाला पढी , जहां उनको वेदाध्ययन कराया जाता था ? नहीं न ! वो इसलिए क्योंकि उनका ऋषिका होना ऋषियों के मार्ग की भांति न रहा | उनका सिद्धि प्राप्ति का मार्ग दूसरा है | इसी प्रकार वेदोक्य सीता , सावित्री आदि सभी शब्द लौकिक अर्थ तुल्य ग्राह्य नहीं , लौकिक शब्दों तथा वैदिक शब्दों के अर्थ में बहुत भेद होता है | जैसे लोक में कवि शब्द का अर्थ कविता करने वाला होता है किन्तु वेद में त्रिकालज्ञ , लोक में क्रतु का अर्थ यज्ञ होता है किन्तु वेद में इसी शब्द का अर्थ बुद्धि हो जाता है – अग्निर्होता कविक्रतु: (ऋग्वेद , अग्निसूक्त ५ ) वेद के एक ही शब्द का ब्राह्मण ग्रन्थ अनेक अर्थ प्रकाशित करते हैं, विचक्षणता के बिना इसे नहीं समझा जा सकता | बहुभक्तिवादीनि हि ब्राह्मणानि भवन्ति | पृथिवी वैश्वानर:, संवत्सरो वैश्वानरो, ब्राह्मणो वैश्वानर इति” (- निरुक्त ७/७/२४ ) अस्तु ,
शास्त्रकारों का कथन है कि मनुस्मृति के विरुद्ध जो स्मृति वचन है वह प्रशस्त नहीं माना गया है क्योंकि वेदार्थ के अनुसार निबद्ध होने से सर्वप्रथम मनु की मान्यता है (सर्वधर्ममयो मनु : ) , जैसा कि –
मनुस्मृति विरुद्धा या सा स्मृतिर्न प्रशस्यते |
वेदार्थोपनिबद्धत्त्वात् प्राधान्यं हि मनोः स्मृतेः | | तथाहि ——–>
यद् वै किञ्च मनुरवदत् तद् भेषजम् | ( तैत्तिरीय सं०२/२/१०/२)
मनु र्वै यत् किञ्चावदत् तत् भेषज्यायै | (- ताण्ड्य-महाब्रा०२३/१६/१७)
अथापि निष्प्रचमेव मानव्यो हि प्रजाः | ऋग्वे० १/८०/१६ अपि द्रष्टव्यम् |
……..ये तो हो गया पाराशर संहिता पर द्विविधा स्त्रियो ० और “पुराकल्पे हि नारीणां मौञ्जीबन्ध ० आदि का उत्तर |
अब सुनिए ब्रह्मसूत्रेण पवित्रीकृतकायाम् का उत्तर —>
ब्रह्मसूत्र शब्द विविध अर्थों वाला है , ब्रह्म शब्द के अर्थ तप , वेद , ब्रह्मा , विप्र , प्रजापति आदि माने गए हैं | अतः महाश्वेता स्वधर्म पालन रूप तपस्या से ही पवित्र काया हुई थी ऐसा सिद्ध होता है —->
ब्रह्मशब्दं तपो वेदो ब्रह्मा विप्रः प्रजापतिः इति वचनेन अत्र ब्रह्मसूत्रशब्दस्य तपः सूत्रेण पवित्रीकृतकायामिति तात्पर्यं समीचीनम् | बह्वर्थको हि ब्रह्मसूत्रशब्दः, तथाहि यज्ञोपवीतभिन्नार्थे – ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैरिति गीतायाम् |
अब आगे देखिये –
स्त्री का पति ही उसका गुरु है | शास्त्र कहता है –
गुरुरग्निर्द्विजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः |
पतिरेव गुरुः स्त्रीणां सर्वस्याऽभ्यागतो गुरुः ||
(-पद्मपुराण स्वर्ग॰५१/५१, ब्रह्मपुराण ८०/४७ )
अग्नि द्विजातियोँ का गुरु है, ब्राह्मण चारोँ वर्णोँ का गुरु है, एकमात्र पति ही स्त्रियोँ का गुरु है और अतिथि सबका गुरु है |’ स्त्रियों का जनेऊ संस्कार घोर पाखंड है , किं च –
वैवाहिको विधिः स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः स्मृतः |
पतिसेवा गुरौ वासो गृहार्थोँऽग्निपरिक्रिया || (मनुस्मृति २/६७ )
‘स्त्रियोँ के लिये वैवाहिक विधि का पालन ही वैदिक-संस्कार (यज्ञोपवीत), पति की सेवा ही गुरुकुलवास और गृह-कार्य ही अग्निहोत्र कहा गया है |’
इस महामूर्ख मालवीय का परम पूज्य धर्मसम्राट् स्वामि श्री करपात्री जी महाराज ने ऐसा भ्रम भंग किया था कि याद कर गया था | ऋषिकेश में तीन दिन तक अपने सुई से लेकर सब्बल तक के सारे तर्क शास्त्रार्थ में ( जिसके मध्यस्थ जयदयाल गोयन्दका आदि रहे ) इसने प्रस्तुत किये , अंततः इस पाखंडी का वही हाल हुआ जो सिंह की खाल पहने हुए सिंह के सम्मुख आकर उसे ललकारने वाले सियार का होता है | पर बेशर्मों का क्या है भला ! अस्तु ,
लक्ष्मी ने भागवत विष्णु को सुनाई तो भला इससे स्त्रियों के व्यासासन पर भागवत की सिद्धि कैसे हो गयी लक्ष्मी कोइ स्त्री देह धारिणी मानव तो हैं नही , वे तो सबके हृदय मे व्याप्त स्वयं परमात्मतत्त्व हैं, और आत्मा को लौकिक स्त्रियों के तुल्य किसी एक जाति विशेष से जोड़ लेना ही मूर्खता है, ( त्वं स्त्री त्वं पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारीति श्वेताश्वतरोप० ४/३ ) दूसरी बात ये है कि लक्ष्मी भी व्यासासन पर बैठकर विष्णु को भागवत नहीं सुनातीं अपितु भागवती वार्त्ता वे करती हैं , जिसका अभिप्राय है , भगवान की लीला कथाओं का परस्पर संवाद करना | संवाद अलग चीज है और व्यासासन पूर्वक भागवत अनुष्ठान संपन्न करना अलग | स्वयं श्री भगवान् गीता में कहते हैं कि – येषां चित्तं मयि संलग्नं भवति, येषाम् इन्द्रियाणि मयि सन्ति तादृशाः बुधाः भावसमन्विताः अन्योन्यं मां बोधयन्तः कीर्तयन्तः च सदा सन्तोषं प्राप्नुवन्ति, मय्येव च विहरन्ति यथा – –
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् |
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च || (-श्रीमद्भागवद्गीता १०/९ )
वे दृढ निश्चयवाले मेरे भक्तजन निरन्तर मेरे नाम और गुणोंका कीर्तन करते हुए तथा मेरी प्राप्तिके लिये यत्न करते हुए सदा मेरे ध्यानमें युक्त होकर अनन्य प्रेमसे मेरी उपासना करते हैं |
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः |
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते || (-श्रीमद्भागवद्गीता ९/१४)
स्वयं को वेद की अधिकारिणी बना कर जिस भागवत को ये स्त्रियां व्यासासन से सुनाना चाहती है, वह किस मुख से उसका पारायण करती हैं ? क्योंकि स्वयं श्रीमद्भागवत ही उनको अनधिकारिणी बता रही है यथा – स्त्रीशूद्रद्विजबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा| (- श्रीमद्भागवत १/४/२५) महर्षि वेदव्यास से अधिक जानकार तो होंगे नहीं आप !
