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बुधवार, 11 दिसंबर 2019

नष्ट धन/फंसा हुआ धन - वापिस प्राप्ति के लिए श्रीकार्तवीर्यार्जुन (अनुष्ठान मन्त्र)

       




                           ॥श्रीकार्तवीर्यार्जुनाय नमः ।।





विनियोगः -
      ॐ अस्य श्री कार्तवीर्यार्जुनमन्त्रस्य दत्तात्रेय ऋषिः
अनुष्टप् छन्दः श्री कार्तवीर्यार्जुनो देवता कामनासिद्धयर्थे
जपे विनियोगः
 
   
करन्यासः -
ॐ दत्तात्रेयप्रियतमाय - अङ्गष्ठाभ्यां नमः
ॐ माहिष्मतीनाथाय. तर्जनीभ्यां नमः
ॐ रेवाजलक्रीडासक्ताय मध्यमाभ्यां नमः
ॐ हैहयाधिपतये अनामिकाभ्यां नमः
ॐ सहस्रबाहवे - कनिष्ठिकाभ्यां नमः
   
       ऊँ दत्तात्रेय प्रियतमाय, माहिष्मतीनाथाय,
रेव्राजलक्रीडासक्ताय, हैहयाधिपतये, सहस्त्रबाहवे नमः,
करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।।
 
   हृदयादिन्यासः -

ऊँ दत्तात्रेयप्रियतमाय - हृदयाय नमः
ॐ माहिष्मतीनाथाय - शिरसे स्वाहा 
ॐ रेवाजलक्रीडासक्ताय - शिखायैवषट्
ॐ हैहयाधिपतये - कवचाय हुम्
ॐ सहस्रबाहवे - नेत्रत्रयाय वौषट्
ॐ दत्तात्रेय - प्रियतमाय, माहिष्मतीनाथाय,
रेवाजलक्रीडासक्ताय, हैहयाधिपतये, सहस्त्रबाहवे नमः,अस्त्राय फट् ।

                      ध्यानम् -

सहस्रबाहुं सशरं सचापं,

             रक्ताम्बरं रक्तकिरीटकुण्डलम् ।
चौरादिदुष्टभयनाशनमिष्टदं तं,

              वन्दे महाबलविजृम्भितकार्तवीर्यम् ।।

मूलमन्त्र

ॐ नमो भगवते श्री कार्तवीर्यार्जुनाय हैहयनाथाय
कार्तवीर्यार्जुन सहस्रकर - सदृश - सर्व - दुष्टान्तक सर्वानुदधे
आगन्तुकास्मदवस्तुविलुम्पकान् चौरसमूहान् चक्रसहस्रा
कर्षयाकर्षय स्वचापोदगत - बाणसह्रैः भिन्धि भिन्धि,
स्वहस्तोद्गत - मुसलसहस्त्रैर्भीषयभीषय, स्वशङ्खोद्गत
नादिसहस्त्रैन्निकृन्तय निकून्तय त्रासय त्रासय गर्जय गर्जय
आकर्षयाकर्षय भ्रामय भ्रामय मोहय मोहय उन्मादयोन्मादय
तापय तापय विदारय विदारय स्तम्भय स्तम्भय निकृन्तयः
"कृन्तय मारय मारय उत्पाटयोत्पाटय   उच्चाटयोच्चाटय विनाशय विनाशय वशीकुरु कुरु चौरसमूहान् सम्यगन्मूलयोन्मूलय हुं फट् स्वाहा ॥