प्रत्येक द्वापर युग में विष्णु व्यास के रूप में अवतरित होकर वेदों के विभाग प्रस्तुत करते हैं| इस प्रकार अट्ठाईस बार वेदों का विभाजन किया गया| पहले द्वापर में स्वयं ब्रह्मा वेदव्यास हुए, दूसरे में प्रजापति, तीसरे द्वापर में शुक्राचार्य , चौथे में बृहस्पति वेदव्यास हुए| इसी प्रकार सूर्य, मृत्यु, इन्द्र, धनजंय, कृष्ण द्वैपायन अश्वत्थामा आदि अट्ठाईस वेदव्यास हुए| समय-समय पर वेदों का विभाजन किस प्रकार से हुआ, इसके लिए यह एक उदाहरण प्रस्तुत है| कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने ब्रह्मा की प्रेरणा से चार शिष्यों को चार वेद पढ़ाये—
(१) मुनि पैल को ॠग्वेद
(२) वैशंपायन को यजुर्वेद
(३) जैमिनि को सामवेद
(४) सुमन्तु को अथर्ववेद
महर्षि वेदव्यास के ये उत्तराधिकारी पुरुष ही थे , स्त्री नहीं और इनकी जो परम्परा चली वह भी पुरुषों में ही चली , जो अद्यावधि पर्यन्त स्व-स्व शाखाध्यायी ब्राह्मण पुरुषों में विस्तार को प्राप्त होकर व्याप्त है | केवल महर्षि वेदव्यास के साक्षात् शिष्यों अथवा उनकी शिष्य परम्परा में आने वाले पुरुषों को ही व्यास आसन पर बैठने का अधिकार है |
मनुस्मृति ने स्पष्ट किया है कि स्त्रियाँ निरिन्द्रिय, मन्त्ररहिता, असत्यस्वरूपिणी हैं- निरिन्द्रिया ह्यमन्त्राश्च स्त्रियोऽनृतमिति स्थिति:| —मनु० ९/१८
स्त्री पापयोनि है , उसके जन्म का कारण पाप है , इस विषय में गीता का यह श्लोक स्पष्ट प्रमाण है –
हे अर्जुन ! स्त्री, वैश्य, शूद्र या पापयोनि- चाण्डालादि चाहे जो कोई भी हों, वे यदि मेरे आश्रित हो, तो परमगतिको ही प्राप्त होते हैं –
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः |
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् || (- श्रीमद्भगवद्गीता९/ ३२)
आक्षेप – यहाँ ‘पापयोनि’ –यह शब्द स्त्रियों वैश्यों आदि का विशेषण मानना आयुक्त है क्योंकि छान्दोग्योपनिषद् में वैश्य को उत्तमयोनि कहा अतः श्रुति विरुद्ध अर्थ अग्राह्य है |
समाधान – “रमणीयां योनिम्” विशेषण ही कहा है , “पुण्ययोनिम्” नहीं कह दिया है जो शुरू हो गए हो खंडन करने ; गीतोक्त “पापयोनि” का निषेध नहीं हुआ है यहाँ ! पापयोनि शब्द का अर्थ ही तुमको ज्ञात नहीं अन्यथा ये भारी भूल न करते ! स्त्री वैश्य तथा शूद्र के प्रति “पापयोनि” विशेषण की संगति करने वाले आचार्य शंकर स्वयं यहाँ स्पष्ट करते हैं कि द्विजत्व की प्राप्ति में पुण्यत्व नहीं है -ऐसी बात नहीं पुण्यत्व तो है , तभी तो द्विजत्व मिला | इसलिये वे इस मन्त्र पर लिखते हैं – /// रमणीयचरणेनोपलक्षितः शोभनोऽनुशयः पुण्यं कर्म येषां ते रमणीयचरणा: ////, //// ये तु रमणीयचरणा द्विजातयस्ते // आदि (तत्रैव शांकरभाष्य )
……………… अतः ज्ञातव्य ये है कि मानव योनि में जन्म लेने वाला जीव , स्त्री वैश्य और शूद्र – इन तीन के रूप में पाप के प्रभाव से जन्म लेता है और ब्राह्मण – इस योनि में पुण्य के प्रभाव से | याने पूर्वपुण्य का प्रभाव इनको मानव तो बना देता है किन्तु पाप का प्रभाव ही इनको ब्राह्मण पुरुष नहीं बनने देता , ये सिद्धान्त है अन्यथा तो ब्राह्मण ही होते वैश्य या शूद्र क्यों होते ? इसलिए पापयोनि हैं |जन्तूनां नरजन्म दुर्लभमतः पुंस्त्वं ततो विप्रता-इत्यादिपूर्वक यही मर्म भगवान् शंकर ने विवेकचूडामणि में समझाया है अर्थात् संसार में जन्म लेने वालों में पहले तो नर जन्म ही दुर्लभ होता है, फिर पुरुषत्व मिलना दुर्लभ है , मानव जन्म हो गया , पुरुष भी हो गया तो फिर ब्राह्मण होना तो और भी दुर्लभ होता है |
अभी अभिधारणा और दृढ होगी , आगे देखो –
प्रश्न – उत्तम योनि कह दिया तो स्पष्ट है अधम योनि तो है नहीं ! दिन है कह दिया तो स्पष्ट है कि रात नहीं है |
उत्तर – ये तर्क तो तब काम करता जब श्रुति ने पुण्ययोनि विशेषण श्रुति ने दिया होता , सो तो दिया नहीं | तो फिर कैसे कहते हो कि पापयोनि का न होना सिद्ध हुआ ? यहाँ रमणीय विशेषण पर “शास्त्रीयचरणम् आचरणम् कर्मं येषां तथाभूताः ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यसम्बन्धिनीं रमणीयां निजोद्धारक्षमां योनिम् आपद्यन्ते ” ऐसा राघवकृपाभाष्यकार का कथन है , (तत्रैव, राघवकृपाभाष्य पृष्ठ ५६०) याने के जिनको शास्त्रीय आचरणपूर्वक स्वयं का उद्धार करने की सक्षमता है वे हैं रमणीयचरण – ऐसा कह रहे हैं अर्थात् स्पष्ट है कि द्विजत्वप्राप्तिपूर्वक शास्त्रीय विधि-निषेध कासम्पादन करने वाली योनियाँ – ये अभिप्राय राघवकृपाभाष्यकार कहना चाहते हैं| (अर्थात् पुण्ययोनि के स्थान पर शास्त्रीय आचरण में सक्षम योनि -ऐसा अभिप्राय स्वीकृत किया है ) अब बताइये क्या कहोगे ?
पुनश्च यहाँ तो द्विजत्वप्राप्ति में सक्षम या कहिये शास्त्रीयविधिनिषेधों के पालन के अधिकारी योनियों का ही पृथकीकरण हुआ ! तो कहाँ पर गीतोक्त “पापयोनि ” विशेषण का खंडन हुआ है यहाँ भला ? ये पापयोनि द्विजत्व प्राप्ति की अधिकारिणी योनियाँ नहीं हैं ऐसा तो आचार्य शंकर ने कहा नहीं ! (अर्थात् न हैं कहा न नहीं हैं कहा ), वे तो उतना ही बोल रहे हैं जितना कि अखण्डनीय सिद्धान्त है , फिर आक्षेप किस आधार पर ?
पापयोनि, पुण्ययोनि , पापकर्मा , पुण्यकर्मा – प्रत्येक शब्द स्वयं में अलग -अलग अभिप्राय लिए है | पुण्यकर्मा होकर पाप – प्राधान्यत्वेन पापयोनि हो सकता है, पापकर्मा होकर पुण्य-प्राधान्यत्वेन पुण्ययोनि हो सकता है | -ये शास्त्रीय सिद्धान्त है |
अस्तु , आगे चलिए –
क्या ये सिद्धांत है कहीं वर्णित कि द्विजत्व की अधिकारिणी योनि पापयोनि हो ही नहीं सकती ? “पुण्ययोनि” विशेषण यदि द्विजमात्र को प्राप्त हो जावे तब तो आपका मत संगतहो सकता है किन्तु ऐसा भी नहीं ; ये तो केवल ब्राह्मण को ही श्री भगवान द्वारा स्वीकृत है |
किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या ——तत्रैव गीतायाम् ९/३३
यहाँ पुण्या से पुण्ययोनयः – ऐसा ही अर्थ उचित है क्योंकि पीछे से पापयोनि विषयकपूर्वार्ध स्पष्ट हुआ है |
बांकी इस स्त्रियो वैश्यास्तथा० पर वेंकटनाथ वेदान्तदेशिक ने इस श्लोक की व्याख्या पर देखो कैसे समझाते हैं आप हठधर्मियों को –
///त्रैवर्णिकस्य विद्यादिमतोsपि वैश्यस्य शूद्रादिभिः सह पापयोनित्वेन परिगणनं सत्रानधिकारित्वात् /// ……इस प्रकार सविस्तार आप आक्षेपकर्त्ताओं की हठधर्मिता की धज्जियां वेदान्तदेशिकाचार्य ने सविस्तार उडाई ही की है , स्वयं पढ़ना उठाकर ,तुम्हारे लिए इतना संकेत ही बहुत है |
|| जय श्रीराम ||
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सोमवार, 27 अप्रैल 2020
क्या बाल्मीकि रामायण में मिलावट हुई है, क्या सीता परित्याग(पुनः वनगमन) शम्बूक बध कभी हुआ ही नहीं!
क्या सीताजी का पुनः वनगमन नहीं हुआ !
आज यह प्रश्न फिर उठा है, क्योंकि कुछ बड़े सन्तों ने और कवि से राजनेता बने और कथावाचक बनने का प्रयास करने वालों ने कहा , ऐसा हुआ ही नहीं यह मिलावट हुई है । और यदि है तो तुलसीदास जी ने क्यों नहीं लिखा (तो अन्य ग्रंथों में तो लिखा है उसके प्रमाण क्रमशः देंगें)
पर जानते हैं इस पर संदेह फैलाने वाले पहले व्यक्ति
1949 में कामिल बुल्के(पादरी) ने लिखा था बाल्मीकि रामायण में उत्तर काण्ड प्रक्षिप्त(मिलावट है) ! सीता परित्याग/लवकुश का वन में जन्म हुआ ही नहीं । (तर्कों के साथ)