             समर्पण-ध्यानम्
 
दोर्दण्डैकसहस्रसम्मितकरेष्वेतेष्वजस्त्रंदधत्,
कोदण्डं स्वशरैरुदनविशिखैरुद्यद्विवस्वत्प्रभः ।
ब्रह्माण्डं परिपूरयन्स्विदखिलं गण्डस्थलालोलितम्,
द्योतत्कुण्डलमण्डितंविजयतेश्रीकार्तवीर्यार्जुनः।। १ ।।
ॐ कार्तवीर्यार्जुनो नाम राजा बाहुसहस्रभृत् ।
तस्य स्मरणमात्रेण हृतं नष्टञ्च लभ्यते ।।२।।
ॐ कार्तवीर्यः खलद्वेषी कृतवीर्यसुतो बली ।
सहस्रबाहुः शत्रुघ्नो रक्तवासा धनुर्धरः ।। ३ ।।
रक्तगन्धो रक्तमाल्यो राजा स्मर्तुरभीष्टदः)।
द्वादशैतानि नामानि कार्तवीर्यस्य यः पठेत् ।। ४ ।।
अनष्टद्रव्यता तस्य नष्टद्रव्यस्यचागमः ।
सम्पदस्तस्य जायन्ते राजानश्च वशङ्गताः ।।५ ।।
आनयेत्स तु दूरस्थं क्षेमलाभयुतं प्रियम् ।
हैहयाधिपतेः स्तोत्रं सहस्रावर्तितं यदि ।
वाञ्छितार्थफलं दद्यात् शूद्राद्यैर्न श्रुतं यदि ।।६।।
दक्षे पञ्चशतं बाणान् वामे पञ्चशतं धनुः ।
तमेव शरणं प्राप्तः सर्वतो रक्ष रक्ष माम ।। ७ ।।

।। श्रीकार्तवीर्यार्जुनस्तोत्रं सम्पूर्णम्॥॥

    किसी ने आपका धन लिया है वापिस नहीं कर रहा है - कहीं किसी कारण वश आपको मिलने वाला धन फंसा हुआ है है, तो यह अनुष्ठान (मन्त्र जप)  11000 
किसी (इसकी विधि के जानकार) ब्राह्मण द्वारा कराये जाने पर निश्चित ही उस धन की प्राप्ति होती है ||


नोट- यह कहीं से कापी नहीं किया है लिखने में यदि कुछ त्रुटि रह गई हो तो अवश्य सूचित करें, 
      धन्यवाद 🙏🙏🙏 ऊँ काली



नरसिंह कवचम् (सर्वव्याधि विनाशक)

                 
               श्रीनृसिंहकवचम्


 ध्यानम्
             वागीशा यस्य वदने लक्ष्मीर्यस्य च वक्षसि ।
             यस्यास्ते हृदये संवित् तं नृसिंहमहं भजे ।।
 श्रीनारदउवाच

 इन्द्रादिदेववृन्देश, ईड्येश्वर जगत्पते
महाविष्णो नृसिंहस्य कवचं ब्रूहि मे प्रभो ।।
 यस्य प्रपठनाद् विद्वांस्त्रैलोक्यविजयीभवेत्

ब्रह्मोवाच शृणु नारद वक्ष्यामि पुत्र श्रेष्ठ तपोधन ।
 कवचं नरसिंहस्य त्रैलोक्यविजयाभिधम् ।।
यस्य प्रपठनाद् वाग्मी त्रैलोक्यविजयी भवेत् ।
स्त्ष्टाऽहं जगतां वत्स पठ्नाद् धारणाद्यतः ।।
लक्ष्मीर्जगत्त्रयं पाति संहर्ता च महेश्वरः ।
 पाठाद्धारणाद्देवा बभूवुश्च दिगीश्वराः ।।

 ब्रह्ममन्त्रमयं वक्ष्ये भ्रान्त्यादिविनिवारकम् ।
 यस्य प्रसादादुर्वासस्त्रैलोक्य विजयो मुनिः ।।
 पठनाद्धारणाद्यस्य शास्ता च क्रोध भैरवः ।
त्रैलोक्य विजयस्यास्य कवचस्य प्रजापतिः ॥
 ऋषिश्छन्दश्च गायत्री नृसिंहो देवता विभुः ।
चतुर्वर्गे च शान्तौ च विनियोगः प्रकीर्तितः ।।
 क्षौं बीजं मे शिरः पातु चन्द्रवर्णोमहामनुः ।।

 नृसिंह-कवचम्
             अथ मन्त्रः
ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम् ।
 नृसिंह भीषणं भद्रं मृत्यु-मृत्युं नमाम्यहम् ।
 द्वात्रिंशदक्षरो मन्त्रो मन्त्रराजः सुरद्रुमः ।
कण्ठं पातु ध्रुवं क्षौं हृद् भगवते चक्षुषी मनः ।।

नरसिंहाय च तथाऽग्निनेत्राय च नासिका।
 सर्वरक्षोघ्नाय च सर्वभूतहिताय च ।।
सर्वज्वरविनाशाय दह दह पच पच द्वयम् ।
रक्ष रक्ष वर्म चास्त्रं स्वाहा पातु मुखं मम ।।
तारादि रामचन्द्राय नमः पायाद् गुदं मम ।
 क्लीं पायाद् भुजयुग्मं च तारं नमः पदन्ततः
नारायणाय पार्श्वञ्च आं ह्रीं क्रौँ छौँ च हुंफट् ।
 षडक्षरः कटिं पातु नमो भगवते पदम् ।
वासुदेवाय पृष्ठं क्लीं कृष्णाय क्लीं ऊरु द्वयम् ।।
क्लीं कृष्णाय सदा पातु जानुनी च मनूत्तमः ।
क्लीं ग्लौं क्लीं श्यामलाङ्गाय नमः पायात्पदद्वयम् ।।
क्षौं नृसिंहाय क्षौं च सर्वाङ्गे मे सदावतु ।


      फलश्रुति

 इति कथितं वत्स सर्वमन्त्रौघविग्रहम् ।
 तव स्नेहान्मयाख्यातं प्रवक्तव्यं न कस्यचित् ।
 गुरुपूजां विधायाथ गृह्णीयात् कवचं ततः ।
सर्वपुण्ययुतो भूत्वा सर्वसिद्धियुतो भवेत् ।
 शतमष्टोत्तरञ्चास्य पुरश्चर्याविधिः स्मृतः ।
हवनादीन् दशांशेन कृत्वा तत्साधयेद् ध्रुवम् ।।
 ततस्तु सिद्धकवचः पुण्यात्मा मदनोपमः ।।
 स्पद्द्धामुद्धय भवने लक्ष्मीर्वाणी वसेन्मुखे ।।
पुष्पाञ्जल्यष्टकं दत्वा मूलेनैव पठेत् सकृत् ।
 अपि वर्षसहस्राणां पूजानां फलमाप्नुयात् ॥
 भूर्जे विलिख्य गुटिकां स्वर्णस्थां धारयेद्यदि ।
 कण्ठे वा दक्षिणे बाहौ नरसिंहो भवेत् स्वयम् ।।
 योषिद् वामभुजे चैव पुरुषो दक्षिणे भुजे ।
विभृयाद् कवचं पुण्यं सर्वसिद्धियुतो भवेत् ।
 काकबन्ध्या च या नारी मृतवत्सा च या भवेत् ।
जन्मबन्ध्या नष्टपुष्पा बहुपुत्रवती भवेत् ।।
कवचस्य प्रसादेन जीवन्मुक्तो भवेन्नरः ।
त्रैलोक्यं क्षोभयत्येव त्रैलोक्यविजयी भवेत् ।।
 भूतप्रेतपिशाचाश्च राक्षसा दानवाश्च ये ।।
तं दृष्ट्वा प्रपलायन्ते देशाद् देशान्तरं ध्रुवम् ।।
यस्मिन् गेहे च कवचं ग्रामे वा यदि तिष्ठति ।
तं देशन्तु परित्यज्य प्रयान्ति चाति दूरतः ।। 
तप्त-हाटक-केशाग्र-ज्वलत्पावकलोचने ।
वज्राधिक-नखस्पर्श-दिव्यसिंह नमोऽस्तुते ।।

 || इति ब्रह्मसंहितायां त्रैलोक्यविजयं श्रीनृसिंहकवचं सम्पूर्णम् ।।


विशेष-  इस कवच का  पाठ या अनुष्ठान करने से पूर्व गुरु आज्ञा एवं किसी जानकार शास्त्रज्ञ द्वारा सलाह अवश्य लें- निश्चित करलें आप इस कवच को करने के योग्य हैं अथवा नहीं, ,
                 
 नोट- यह कहीं से कापी नहीं किया है लिखने में यदि कुछ त्रुटि रह              गई  हो तो अवश्य सूचित करें,
   
                     धन्यवाद

                               🙏  ॥॥ऊँ काली॥॥

 

गुरुवार, 10 अक्टूबर 2019

रावण महान कहने वाले महामूर्ख !