उस समय उत्तर मिला था - वस्तुतः ऐसे कथन उत्तरदायित्व हीन हैं, किसी ठोस प्रमाण के अभाव में किसी भी ग्रंथ के किसी भी अंश को मिलावट कह देना, और उन्हीं अंशों में से अपने स्वार्थानुसार कुछ अंशों को स्वीकार कर लेना साभिप्राय कुतर्क ही है,
कहने वाले से पूछा जाये किसने मिलावट की क्यों की कब की किस वर्ष मास तिथि में तो उत्तर नहीं दे पायेंगे ।
• उत्तर काण्ड (सीता परित्याग इत्यादि ) को प्रक्षिप्त (मिलावट) कह देना, अर्ध कुक्कुटी न्याय है,
• और फिर पूर्णतः तर्कों के साथ इसका खण्डन करने वालेथे ब्रह्मलीन
धर्म सम्राट जगद्गुरु स्वामी श्री करपात्री जी महाराज
आगे क्रमशः प्रमाण मिलेंगे, और जो ऊपर लिखा है उसका भी नि:संदेह प्रमाण मांग सकते हैं ।
क्रमशः ! Share
अब आते हैं, उनके दूसरे तर्क पर
कि बाल्मीकि रामायण में लिखा है, गर्भवती श्री सीता परित्याग/लवकुश का वन में जन्म पर तुलसीदास जी ने नहीं लिखा (इसलिये मानते हैं कि बाल्मीकि रामायण में मिलावट हुई है)
उत्तर - ठीक कहा तुलसीकृत रामचरितमानस में नहीं लिखा पर उसमें बहुत सी बातें नहीं लिखीं, जैसे शत्रुघ्न जी द्वारा लवणासुर को मारकर मथुरा पुरी बसाना आदि। तो क्या यह सभी असत्य है ।
कहाँ लिखा है, यद्यपि यहाँ बाल्मीकि रामायण के प्रमाण नहीं देगें क्योंकि आप उसे प्रक्षिप्त मानते हैं,
• श्रीमद्भागवत नवम् स्कन्ध अध्याय 11, 8 से 11 श्लोकों में देखिये स्पष्ट लिखा है, श्रीराम द्वारा लोकोपवाद के भय से श्री सीता जी का गर्भावस्था में परित्याग, बाल्मीकि आश्रम में ही लवकुश जन्म ।
• अग्निपुराण 11वाँ अध्याय, 10 से 13वें श्लोक तक, उपरोक्त लिखा हुआ स्पष्ट लिखा है ।
• पद्मपुराण पाताल खण्ड, में स्पष्ट रूप से इसी वर्णन के साथ धोबी के पूर्वजन्म व माता सीता को श्राप लगने का वर्णन है श्रीराम अश्वमेध यज्ञ प्रसंग में (संक्षिप्त पद्मपुराण geetaprees page 513-519)
और फिर भी ना मानें तो बतायें, रामायण में 24000 श्लोक हैं, जिनकी संख्या पुराणों में उल्लेखित है, तो यदि 500-600श्लोक मिलावट हैं, तो अब भी संख्या 24000 क्यों,? क्रमशः,,,
तृतीय- श्रीसीता परित्याग(पुनः वन गमन) और लवकुश का जन्म वन में, हुआ ही नहीं, उत्तर काण्ड प्रक्षिप्त (मिलावट) है, ऐसा कुछ विद्वान कहते हैं, --- प्रसंग में क्रमशः,,,,,
पिछले भाग में, पुराणों से प्रमाण दिया कि श्रीसीता परित्याग(धोबी ने अपशब्द कहे) और लवकुश जन्म वन में, यह वहाँ भी लिखा है । अब वो कह सकते हैं, पुराणों में भी मिलावट हो सकती है।
तो आपको ज्ञात होगा महाकवि कालिदास जी द्वारा रचित रघुवंश महाकाव्य में भी यही लिखा है कुछ श्लोक देखते हैं,
यह प्रमाण, 14वें सर्ग के 31 वें श्लोक से प्रारम्भ होकर ,15 वें सर्ग में भी है । वही सब लिखा है सीता परित्याग लवकुश जन्म उत्तर काण्ड,
अब क्या कहेंगे यह भी प्रक्षिप्त है यहाँ भी मिलावट है ? पर
वस्तुतः कोई मिलावट नहीं है, उत्तर काण्ड सहित पुरी बाल्मीकि रामायण वही है, जो बाल्मीकि जी ने लिखी ।
क्रमशः,,,,,
आज यह प्रश्न फिर उठा है, क्योंकि कुछ बड़े सन्तों ने और कवि से राजनेता बने और कथावाचक बनने का प्रयास करने वालों ने कहा , ऐसा हुआ ही नहीं यह मिलावट हुई है । और यदि है तो तुलसीदास जी ने क्यों नहीं लिखा (तो अन्य ग्रंथों में तो लिखा है उसके प्रमाण क्रमशः देंगें)
पर जानते हैं इस पर संदेह फैलाने वाले पहले व्यक्ति
1949 में कामिल बुल्के(पादरी) ने लिखा था बाल्मीकि रामायण में उत्तर काण्ड प्रक्षिप्त(मिलावट है) ! सीता परित्याग/लवकुश का वन में जन्म हुआ ही नहीं । (तर्कों के साथ)
उस समय उत्तर मिला था - वस्तुतः ऐसे कथन उत्तरदायित्व हीन हैं, किसी ठोस प्रमाण के अभाव में किसी भी ग्रंथ के किसी भी अंश को मिलावट कह देना, और उन्हीं अंशों में से अपने स्वार्थानुसार कुछ अंशों को स्वीकार कर लेना साभिप्राय कुतर्क ही है,
कहने वाले से पूछा जाये किसने मिलावट की क्यों की कब की किस वर्ष मास तिथि में तो उत्तर नहीं दे पायेंगे ।
• उत्तर काण्ड (सीता परित्याग इत्यादि ) को प्रक्षिप्त (मिलावट) कह देना, अर्ध कुक्कुटी न्याय है,
• और फिर पूर्णतः तर्कों के साथ इसका खण्डन करने वालेथे ब्रह्मलीन
धर्म सम्राट जगद्गुरु स्वामी श्री करपात्री जी महाराज
आगे क्रमशः प्रमाण मिलेंगे, और जो ऊपर लिखा है उसका भी नि:संदेह प्रमाण मांग सकते हैं ।
क्रमशः ! Share
अब आते हैं, उनके दूसरे तर्क पर
कि बाल्मीकि रामायण में लिखा है, गर्भवती श्री सीता परित्याग/लवकुश का वन में जन्म पर तुलसीदास जी ने नहीं लिखा (इसलिये मानते हैं कि बाल्मीकि रामायण में मिलावट हुई है)
उत्तर - ठीक कहा तुलसीकृत रामचरितमानस में नहीं लिखा पर उसमें बहुत सी बातें नहीं लिखीं, जैसे शत्रुघ्न जी द्वारा लवणासुर को मारकर मथुरा पुरी बसाना आदि। तो क्या यह सभी असत्य है ।
कहाँ लिखा है, यद्यपि यहाँ बाल्मीकि रामायण के प्रमाण नहीं देगें क्योंकि आप उसे प्रक्षिप्त मानते हैं,
• श्रीमद्भागवत नवम् स्कन्ध अध्याय 11, 8 से 11 श्लोकों में देखिये स्पष्ट लिखा है, श्रीराम द्वारा लोकोपवाद के भय से श्री सीता जी का गर्भावस्था में परित्याग, बाल्मीकि आश्रम में ही लवकुश जन्म ।
• अग्निपुराण 11वाँ अध्याय, 10 से 13वें श्लोक तक, उपरोक्त लिखा हुआ स्पष्ट लिखा है ।
• पद्मपुराण पाताल खण्ड, में स्पष्ट रूप से इसी वर्णन के साथ धोबी के पूर्वजन्म व माता सीता को श्राप लगने का वर्णन है श्रीराम अश्वमेध यज्ञ प्रसंग में (संक्षिप्त पद्मपुराण geetaprees page 513-519)
और फिर भी ना मानें तो बतायें, रामायण में 24000 श्लोक हैं, जिनकी संख्या पुराणों में उल्लेखित है, तो यदि 500-600श्लोक मिलावट हैं, तो अब भी संख्या 24000 क्यों,? क्रमशः,,,
तृतीय- श्रीसीता परित्याग(पुनः वन गमन) और लवकुश का जन्म वन में, हुआ ही नहीं, उत्तर काण्ड प्रक्षिप्त (मिलावट) है, ऐसा कुछ विद्वान कहते हैं, --- प्रसंग में क्रमशः,,,,,
पिछले भाग में, पुराणों से प्रमाण दिया कि श्रीसीता परित्याग(धोबी ने अपशब्द कहे) और लवकुश जन्म वन में, यह वहाँ भी लिखा है । अब वो कह सकते हैं, पुराणों में भी मिलावट हो सकती है।
तो आपको ज्ञात होगा महाकवि कालिदास जी द्वारा रचित रघुवंश महाकाव्य में भी यही लिखा है कुछ श्लोक देखते हैं,
यह प्रमाण, 14वें सर्ग के 31 वें श्लोक से प्रारम्भ होकर ,15 वें सर्ग में भी है । वही सब लिखा है सीता परित्याग लवकुश जन्म उत्तर काण्ड,
अब क्या कहेंगे यह भी प्रक्षिप्त है यहाँ भी मिलावट है ? पर
वस्तुतः कोई मिलावट नहीं है, उत्तर काण्ड सहित पुरी बाल्मीकि रामायण वही है, जो बाल्मीकि जी ने लिखी ।
क्रमशः,,,,,
रविवार, 12 अप्रैल 2020
बुधवार, 11 दिसंबर 2019
नष्ट धन/फंसा हुआ धन - वापिस प्राप्ति के लिए श्रीकार्तवीर्यार्जुन (अनुष्ठान मन्त्र)
॥श्रीकार्तवीर्यार्जुनाय नमः ।।
विनियोगः -
ॐ अस्य श्री कार्तवीर्यार्जुनमन्त्रस्य दत्तात्रेय ऋषिः
अनुष्टप् छन्दः श्री कार्तवीर्यार्जुनो देवता कामनासिद्धयर्थे
जपे विनियोगः
करन्यासः -
ॐ दत्तात्रेयप्रियतमाय - अङ्गष्ठाभ्यां नमः
ॐ माहिष्मतीनाथाय. तर्जनीभ्यां नमः
ॐ रेवाजलक्रीडासक्ताय मध्यमाभ्यां नमः
ॐ हैहयाधिपतये अनामिकाभ्यां नमः
ॐ सहस्रबाहवे - कनिष्ठिकाभ्यां नमः
ऊँ दत्तात्रेय प्रियतमाय, माहिष्मतीनाथाय,
रेव्राजलक्रीडासक्ताय, हैहयाधिपतये, सहस्त्रबाहवे नमः,
करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।।
हृदयादिन्यासः -
ऊँ दत्तात्रेयप्रियतमाय - हृदयाय नमः