रावण महान था ! मूर्खता, माननीय रावण जी की सबसे बड़ी महानता बतायी जाती है कि उन्होंने सीता का अपहरण किया किन्तु इतने संयमी थे कि उनकी इच्छा के बिना उनका स्पर्श नहीं किया । अब इस मूर्ख बुद्धि को क्या कहा जाए समझ से परे की बात है | उनकी इच्छा के बिना स्पर्श नही करना चाहता था तो बाँहों में दबाकर घसीटता हुआ अपहरण कैसे किया ? एक स्त्री की इच्छा के बिना उसका स्पर्श नहीं करना चाहता था किन्तु उसकी इच्छा के बिना उसके घर से अपहरण कर के बंदी जरूर बना लिया था | अरे उसने एक वर्ष का समय दिया था, मानसिक रूप से तोड़कर सदैव के लिए अपनी दासी बना कर रखना चाहता था | वो ये भी नही चाहता रहा होगा कि एक छोटी सी गलती के लिए यह आत्महत्या कर ले और सारा प्रयास बेकार जाए | अब आदरणीय रावण जी के संयम का उदहारण देखिये - बह्वीनामुत्तंस्त्रीणामाह्रितानामितस्तः सर्वासामेव भद्रं ते ममाग्र महिषी भव मैं इधर उधर से बहुत सी सुन्दर स्त्रियों को हर लाया हूँ | उन सबमें तुम मेरी पटरानी बनो | ( रावण देवी सीता से ) - अरण्य काण्ड ४७वाँ सर्ग धर्म की वह जड ही काट देता था और पराई स्त्रियों के सतीत्व का नाश करने वाला था -अरण्यकांड ३२वां सर्ग , सीता के अलावा जिन हजारों औरतों को हर के लाया उन्हें क्यों नही अशोक वाटिका में रखा ? क्या वे सभी अपहृत नाग ,देव गन्धर्व, किन्नर, मानव, असुर आदि जातियों की औरतों उसके साथ सोने के लिए स्वेच्छा से तैयार थीं ? जिस रावण को आज के चपड़गंजू महान बताते हैं उसके भय से तीनों लोकों की स्त्रियाँ त्रस्त थीं | मनुष्य तो मनुष्य देवता, यक्ष , गन्धर्व , असुर आदि की स्त्रियों की भी खैर नहीं थी | रावण के लम्पटता की कहानी ये है कि पहले वो शूर्पणखा की नाक का बदला लेने के लिए तैयार नहीं होता है किन्तु जब शूर्पनखा एक प्रोफेशनल दल्ले की तरह उसके सामने वन में आई हुई राजकुमारी के अंग प्रत्यंगों का कामुक वर्णन करती है तो वो देवी सीता के हरण के लिए तुरंत तैयार हो जाता है | ( अरण्य ३४ ) उसकी दुष्टता की कुछ झलकियाँ देखिये - समाप्ति के निकट पहुँचने वाले यज्ञों को विध्वंश करने वाला ब्राम्हणों की हत्या तथा दुसरे क्रूर कर्म करता था | - अरण्यकांड ३२वां सर्ग , वह इतना उद्दंड हो गया है कि ऋषियों,यक्षों, गन्धर्वों असुरों तथा ब्राम्हणों को पीड़ा देता है उनका अपमान करता है | वह मूर्ख रावण अपने बढे हुए पराक्रम से देवता गन्धर्व तथा ऋषियों को अत्यंत कष्ट दे रहा है | उस रौद्र निशाचर ने ऋषियों तथा अप्सराओं को भी पतित कर दिया है | - बालकाण्ड, पंचदश सर्ग, श्लोक ९,२२,२३ वह तीनों लोकों को पीड़ा देता है और स्त्रियों का भी अपहरण कर लेता है - बालकाण्ड, षोडश सर्ग , श्लोक ७ वह निशाचर तीनों लोकों के निवाशियों को भयंकर कष्ट दे रहा है | बालकाण्ड, बीसवां सर्ग श्लोग १७ श्रीराम ! इस वन में रहने वालले वानप्रस्थ महात्माओं का समुदाय, जिसमे अधिकांश ब्राम्हण हैं तथा जिनके रक्षक आप ही हैं उन्हें राक्षसों द्वारा अनाथ की तरह मारा जा रहा है | आईये देखिये, ये राक्षसों द्वारा मारे गये बहुसंख्यक पुण्यात्मा मुनियों के कंकालों के ढेर दिखाई दे रहे हैं | पाम्पा सरोवर और उसके निकट बहाने वाली तुंगभद्रा नदी के तट पर जिनका निवास है, जो मन्दाकिनी के किनारे रहते हैं तथा जिन्होंने चित्रकूट को अपना निवास बना लिया है उन सभी ऋषियों महर्षियों का राक्षसों द्वारा भयंकर संहार किया जा रहा है | -अरण्य काण्ड सप्तम सर्ग रावण के रूप में सम्पूर्ण दुष्टतायें मूर्त हो गयीं थीं इसलिए लाखों साल से हिन्दू रावण और बुराई को पर्यायवाची मानते आये हैं किन्तु आज बुद्धि भ्रष्ट नीचों को प्रभु श्रीराम के निर्मल चरित्र के स्थान पर रावण अधिक प्रेरणास्पद लगता है | फिर भी रावण महान लगे किसीको तो ,,🙏