ॐ माहिष्मतीनाथाय - शिरसे स्वाहा
ॐ रेवाजलक्रीडासक्ताय - शिखायैवषट्
ॐ हैहयाधिपतये - कवचाय हुम्
ॐ सहस्रबाहवे - नेत्रत्रयाय वौषट्
ॐ दत्तात्रेय - प्रियतमाय, माहिष्मतीनाथाय,
रेवाजलक्रीडासक्ताय, हैहयाधिपतये, सहस्त्रबाहवे नमः,अस्त्राय फट् ।
ध्यानम् -
सहस्रबाहुं सशरं सचापं,
रक्ताम्बरं रक्तकिरीटकुण्डलम् ।
चौरादिदुष्टभयनाशनमिष्टदं तं,
वन्दे महाबलविजृम्भितकार्तवीर्यम् ।।
मूलमन्त्र
ॐ नमो भगवते श्री कार्तवीर्यार्जुनाय हैहयनाथाय
कार्तवीर्यार्जुन सहस्रकर - सदृश - सर्व - दुष्टान्तक सर्वानुदधे
आगन्तुकास्मदवस्तुविलुम्पकान् चौरसमूहान् चक्रसहस्रा
कर्षयाकर्षय स्वचापोदगत - बाणसह्रैः भिन्धि भिन्धि,
स्वहस्तोद्गत - मुसलसहस्त्रैर्भीषयभीषय, स्वशङ्खोद्गत
नादिसहस्त्रैन्निकृन्तय निकून्तय त्रासय त्रासय गर्जय गर्जय
आकर्षयाकर्षय भ्रामय भ्रामय मोहय मोहय उन्मादयोन्मादय
तापय तापय विदारय विदारय स्तम्भय स्तम्भय निकृन्तयः
"कृन्तय मारय मारय उत्पाटयोत्पाटय उच्चाटयोच्चाटय विनाशय विनाशय वशीकुरु कुरु चौरसमूहान् सम्यगन्मूलयोन्मूलय हुं फट् स्वाहा ॥
समर्पण-ध्यानम्
दोर्दण्डैकसहस्रसम्मितकरेष्वेतेष्वजस्त्रंदधत्,
कोदण्डं स्वशरैरुदनविशिखैरुद्यद्विवस्वत्प्रभः ।
ब्रह्माण्डं परिपूरयन्स्विदखिलं गण्डस्थलालोलितम्,
द्योतत्कुण्डलमण्डितंविजयतेश्रीकार्तवीर्यार्जुनः।। १ ।।
ॐ कार्तवीर्यार्जुनो नाम राजा बाहुसहस्रभृत् ।
तस्य स्मरणमात्रेण हृतं नष्टञ्च लभ्यते ।।२।।
ॐ कार्तवीर्यः खलद्वेषी कृतवीर्यसुतो बली ।
सहस्रबाहुः शत्रुघ्नो रक्तवासा धनुर्धरः ।। ३ ।।
रक्तगन्धो रक्तमाल्यो राजा स्मर्तुरभीष्टदः)।
द्वादशैतानि नामानि कार्तवीर्यस्य यः पठेत् ।। ४ ।।
अनष्टद्रव्यता तस्य नष्टद्रव्यस्यचागमः ।
सम्पदस्तस्य जायन्ते राजानश्च वशङ्गताः ।।५ ।।
आनयेत्स तु दूरस्थं क्षेमलाभयुतं प्रियम् ।
हैहयाधिपतेः स्तोत्रं सहस्रावर्तितं यदि ।
वाञ्छितार्थफलं दद्यात् शूद्राद्यैर्न श्रुतं यदि ।।६।।
दक्षे पञ्चशतं बाणान् वामे पञ्चशतं धनुः ।
तमेव शरणं प्राप्तः सर्वतो रक्ष रक्ष माम ।। ७ ।।
।। श्रीकार्तवीर्यार्जुनस्तोत्रं सम्पूर्णम्॥॥
किसी ने आपका धन लिया है वापिस नहीं कर रहा है - कहीं किसी कारण वश आपको मिलने वाला धन फंसा हुआ है है, तो यह अनुष्ठान (मन्त्र जप) 11000
किसी (इसकी विधि के जानकार) ब्राह्मण द्वारा कराये जाने पर निश्चित ही उस धन की प्राप्ति होती है ||
नोट- यह कहीं से कापी नहीं किया है लिखने में यदि कुछ त्रुटि रह गई हो तो अवश्य सूचित करें,
धन्यवाद 🙏🙏🙏 ऊँ काली
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नरसिंह कवचम् (सर्वव्याधि विनाशक)
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श्रीनृसिंहकवचम्
ध्यानम्
वागीशा यस्य वदने लक्ष्मीर्यस्य च वक्षसि ।
यस्यास्ते हृदये संवित् तं नृसिंहमहं भजे ।।
श्रीनारदउवाच
इन्द्रादिदेववृन्देश, ईड्येश्वर जगत्पते
महाविष्णो नृसिंहस्य कवचं ब्रूहि मे प्रभो ।।
यस्य प्रपठनाद् विद्वांस्त्रैलोक्यविजयीभवेत्
ब्रह्मोवाच शृणु नारद वक्ष्यामि पुत्र श्रेष्ठ तपोधन ।
कवचं नरसिंहस्य त्रैलोक्यविजयाभिधम् ।।
यस्य प्रपठनाद् वाग्मी त्रैलोक्यविजयी भवेत् ।
स्त्ष्टाऽहं जगतां वत्स पठ्नाद् धारणाद्यतः ।।
लक्ष्मीर्जगत्त्रयं पाति संहर्ता च महेश्वरः ।
पाठाद्धारणाद्देवा बभूवुश्च दिगीश्वराः ।।
ब्रह्ममन्त्रमयं वक्ष्ये भ्रान्त्यादिविनिवारकम् ।
यस्य प्रसादादुर्वासस्त्रैलोक्य विजयो मुनिः ।।
पठनाद्धारणाद्यस्य शास्ता च क्रोध भैरवः ।
त्रैलोक्य विजयस्यास्य कवचस्य प्रजापतिः ॥
ऋषिश्छन्दश्च गायत्री नृसिंहो देवता विभुः ।
चतुर्वर्गे च शान्तौ च विनियोगः प्रकीर्तितः ।।
क्षौं बीजं मे शिरः पातु चन्द्रवर्णोमहामनुः ।।
नृसिंह-कवचम्
अथ मन्त्रः
ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम् ।
नृसिंह भीषणं भद्रं मृत्यु-मृत्युं नमाम्यहम् ।
द्वात्रिंशदक्षरो मन्त्रो मन्त्रराजः सुरद्रुमः ।
कण्ठं पातु ध्रुवं क्षौं हृद् भगवते चक्षुषी मनः ।।
नरसिंहाय च तथाऽग्निनेत्राय च नासिका।
सर्वरक्षोघ्नाय च सर्वभूतहिताय च ।।
सर्वज्वरविनाशाय दह दह पच पच द्वयम् ।
रक्ष रक्ष वर्म चास्त्रं स्वाहा पातु मुखं मम ।।
तारादि रामचन्द्राय नमः पायाद् गुदं मम ।
क्लीं पायाद् भुजयुग्मं च तारं नमः पदन्ततः
नारायणाय पार्श्वञ्च आं ह्रीं क्रौँ छौँ च हुंफट् ।
षडक्षरः कटिं पातु नमो भगवते पदम् ।
वासुदेवाय पृष्ठं क्लीं कृष्णाय क्लीं ऊरु द्वयम् ।।
क्लीं कृष्णाय सदा पातु जानुनी च मनूत्तमः ।
क्लीं ग्लौं क्लीं श्यामलाङ्गाय नमः पायात्पदद्वयम् ।।
क्षौं नृसिंहाय क्षौं च सर्वाङ्गे मे सदावतु ।
फलश्रुति
इति कथितं वत्स सर्वमन्त्रौघविग्रहम् ।
तव स्नेहान्मयाख्यातं प्रवक्तव्यं न कस्यचित् ।
गुरुपूजां विधायाथ गृह्णीयात् कवचं ततः ।
सर्वपुण्ययुतो भूत्वा सर्वसिद्धियुतो भवेत् ।
शतमष्टोत्तरञ्चास्य पुरश्चर्याविधिः स्मृतः ।
हवनादीन् दशांशेन कृत्वा तत्साधयेद् ध्रुवम् ।।
ततस्तु सिद्धकवचः पुण्यात्मा मदनोपमः ।।
स्पद्द्धामुद्धय भवने लक्ष्मीर्वाणी वसेन्मुखे ।।
पुष्पाञ्जल्यष्टकं दत्वा मूलेनैव पठेत् सकृत् ।
अपि वर्षसहस्राणां पूजानां फलमाप्नुयात् ॥
भूर्जे विलिख्य गुटिकां स्वर्णस्थां धारयेद्यदि ।
कण्ठे वा दक्षिणे बाहौ नरसिंहो भवेत् स्वयम् ।।
योषिद् वामभुजे चैव पुरुषो दक्षिणे भुजे ।
विभृयाद् कवचं पुण्यं सर्वसिद्धियुतो भवेत् ।
काकबन्ध्या च या नारी मृतवत्सा च या भवेत् ।
जन्मबन्ध्या नष्टपुष्पा बहुपुत्रवती भवेत् ।।
कवचस्य प्रसादेन जीवन्मुक्तो भवेन्नरः ।
त्रैलोक्यं क्षोभयत्येव त्रैलोक्यविजयी भवेत् ।।
भूतप्रेतपिशाचाश्च राक्षसा दानवाश्च ये ।।
तं दृष्ट्वा प्रपलायन्ते देशाद् देशान्तरं ध्रुवम् ।।
यस्मिन् गेहे च कवचं ग्रामे वा यदि तिष्ठति ।
तं देशन्तु परित्यज्य प्रयान्ति चाति दूरतः ।।
तप्त-हाटक-केशाग्र-ज्वलत्पावकलोचने ।
वज्राधिक-नखस्पर्श-दिव्यसिंह नमोऽस्तुते ।।
|| इति ब्रह्मसंहितायां त्रैलोक्यविजयं श्रीनृसिंहकवचं सम्पूर्णम् ।।
विशेष- इस कवच का पाठ या अनुष्ठान करने से पूर्व गुरु आज्ञा एवं किसी जानकार शास्त्रज्ञ द्वारा सलाह अवश्य लें- निश्चित करलें आप इस कवच को करने के योग्य हैं अथवा नहीं, ,
नोट- यह कहीं से कापी नहीं किया है लिखने में यदि कुछ त्रुटि रह गई हो तो अवश्य सूचित करें,
धन्यवाद
🙏 ॥॥ऊँ काली॥॥
श्रीनृसिंहकवचम्
ध्यानम्
वागीशा यस्य वदने लक्ष्मीर्यस्य च वक्षसि ।
यस्यास्ते हृदये संवित् तं नृसिंहमहं भजे ।।
श्रीनारदउवाच
इन्द्रादिदेववृन्देश, ईड्येश्वर जगत्पते
महाविष्णो नृसिंहस्य कवचं ब्रूहि मे प्रभो ।।
यस्य प्रपठनाद् विद्वांस्त्रैलोक्यविजयीभवेत्
ब्रह्मोवाच शृणु नारद वक्ष्यामि पुत्र श्रेष्ठ तपोधन ।
कवचं नरसिंहस्य त्रैलोक्यविजयाभिधम् ।।
यस्य प्रपठनाद् वाग्मी त्रैलोक्यविजयी भवेत् ।
स्त्ष्टाऽहं जगतां वत्स पठ्नाद् धारणाद्यतः ।।
लक्ष्मीर्जगत्त्रयं पाति संहर्ता च महेश्वरः ।
पाठाद्धारणाद्देवा बभूवुश्च दिगीश्वराः ।।
ब्रह्ममन्त्रमयं वक्ष्ये भ्रान्त्यादिविनिवारकम् ।
यस्य प्रसादादुर्वासस्त्रैलोक्य विजयो मुनिः ।।
पठनाद्धारणाद्यस्य शास्ता च क्रोध भैरवः ।
त्रैलोक्य विजयस्यास्य कवचस्य प्रजापतिः ॥
ऋषिश्छन्दश्च गायत्री नृसिंहो देवता विभुः ।
चतुर्वर्गे च शान्तौ च विनियोगः प्रकीर्तितः ।।
क्षौं बीजं मे शिरः पातु चन्द्रवर्णोमहामनुः ।।
नृसिंह-कवचम्
अथ मन्त्रः
ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम् ।
नृसिंह भीषणं भद्रं मृत्यु-मृत्युं नमाम्यहम् ।
द्वात्रिंशदक्षरो मन्त्रो मन्त्रराजः सुरद्रुमः ।
कण्ठं पातु ध्रुवं क्षौं हृद् भगवते चक्षुषी मनः ।।
नरसिंहाय च तथाऽग्निनेत्राय च नासिका।
सर्वरक्षोघ्नाय च सर्वभूतहिताय च ।।
सर्वज्वरविनाशाय दह दह पच पच द्वयम् ।
रक्ष रक्ष वर्म चास्त्रं स्वाहा पातु मुखं मम ।।
तारादि रामचन्द्राय नमः पायाद् गुदं मम ।
क्लीं पायाद् भुजयुग्मं च तारं नमः पदन्ततः
नारायणाय पार्श्वञ्च आं ह्रीं क्रौँ छौँ च हुंफट् ।
षडक्षरः कटिं पातु नमो भगवते पदम् ।
वासुदेवाय पृष्ठं क्लीं कृष्णाय क्लीं ऊरु द्वयम् ।।
क्लीं कृष्णाय सदा पातु जानुनी च मनूत्तमः ।
क्लीं ग्लौं क्लीं श्यामलाङ्गाय नमः पायात्पदद्वयम् ।।
क्षौं नृसिंहाय क्षौं च सर्वाङ्गे मे सदावतु ।
फलश्रुति
इति कथितं वत्स सर्वमन्त्रौघविग्रहम् ।
तव स्नेहान्मयाख्यातं प्रवक्तव्यं न कस्यचित् ।
गुरुपूजां विधायाथ गृह्णीयात् कवचं ततः ।
सर्वपुण्ययुतो भूत्वा सर्वसिद्धियुतो भवेत् ।
शतमष्टोत्तरञ्चास्य पुरश्चर्याविधिः स्मृतः ।
हवनादीन् दशांशेन कृत्वा तत्साधयेद् ध्रुवम् ।।
ततस्तु सिद्धकवचः पुण्यात्मा मदनोपमः ।।
स्पद्द्धामुद्धय भवने लक्ष्मीर्वाणी वसेन्मुखे ।।
पुष्पाञ्जल्यष्टकं दत्वा मूलेनैव पठेत् सकृत् ।
अपि वर्षसहस्राणां पूजानां फलमाप्नुयात् ॥
भूर्जे विलिख्य गुटिकां स्वर्णस्थां धारयेद्यदि ।
कण्ठे वा दक्षिणे बाहौ नरसिंहो भवेत् स्वयम् ।।
योषिद् वामभुजे चैव पुरुषो दक्षिणे भुजे ।
विभृयाद् कवचं पुण्यं सर्वसिद्धियुतो भवेत् ।
काकबन्ध्या च या नारी मृतवत्सा च या भवेत् ।
जन्मबन्ध्या नष्टपुष्पा बहुपुत्रवती भवेत् ।।
कवचस्य प्रसादेन जीवन्मुक्तो भवेन्नरः ।
त्रैलोक्यं क्षोभयत्येव त्रैलोक्यविजयी भवेत् ।।
भूतप्रेतपिशाचाश्च राक्षसा दानवाश्च ये ।।
तं दृष्ट्वा प्रपलायन्ते देशाद् देशान्तरं ध्रुवम् ।।
यस्मिन् गेहे च कवचं ग्रामे वा यदि तिष्ठति ।
तं देशन्तु परित्यज्य प्रयान्ति चाति दूरतः ।।
तप्त-हाटक-केशाग्र-ज्वलत्पावकलोचने ।
वज्राधिक-नखस्पर्श-दिव्यसिंह नमोऽस्तुते ।।
|| इति ब्रह्मसंहितायां त्रैलोक्यविजयं श्रीनृसिंहकवचं सम्पूर्णम् ।।
विशेष- इस कवच का पाठ या अनुष्ठान करने से पूर्व गुरु आज्ञा एवं किसी जानकार शास्त्रज्ञ द्वारा सलाह अवश्य लें- निश्चित करलें आप इस कवच को करने के योग्य हैं अथवा नहीं, ,
नोट- यह कहीं से कापी नहीं किया है लिखने में यदि कुछ त्रुटि रह गई हो तो अवश्य सूचित करें,
धन्यवाद
🙏 ॥॥ऊँ काली॥॥
गुरुवार, 10 अक्टूबर 2019
रावण महान कहने वाले महामूर्ख !
रावण महान था ! मूर्खता,
माननीय रावण जी की सबसे बड़ी महानता बतायी जाती है कि उन्होंने सीता का अपहरण किया किन्तु इतने संयमी थे कि उनकी इच्छा के बिना उनका स्पर्श नहीं किया ।
अब इस मूर्ख बुद्धि को क्या कहा जाए समझ से परे की बात है | उनकी इच्छा के बिना स्पर्श नही करना चाहता था तो बाँहों में दबाकर घसीटता हुआ अपहरण कैसे किया ? एक स्त्री की इच्छा के बिना उसका स्पर्श नहीं करना चाहता था किन्तु उसकी इच्छा के बिना उसके घर से अपहरण कर के बंदी जरूर बना लिया था | अरे उसने एक वर्ष का समय दिया था, मानसिक रूप से तोड़कर सदैव के लिए अपनी दासी बना कर रखना चाहता था | वो ये भी नही चाहता रहा होगा कि एक छोटी सी गलती के लिए यह आत्महत्या कर ले और सारा प्रयास बेकार जाए |
अब आदरणीय रावण जी के संयम का उदहारण देखिये -
बह्वीनामुत्तंस्त्रीणामाह्रितानामितस्तः
सर्वासामेव भद्रं ते ममाग्र महिषी भव
मैं इधर उधर से बहुत सी सुन्दर स्त्रियों को हर लाया हूँ | उन सबमें तुम मेरी पटरानी बनो |
( रावण देवी सीता से )
- अरण्य काण्ड ४७वाँ सर्ग
धर्म की वह जड ही काट देता था और पराई स्त्रियों के सतीत्व का नाश करने वाला था
-अरण्यकांड ३२वां सर्ग ,
सीता के अलावा जिन हजारों औरतों को हर के लाया उन्हें क्यों नही अशोक वाटिका में रखा ? क्या वे सभी अपहृत नाग ,देव गन्धर्व, किन्नर, मानव, असुर आदि जातियों की औरतों उसके साथ सोने के लिए स्वेच्छा से तैयार थीं ?
जिस रावण को आज के चपड़गंजू महान बताते हैं उसके भय से तीनों लोकों की स्त्रियाँ त्रस्त थीं | मनुष्य तो मनुष्य देवता, यक्ष , गन्धर्व , असुर आदि की स्त्रियों की भी खैर नहीं थी | रावण के लम्पटता की कहानी ये है कि पहले वो शूर्पणखा की नाक का बदला लेने के लिए तैयार नहीं होता है किन्तु जब शूर्पनखा एक प्रोफेशनल दल्ले की तरह उसके सामने वन में आई हुई राजकुमारी के अंग प्रत्यंगों का कामुक वर्णन करती है तो वो देवी सीता के हरण के लिए तुरंत तैयार हो जाता है | ( अरण्य ३४ )
उसकी दुष्टता की कुछ झलकियाँ देखिये -
समाप्ति के निकट पहुँचने वाले यज्ञों को विध्वंश करने वाला ब्राम्हणों की हत्या तथा दुसरे क्रूर कर्म करता था |
- अरण्यकांड ३२वां सर्ग ,
वह इतना उद्दंड हो गया है कि ऋषियों,यक्षों, गन्धर्वों असुरों तथा ब्राम्हणों को पीड़ा देता है उनका अपमान करता है |
वह मूर्ख रावण अपने बढे हुए पराक्रम से देवता गन्धर्व तथा ऋषियों को अत्यंत कष्ट दे रहा है |
उस रौद्र निशाचर ने ऋषियों तथा अप्सराओं को भी पतित कर दिया है |
- बालकाण्ड, पंचदश सर्ग, श्लोक ९,२२,२३
वह तीनों लोकों को पीड़ा देता है और स्त्रियों का भी अपहरण कर लेता है
- बालकाण्ड, षोडश सर्ग , श्लोक ७
वह निशाचर तीनों लोकों के निवाशियों को भयंकर कष्ट दे रहा है |
बालकाण्ड, बीसवां सर्ग श्लोग १७
श्रीराम ! इस वन में रहने वालले वानप्रस्थ महात्माओं का समुदाय, जिसमे अधिकांश ब्राम्हण हैं तथा जिनके रक्षक आप ही हैं उन्हें राक्षसों द्वारा अनाथ की तरह मारा जा रहा है |
आईये देखिये, ये राक्षसों द्वारा मारे गये बहुसंख्यक पुण्यात्मा मुनियों के कंकालों के ढेर दिखाई दे रहे हैं |
पाम्पा सरोवर और उसके निकट बहाने वाली तुंगभद्रा नदी के तट पर जिनका निवास है, जो मन्दाकिनी के किनारे रहते हैं तथा जिन्होंने चित्रकूट को अपना निवास बना लिया है उन सभी ऋषियों महर्षियों का राक्षसों द्वारा भयंकर संहार किया जा रहा है |
-अरण्य काण्ड सप्तम सर्ग
रावण के रूप में सम्पूर्ण दुष्टतायें मूर्त हो गयीं थीं इसलिए लाखों साल से हिन्दू रावण और बुराई को पर्यायवाची मानते आये हैं किन्तु आज बुद्धि भ्रष्ट नीचों को प्रभु श्रीराम के निर्मल चरित्र के स्थान पर रावण अधिक प्रेरणास्पद लगता है |


फिर भी रावण महान लगे किसीको तो ,,🙏



फिर भी रावण महान लगे किसीको तो ,,🙏
रविवार, 29 सितंबर 2019
पाशुपतास्त्र
पाशुपतास्त्र स्तोत्रम
इस पाशुपत स्तोत्र का मात्र एक बार जप करने पर ही मनुष्य समस्त विघ्नों का नाश कर सकता है । सौ बार जप करने पर समस्त उत्पातो को नष्ट कर सकता है तथा युद्ध आदि में विजय प्राप्त के सकता है । इस मंत्र का घी और गुग्गल से हवं करने से मनुष्य असाध्य कार्यो को पूर्ण कर सकता है । इस पाशुपातास्त्र मंत्र के पाठ मात्र से समस्त क्लेशो की शांति हो जाती है ।
स्तोत्रम
ॐ नमो भगवते महापाशुपतायातुलबलवीर्यपराक्रमाय त्रिपन्चनयनाय नानारुपाय नानाप्रहरणोद्यताय सर्वांगडरक्ताय भिन्नांजनचयप्रख्याय श्मशान वेतालप्रियाय सर्वविघ्ननिकृन्तन रताय सर्वसिध्दिप्रदाय भक्तानुकम्पिने असंख्यवक्त्रभुजपादाय तस्मिन् सिध्दाय वेतालवित्रासिने शाकिनीक्षोभ जनकाय व्याधिनिग्रहकारिणे पापभन्जनाय सूर्यसोमाग्नित्राय विष्णु कवचाय खडगवज्रहस्ताय यमदण्डवरुणपाशाय रूद्रशूलाय ज्वलज्जिह्राय सर्वरोगविद्रावणाय ग्रहनिग्रहकारिणे दुष्टनागक्षय कारिणे ।
ॐ कृष्णपिंग्डलाय फट । हूंकारास्त्राय फट । वज्र हस्ताय फट । शक्तये फट । दण्डाय फट । यमाय फट । खडगाय फट । नैऋताय फट । वरुणाय फट । वज्राय फट । पाशाय फट । ध्वजाय फट । अंकुशाय फट । गदायै फट । कुबेराय फट । त्रिशूलाय फट । मुदगराय फट । चक्राय फट । पद्माय फट । नागास्त्राय फट । ईशानाय फट । खेटकास्त्राय फट । मुण्डाय फट । मुण्डास्त्राय फट । काड्कालास्त्राय फट । पिच्छिकास्त्राय फट । क्षुरिकास्त्राय फट । ब्रह्मास्त्राय फट । शक्त्यस्त्राय फट । गणास्त्राय फट । सिध्दास्त्राय फट । पिलिपिच्छास्त्राय फट । गंधर्वास्त्राय फट । पूर्वास्त्रायै फट । दक्षिणास्त्राय फट । वामास्त्राय फट । पश्चिमास्त्राय फट । मंत्रास्त्राय फट । शाकिन्यास्त्राय फट । योगिन्यस्त्राय फट । दण्डास्त्राय फट । महादण्डास्त्राय फट । नमोअस्त्राय फट । शिवास्त्राय फट । ईशानास्त्राय फट । पुरुषास्त्राय फट । अघोरास्त्राय फट । सद्योजातास्त्राय फट । हृदयास्त्राय फट । महास्त्राय फट । गरुडास्त्राय फट । राक्षसास्त्राय फट । दानवास्त्राय फट । क्षौ नरसिन्हास्त्राय फट । त्वष्ट्रास्त्राय फट । सर्वास्त्राय फट । नः फट । वः फट । पः फट । फः फट । मः फट । श्रीः फट । पेः फट । भूः फट । भुवः फट । स्वः फट । महः फट । जनः फट । तपः फट । सत्यं फट । सर्वलोक फट । सर्वपाताल फट । सर्वतत्व फट । सर्वप्राण फट । सर्वनाड़ी फट । सर्वकारण फट । सर्वदेव फट । ह्रीं फट । श्रीं फट । डूं फट । स्त्रुं फट । स्वां फट । लां फट । वैराग्याय फट । मायास्त्राय फट । कामास्त्राय फट । क्षेत्रपालास्त्राय फट । हुंकरास्त्राय फट । भास्करास्त्राय फट । चंद्रास्त्राय फट । विघ्नेश्वरास्त्राय फट । गौः गां फट । स्त्रों स्त्रौं फट । हौं हों फट । भ्रामय भ्रामय फट । संतापय संतापय फट । छादय छादय फट । उन्मूलय उन्मूलय फट । त्रासय त्रासय फट । संजीवय संजीवय फट । विद्रावय विद्रावय फट । सर्वदुरितं नाशय नाशय फट ।
सोमवार, 18 मार्च 2019
हनुमत् ताण्डव...स्तोत्र
श्री हनुमत्ताण्डव स्तोत्रम् ॥
वन्दे सिन्दूरवर्णाभं लोहिताम्बरभूषितम् ।
रक्ताङ्गरागशोभाढ्यं शोणापुच्छं कपीश्वरम्॥
भजे समीरनन्दनं, सुभक्तचित्तरञ्जनं, दिनेशरूपभक्षकं, समस्तभक्तरक्षकम् ।
सुकण्ठकार्यसाधकं, विपक्षपक्षबाधकं, समुद्रपारगामिनं, नमामि सिद्धकामिनम् ॥ १॥
सुशङ्कितं सुकण्ठभुक्तवान् हि यो हितं वचस्त्वमाशु धैर्य्यमाश्रयात्र वो भयं कदापि न ।
इति प्लवङ्गनाथभाषितं निशम्य वानराऽधिनाथ आप शं तदा, स रामदूत आश्रयः ॥ २॥
सुदीर्घबाहुलोचनेन, पुच्छगुच्छशोभिना, भुजद्वयेन सोदरीं निजांसयुग्ममास्थितौ
कृतौ हि कोसलाधिपौ, कपीशराजसन्निधौ, विदहजेशलक्ष्मणौ, स मे शिवं करोत्वरम् ॥ ३॥
सुशब्दशास्त्रपारगं, विलोक्य रामचन्द्रमाः, कपीश नाथसेवकं, समस्तनीतिमार्गगम् ।
प्रशस्य लक्ष्मणं प्रति, प्रलम्बबाहुभूषितः कपीन्द्रसख्यमाकरोत्, स्वकार्यसाधकः प्रभुः ॥ ४॥
प्रचण्डवेगधारिणं, नगेन्द्रगर्वहारिणं, फणीशमातृगर्वहृद्दृशास्यवासनाशकृत् ।
विभीषणेन सख्यकृद्विदेह जातितापहृत्, सुकण्ठकार्यसाधकं, नमामि यातुधतकम् ॥ ५॥
नमामि पुष्पमौलिनं, सुवर्णवर्णधारिणं गदायुधेन भूषितं, किरीटकुण्डलान्वितम् ।
सुपुच्छगुच्छतुच्छलङ्कदाहकं सुनायकं विपक्षपक्षराक्षसेन्द्र-सर्ववंशनाशकम् ॥ ६॥
रघूत्तमस्य सेवकं नमामि लक्ष्मणप्रियं दिनेशवंशभूषणस्य मुद्रीकाप्रदर्शकम् ।
विदेहजातिशोकतापहारिणम् प्रहारिणम् सुसूक्ष्मरूपधारिणं नमामि दीर्घरूपिणम् ॥ ७॥
नभस्वदात्मजेन भास्वता त्वया कृता महासहा यता यया द्वयोर्हितं ह्यभूत्स्वकृत्यतः ।
सुकण्ठ आप तारकां रघूत्तमो विदेहजां निपात्य वालिनं प्रभुस्ततो दशाननं खलम् ॥ ८॥
इमं स्तवं कुजेऽह्नि यः पठेत्सुचेतसा नरः कपीशनाथसेवको भुनक्तिसर्वसम्पदः
प्लवङ्गराजसत्कृपाकताक्षभाजनस्सदा न शत्रुतो भयं भवेत्कदापि तस्य नुस्त्विह ॥ ९॥नेत्राङ्गनन्दधरणीवत्सरेऽनङ्गवासरे ।
लोकेश्वराख्यभट्टेन हनुमत्ताण्डवं कृतम् ॥ १०॥
इति श्री हनुमत्ताण्डव स्तोत्रम्॥
शुक्रवार, 14 दिसंबर 2018
क्या गुरु जिस भाव मैं बैठता है, उस भाव की हानि करता..! नहीं
आज एक जन्म पत्रिका देख रहा था, जो क्षेत्र के प्रसिद्ध ज्योतिषी द्वारा बनाई गई थी,
उन्होंने, मीन लग्न की कुंडली में लग्न में ही बैठा हुआ अकेला बृहस्पति, का फलादेश करते हुए उसे लग्न क्षय करने वाला ही बता दिया,और कैप्सन में लिखा,(स्थान हानि करो जीव:स्थानवृद्धि करो शनि:)
,,,
, , जबकि यह अर्धश्लोक है, पूरा श्लोक है,
"जीव क्षेत्रे यदा शनि:,शनि क्षेत्रे यदा जीव:,
स्थान हानि करो जीव:स्थानवृद्धि करो शनि: ||
अर्थात गुरु के क्षेत्र में शनि हो और शनि के क्षेत्र में गुरु हो,, तब गुरु उस स्थान की हानि करता है और शनि फल वृद्धि...
इसलिए ध्यान रखें, हर जगह गुरु हानिकारक नहीं और हर जगह शनि की स्थिति उस भाव के लिए वृद्धिकारक नहीं होती...
शनिवार, 11 अगस्त 2018
गुरुत्वाकर्षण.
सेक्युलर संस्कृत से क्यों डरते हैं ?
आज हमें पढ़ाया जाता है कि गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त न्यूटन (1642
-1726) ने दिया.
यदि विद्यार्थी संस्कृत पढेंगे तो जान जाएंगे कि
यह झूठ है.
---
प्राचीन भारत के एक प्रसिद्ध गणितज्ञ भास्कराचार्य (1114 –
1185) के द्वारा रचित एक मुख्य ग्रन्थ *सिद्धान्त शिरोमणि* है हैं।
भास्कराचार्य ने अपने सिद्धान्तशिरोमणि में यह कहा है-
.
*आकृष्टिशक्तिश्चमहि तया यत् खस्थं गुरूं स्वाभिमुखं स्वशक्त्या ।*
*आकृष्यते तत् पततीव भाति समे समन्तात् क्व पतत्वियं खे ।।*
– सिद्धान्त० भुवन० १६
.
अर्थात – पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है जिसके कारण वह ऊपर
की भारी वस्तु को अपनी ओर खींच लेती है । वह वस्तु पृथ्वी पर
गिरती हुई सी लगती है । पृथ्वी स्वयं सूर्य आदि के आकर्षण से रुकी हुई है,अतः वह निराधार आकाश में स्थित है तथा अपने स्थान से हटती नहीं
है और न गिरती है । वह अपनी कील पर घूमती है।
-------------------
वराहमिहिर ( 57 BC ) ने अपने ग्रन्थ *पञ्चसिद्धान्तिका*में कहा है-
.
*पंचभमहाभूतमयस्तारा गण पंजरे महीगोलः।*
*खेयस्कान्तान्तःस्थो लोह इवावस्थितो वृत्तः ।।*
– पञ्चसिद्धान्तिका पृ०३१
.
अर्थात- तारासमूहरूपी पंजर में गोल पृथ्वी इसी प्रकार रुकी हुई है जैसे दो बड़े चुम्बकों के बीच में लोहा ।
--------------------
अपने ग्रन्थ सिद्धान्तशेखर में आचार्य श्रीपति ने कहा है –
*उष्णत्वमर्कशिखिनोः शिशिरत्वमिन्दौ,.. निर्हतुरेवमवनेःस्थितिरन्तरिक्षे ।।*
– सिद्धान्तशेखर १५/२१ )
नभस्ययस्कान्तमहामणीनां मध्ये स्थितो लोहगुणो यथास्ते ।
आधारशून्यो पि तथैव सर्वधारो धरित्र्या ध्रुवमेव गोलः ।।
–सिद्धान्तशेखर १५/२२
अर्थात -पृथ्वी की अन्तरिक्ष में स्थिति उसी प्रकार स्वाभाविक है, जैसे सूर्य्य में गर्मी, चन्द्र में शीतलता और वायु में गतिशीलता । दो बड़े चुम्बकों nके बीच में लोहे का गोला स्थिर रहता है, उसी प्रकार पृथ्वी भी अपनी धुरी पर रुकी हुई है ।
ऐसे अनेकों प्रामाणिक उदाहरण हैं परन्तु भारतीयों की भारतीयता के तन्द्रावस्था में लीन होने के कारण प्राचीन भारतीय विज्ञान के स्रोत विलुप्त प्रायः हैं ।
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आज हमें पढ़ाया जाता है कि गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त न्यूटन (1642
-1726) ने दिया.
यदि विद्यार्थी संस्कृत पढेंगे तो जान जाएंगे कि
यह झूठ है.
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प्राचीन भारत के एक प्रसिद्ध गणितज्ञ भास्कराचार्य (1114 –
1185) के द्वारा रचित एक मुख्य ग्रन्थ *सिद्धान्त शिरोमणि* है हैं।
भास्कराचार्य ने अपने सिद्धान्तशिरोमणि में यह कहा है-
.
*आकृष्टिशक्तिश्चमहि तया यत् खस्थं गुरूं स्वाभिमुखं स्वशक्त्या ।*
*आकृष्यते तत् पततीव भाति समे समन्तात् क्व पतत्वियं खे ।।*
– सिद्धान्त० भुवन० १६
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अर्थात – पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है जिसके कारण वह ऊपर
की भारी वस्तु को अपनी ओर खींच लेती है । वह वस्तु पृथ्वी पर
गिरती हुई सी लगती है । पृथ्वी स्वयं सूर्य आदि के आकर्षण से रुकी हुई है,अतः वह निराधार आकाश में स्थित है तथा अपने स्थान से हटती नहीं
है और न गिरती है । वह अपनी कील पर घूमती है।
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वराहमिहिर ( 57 BC ) ने अपने ग्रन्थ *पञ्चसिद्धान्तिका*में कहा है-
.
*पंचभमहाभूतमयस्तारा गण पंजरे महीगोलः।*
*खेयस्कान्तान्तःस्थो लोह इवावस्थितो वृत्तः ।।*
– पञ्चसिद्धान्तिका पृ०३१
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अर्थात- तारासमूहरूपी पंजर में गोल पृथ्वी इसी प्रकार रुकी हुई है जैसे दो बड़े चुम्बकों के बीच में लोहा ।
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अपने ग्रन्थ सिद्धान्तशेखर में आचार्य श्रीपति ने कहा है –
*उष्णत्वमर्कशिखिनोः शिशिरत्वमिन्दौ,.. निर्हतुरेवमवनेःस्थितिरन्तरिक्षे ।।*
– सिद्धान्तशेखर १५/२१ )
नभस्ययस्कान्तमहामणीनां मध्ये स्थितो लोहगुणो यथास्ते ।
आधारशून्यो पि तथैव सर्वधारो धरित्र्या ध्रुवमेव गोलः ।।
–सिद्धान्तशेखर १५/२२
अर्थात -पृथ्वी की अन्तरिक्ष में स्थिति उसी प्रकार स्वाभाविक है, जैसे सूर्य्य में गर्मी, चन्द्र में शीतलता और वायु में गतिशीलता । दो बड़े चुम्बकों nके बीच में लोहे का गोला स्थिर रहता है, उसी प्रकार पृथ्वी भी अपनी धुरी पर रुकी हुई है ।
ऐसे अनेकों प्रामाणिक उदाहरण हैं परन्तु भारतीयों की भारतीयता के तन्द्रावस्था में लीन होने के कारण प्राचीन भारतीय विज्ञान के स्रोत विलुप्त प्रायः हैं ।
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मंगलवार, 3 अप्रैल 2018
शिव वास
शिव वास देखने का सूत्र
शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से अमावस्या तक तिथियों की कुल संख्या 30 होती है । इस तरह से कोई भी मुहूर्त देखने के लिए 1 से 30 तक की संख्या को ही लेना चाहिए ।।
शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से अमावस्या तक तिथियों की कुल संख्या 30 होती है । इस तरह से कोई भी मुहूर्त देखने के लिए 1 से 30 तक की संख्या को ही लेना चाहिए ।।
तिथी च द्विगुणी कृत्वा तामे पञ्च समाजयेत ।।
सप्तभि (मुनिभिः) हरेद्भागं शेषे शिव वाससं ।।
एक शेषे तू कैलाशे, द्वितीये गौरी संनिधौ ।।
तृतीये वृष भारुढौ सभायां च चतुर्थके ।।
पंचमे तू क्रीडायां भोजने च षष्टकं ।।
सप्तमे श्मशाने च शिववास: प्रकीर्तितः ।।
सप्तभि (मुनिभिः) हरेद्भागं शेषे शिव वाससं ।।
एक शेषे तू कैलाशे, द्वितीये गौरी संनिधौ ।।
तृतीये वृष भारुढौ सभायां च चतुर्थके ।।
पंचमे तू क्रीडायां भोजने च षष्टकं ।।
सप्तमे श्मशाने च शिववास: प्रकीर्तितः ।।
अर्थ:- तिथि को दुगुना करें,
उसमे पांच को जोड़ देना चाहिए,
कुल योग में, 7 का भाग देने पर, 1.2.3. शेष बचे तो इच्छा पूर्ति होता है,
शिववास अच्छा बनता है । बाकि बचे तो हानिकारक होता है, शुभ नहीं है ।।
इसे इस प्रकार समझना चाहिए ...
१.कैलाश अर्थात = सुख,
२. गौरिसंग = सुख एवं संपत्ति,
३.वृषभारूढ = अभिष्ट्सिद्धि
, ४.सभा = सन्ताप,
५.भोजन = पीड़ा,
६.क्रीड़ा = कष्ट,
उसमे पांच को जोड़ देना चाहिए,
कुल योग में, 7 का भाग देने पर, 1.2.3. शेष बचे तो इच्छा पूर्ति होता है,
शिववास अच्छा बनता है । बाकि बचे तो हानिकारक होता है, शुभ नहीं है ।।
इसे इस प्रकार समझना चाहिए ...
१.कैलाश अर्थात = सुख,
२. गौरिसंग = सुख एवं संपत्ति,
३.वृषभारूढ = अभिष्ट्सिद्धि
, ४.सभा = सन्ताप,
५.भोजन = पीड़ा,
६.क्रीड़ा = कष्ट,
७.और 0 में श्मशाने = मरण ।।
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मंगलवार, 20 मार्च 2018
कालिका स्तुति, कालिदास कृत
अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते । भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १ ॥
सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २ ॥
अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्ब वनप्रियवासिनि हासरते शिखरि शिरोमणि तुङ्गहिमालय शृङ्गनिजालय मध्यगते । मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ३ ॥
अयि शतखण्ड विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्द गजाधिपते रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते । निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ४ ॥
अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते चतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते । दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदुत कृतान्तमते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ५ ॥
अयि शरणागत वैरिवधुवर वीरवराभय दायकरे त्रिभुवनमस्तक शुलविरोधि शिरोऽधिकृतामल शुलकरे । दुमिदुमितामर धुन्दुभिनादमहोमुखरीकृत दिङ्मकरे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ६ ॥
अयि निजहुङ्कृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशते समरविशोषित शोणितबीज समुद्भवशोणित बीजलते । शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ७ ॥
धनुरनुषङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटके कनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हताबटुके । कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ८ ॥
सुरललना ततथेयि तथेयि कृताभिनयोदर नृत्यरते कृत कुकुथः कुकुथो गडदादिकताल कुतूहल गानरते । धुधुकुट धुक्कुट धिंधिमित ध्वनि धीर मृदंग निनादरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ९ ॥
जय जय जप्य जयेजयशब्द परस्तुति तत्परविश्वनुते झणझणझिञ्झिमि झिङ्कृत नूपुरशिञ्जितमोहित भूतपते । नटित नटार्ध नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १० ॥
अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोहरकान्तियुते श्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते । सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ११ ॥
सहितमहाहव मल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लरते विरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते । शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललिते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १२ ॥
अविरलगण्ड गलन्मदमेदुर मत्तमतङ्ग जराजपते त्रिभुवनभुषण भूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते । अयि सुदतीजन लालसमानस मोहन मन्मथराजसुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १३ ॥
कमलदलामल कोमलकान्ति कलाकलितामल भाललते सकलविलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले । अलिकुलसङ्कुल कुवलयमण्डल मौलिमिलद्बकुलालिकुले जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १४ ॥
करमुरलीरव वीजितकूजित लज्जितकोकिल मञ्जुमते मिलितपुलिन्द मनोहरगुञ्जित रञ्जितशैल निकुञ्जगते । निजगणभूत महाशबरीगण सद्गुणसम्भृत केलितले जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १५ ॥
कटितटपीत दुकूलविचित्र मयुखतिरस्कृत चन्द्ररुचे प्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलसन्नख चन्द्ररुचे जितकनकाचल मौलिमदोर्जित निर्भरकुञ्जर कुम्भकुचे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १६ ॥
विजितसहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुते कृतसुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते । सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते । जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १७ ॥
पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवे अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत् । तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १८ ॥
कनकलसत्कलसिन्धुजलैरनुषिञ्चति तेगुणरङ्गभुवम् भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भसुखानुभवम् । तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवम् जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १९ ॥
तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते किमु पुरुहूतपुरीन्दु मुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते । मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २० ॥
अयि मयि दीन दयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते । यदुचितमत्र भवत्युररीकुरुतादुरुतापमपाकुरुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २१ ॥
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बुधवार, 6 दिसंबर 2017
भैरवस्तोत्र,
सं सं सं संहारमूर्ती शुभ मुकुट जटाशेखरम् चन्द्रबिम्बम्।।
दं दं दं दीर्घकायं विकृतनख मुखं चोर्ध्वरेखा करालं।
पं पं पं पापनाशं प्रणपत सततं भैरवं क्षेत्रपालम्।।1।।
रं रं रं रक्तवर्ण कटक कटितनुं तीक्ष्णदंष्ट्राविशालम्।
घं घं घं घोर घोष घ घ घ घ घर्घरा घोर नादम्।
कं कं कं काल रूपं घगघग घगितं ज्वालितं कामदेहं।
दं दं दं दिव्यदेहं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालम्।।2।।
लं लं लं लम्बदंतं ल ल ल ल लुलितं दीर्घ जिह्वकरालं।
धूं धूं धूं धूम्र वर्ण स्फुट विकृत मुखं मासुरं भीमरूपम्।।
रूं रूं रूं रुण्डमालं रूधिरमय मुखं ताम्रनेत्रं विशालम्।
नं नं नं नग्नरूपं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालम्।।3।।
वं वं वं वायुवेगम प्रलय परिमितं ब्रह्मरूपं स्वरूपम्।खं खं खं खड्ग हस्तं त्रिभुवननिलयं भास्करम् भीमरूपम्।।
चं चं चं चालयन्तं चलचल चलितं चालितं भूत चक्रम्।
मं मं मं मायाकायं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालम्।।4।।
खं खं खं खड्गभेदं विषममृतमयं काल कालांधकारम्।
क्षि क्षि क्षि क्षिप्रवेग दहदह दहन नेत्र संदिप्यमानम्।।
हूं हूं हूं हूंकार शब्दं प्रकटित गहनगर्जित भूमिकम्पं।
बं बं बं बाललील प्रणपत सततं भैरवं क्षेत्रपालम्।।5।।
ॐ तीक्ष्णदंष्ट्र महाकाय कल्पांत दहन प्रभो!
बुधवार, 22 नवंबर 2017
केमुद्रम योग
केमुद्रम योग- ( जिस समय यह योग प्रभावी हो व चन्द्रमा कमजोर पड़े )
नारद पुराण, व अन्य प्राचीन ग्रंथों में इसका उल्लेख है(अाप बेहिचक मुझसे प्रमाण मांग सकते हैं )
किसी कुण्डली में चन्द्रमा से द्वितीय एंव द्वादश स्थान मे जब कोई ग्रह स्थित न हो तो केमुद्रम नाम का दरिद्रतादायक योग बनता है। जब चन्द्रमा किसी ग्रह से युत व दृष्ट न हो और अगले एंव पिछले केन्द्रों में कोई ग्रह स्थित न हो तो भी केमुद्रम नाम के योग का निर्माण होता है।
कारण-
चन्द्रमा जॅहा पर बैठा होता है, उसे चन्द्र लग्न कहते है। धन प्राप्ति में अन्य लग्नों की भाॅति चन्द्र लग्न का विशेष महत्व है। चन्द्र के विषय में यह सिद्धान्त मौलिक रूप से समझ लेना चाहिए कि यदि चन्द्र किसी भी ग्रह के प्रभाव में न हो तो वह निर्बल समझा जाना चाहिए और निर्बल चन्द्र का अर्थ है लग्न का निर्बल होना अर्थात मनुष्य का धन, स्वास्थ्य, यश, बल आदि से वर्जित होना।
सरावली ग्रन्थ में कहा गया है-
कान्तान्नपानगुहवस्त्रसुह्रद्विहीनो,
दारिद्रयदुः खगददैन्यमलैरूपेतः।
प्रेष्यः खलः सकललोकविरूद्धवृतिः,
केमुद्रमे भवति पार्थिववंशजोपि।।
अर्थात यदि कुण्डली में केमुद्रम योग हो तो स्त्री-पुरूष अन्न, पान, गृह, वस्त्र व बन्धुजनों से विहीन होकर दरिद्रता, दुःख, रोग, परतन्त्रता से युक्त, दूसरों से द्वेष करने वाला, दुष्ट एंव दूसरें लोगों का अनिष्ट करने वाला होता है।
बृहत्पाराशर में है
यह योग नारद पुराण में भी वर्णित है ।
यदि यह योग किसी कुंडली मेॆ मिले तो , अग्निपुराणोक्त महामृत्यंजय, १२५००० , नित्य दशांश हवन , तथा श्री यंत्रार्चन , किशमिस द्वारा खुद करें अथवा किसी श्रीविद्या साधक द्वारा करायें . .. ... . जय महाकाल ..
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नारद पुराण, व अन्य प्राचीन ग्रंथों में इसका उल्लेख है(अाप बेहिचक मुझसे प्रमाण मांग सकते हैं )
किसी कुण्डली में चन्द्रमा से द्वितीय एंव द्वादश स्थान मे जब कोई ग्रह स्थित न हो तो केमुद्रम नाम का दरिद्रतादायक योग बनता है। जब चन्द्रमा किसी ग्रह से युत व दृष्ट न हो और अगले एंव पिछले केन्द्रों में कोई ग्रह स्थित न हो तो भी केमुद्रम नाम के योग का निर्माण होता है।
कारण-
चन्द्रमा जॅहा पर बैठा होता है, उसे चन्द्र लग्न कहते है। धन प्राप्ति में अन्य लग्नों की भाॅति चन्द्र लग्न का विशेष महत्व है। चन्द्र के विषय में यह सिद्धान्त मौलिक रूप से समझ लेना चाहिए कि यदि चन्द्र किसी भी ग्रह के प्रभाव में न हो तो वह निर्बल समझा जाना चाहिए और निर्बल चन्द्र का अर्थ है लग्न का निर्बल होना अर्थात मनुष्य का धन, स्वास्थ्य, यश, बल आदि से वर्जित होना।
सरावली ग्रन्थ में कहा गया है-
कान्तान्नपानगुहवस्त्रसुह्रद्विहीनो,
दारिद्रयदुः खगददैन्यमलैरूपेतः।
प्रेष्यः खलः सकललोकविरूद्धवृतिः,
केमुद्रमे भवति पार्थिववंशजोपि।।
अर्थात यदि कुण्डली में केमुद्रम योग हो तो स्त्री-पुरूष अन्न, पान, गृह, वस्त्र व बन्धुजनों से विहीन होकर दरिद्रता, दुःख, रोग, परतन्त्रता से युक्त, दूसरों से द्वेष करने वाला, दुष्ट एंव दूसरें लोगों का अनिष्ट करने वाला होता है।
बृहत्पाराशर में है
यह योग नारद पुराण में भी वर्णित है ।
यदि यह योग किसी कुंडली मेॆ मिले तो , अग्निपुराणोक्त महामृत्यंजय, १२५००० , नित्य दशांश हवन , तथा श्री यंत्रार्चन , किशमिस द्वारा खुद करें अथवा किसी श्रीविद्या साधक द्वारा करायें . .. ... . जय महाकाल ..
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रविवार, 29 अक्टूबर 2017
महाभैरवाष्टकम्
भैरवाष्टकम् ॥
ॐ
यं यं यं यक्षरूपं दशदिशिविदितं भूमिकम्पायमानं
सं सं संहारमूर्तिं शिरमुकुटजटा शेखरंचन्द्रबिम्बम् ।
दं दं दं दीर्घकायं विक्रितनख मुखं चोर्ध्वरोमं करालं
पं पं पं पापनाशं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालम् ॥ १॥
रं रं रं रक्तवर्णं, कटिकटिततनुं तीक्ष्णदंष्ट्राकरालं
घं घं घं घोष घोषं घ घ घ घ घटितं घर्झरं घोरनादम् ।
कं कं कं कालपाशं द्रुक् द्रुक् दृढितं ज्वालितं कामदाहं
तं तं तं दिव्यदेहं, प्रणामत सततं, भैरवं क्षेत्रपालम् ॥ २॥
लं लं लं लं वदन्तं ल ल ल ल ललितं दीर्घ जिह्वा करालं
धूं धूं धूं धूम्रवर्णं स्फुट विकटमुखं भास्करं भीमरूपम् ।
रुं रुं रुं रूण्डमालं, रवितमनियतं ताम्रनेत्रं करालम्
नं नं नं नग्नभूषं , प्रणमत सततं, भैरवं क्षेत्रपालम् ॥ ३॥
वं वं वायुवेगं नतजनसदयं ब्रह्मसारं परन्तं
खं खं खड्गहस्तं त्रिभुवनविलयं भास्करं भीमरूपम् ।
चं चं चलित्वाऽचल चल चलिता चालितं भूमिचक्रं
मं मं मायि रूपं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालम् ॥ ४॥
शं शं शं शङ्खहस्तं, शशिकरधवलं, मोक्ष सम्पूर्ण तेजं
मं मं मं मं महान्तं, कुलमकुलकुलं मन्त्रगुप्तं सुनित्यम् ।
यं यं यं भूतनाथं, किलिकिलिकिलितं बालकेलिप्रदहानं
आं आं आं आन्तरिक्षं , प्रणमत सततं, भैरवं क्षेत्रपालम् ॥ ५॥
खं खं खं खड्गभेदं, विषममृतमयं कालकालं करालं
क्षं क्षं क्षं क्षिप्रवेगं, दहदहदहनं, तप्तसन्दीप्यमानम् ।
हौं हौं हौंकारनादं, प्रकटितगहनं गर्जितैर्भूमिकम्पं
बं बं बं बाललीलं, प्रणमत सततं, भैरवं क्षेत्रपालम् ॥ ६॥
var वं वं वं वाललीलं
सं सं सं सिद्धियोगं, सकलगुणमखं, देवदेवं प्रसन्नं
पं पं पं पद्मनाभं, हरिहरमयनं चन्द्रसूर्याग्नि नेत्रम् ।
ऐं ऐं ऐं ऐश्वर्यनाथं, सततभयहरं, पूर्वदेवस्वरूपं
रौं रौं रौं रौद्ररूपं, प्रणमत सततं, भैरवं क्षेत्रपालम् ॥ ७॥
हं हं हं हंसयानं, हसितकलहकं, मुक्तयोगाट्टहासं, ?
धं धं धं नेत्ररूपं, शिरमुकुटजटाबन्ध बन्धाग्रहस्तम् ।
तं तं तंकानादं, त्रिदशलटलटं, कामगर्वापहारं, ??
भ्रुं भ्रुं भ्रुं भूतनाथं, प्रणमत सततं, भैरवं क्षेत्रपालम् ॥ ८॥
इति महाकालभैरवाष्टकं सम्पूर्णम् ।
नमो भूतनाथं नमो प्रेतनाथं
नमः कालकालं नमः रुद्रमालम् ।
नमः कालिकाप्रेमलोलं करालं
नमो भैरवं काशिकाक्षेत्रपालम् ॥ <iframe style="width:120px;height:240px;" marginwidth="0" marginheight="0" scrolling="no" frameborder="0" src="//ws-in.amazon-adsystem.com/widgets/q?ServiceVersion=20070822&OneJS=1&Operation=GetAdHtml&MarketPlace=IN&source=ac&ref=qf_sp_asin_til&ad_type=product_link&tracking_id=madhavji-21&marketplace=amazon®ion=IN&placement=B06XZVQXGN&asins=B06XZVQXGN&linkId=029d2ea80edd01971d9af37ee1a248fd&show_border=false&link_opens_in_new_window=false&price_color=333333&title_color=0066C0&bg_color=FFFFFF"> </iframe>
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