रविवार, 29 सितंबर 2019

पाशुपतास्त्र

पाशुपतास्त्र स्तोत्रम इस पाशुपत स्तोत्र का मात्र एक बार जप करने पर ही मनुष्य समस्त विघ्नों का नाश कर सकता है । सौ बार जप करने पर समस्त उत्पातो को नष्ट कर सकता है तथा युद्ध आदि में विजय प्राप्त के सकता है । इस मंत्र का घी और गुग्गल से हवं करने से मनुष्य असाध्य कार्यो को पूर्ण कर सकता है । इस पाशुपातास्त्र मंत्र के पाठ मात्र से समस्त क्लेशो की शांति हो जाती है । स्तोत्रम ॐ नमो भगवते महापाशुपतायातुलबलवीर्यपराक्रमाय त्रिपन्चनयनाय नानारुपाय नानाप्रहरणोद्यताय सर्वांगडरक्ताय भिन्नांजनचयप्रख्याय श्मशान वेतालप्रियाय सर्वविघ्ननिकृन्तन रताय सर्वसिध्दिप्रदाय भक्तानुकम्पिने असंख्यवक्त्रभुजपादाय तस्मिन् सिध्दाय वेतालवित्रासिने शाकिनीक्षोभ जनकाय व्याधिनिग्रहकारिणे पापभन्जनाय सूर्यसोमाग्नित्राय विष्णु कवचाय खडगवज्रहस्ताय यमदण्डवरुणपाशाय रूद्रशूलाय ज्वलज्जिह्राय सर्वरोगविद्रावणाय ग्रहनिग्रहकारिणे दुष्टनागक्षय कारिणे । ॐ कृष्णपिंग्डलाय फट । हूंकारास्त्राय फट । वज्र हस्ताय फट । शक्तये फट । दण्डाय फट । यमाय फट । खडगाय फट । नैऋताय फट । वरुणाय फट । वज्राय फट । पाशाय फट । ध्वजाय फट । अंकुशाय फट । गदायै फट । कुबेराय फट । त्रिशूलाय फट । मुदगराय फट । चक्राय फट । पद्माय फट । नागास्त्राय फट । ईशानाय फट । खेटकास्त्राय फट । मुण्डाय फट । मुण्डास्त्राय फट । काड्कालास्त्राय फट । पिच्छिकास्त्राय फट । क्षुरिकास्त्राय फट । ब्रह्मास्त्राय फट । शक्त्यस्त्राय फट । गणास्त्राय फट । सिध्दास्त्राय फट । पिलिपिच्छास्त्राय फट । गंधर्वास्त्राय फट । पूर्वास्त्रायै फट । दक्षिणास्त्राय फट । वामास्त्राय फट । पश्चिमास्त्राय फट । मंत्रास्त्राय फट । शाकिन्यास्त्राय फट । योगिन्यस्त्राय फट । दण्डास्त्राय फट । महादण्डास्त्राय फट । नमोअस्त्राय फट । शिवास्त्राय फट । ईशानास्त्राय फट । पुरुषास्त्राय फट । अघोरास्त्राय फट । सद्योजातास्त्राय फट । हृदयास्त्राय फट । महास्त्राय फट । गरुडास्त्राय फट । राक्षसास्त्राय फट । दानवास्त्राय फट । क्षौ नरसिन्हास्त्राय फट । त्वष्ट्रास्त्राय फट । सर्वास्त्राय फट । नः फट । वः फट । पः फट । फः फट । मः फट । श्रीः फट । पेः फट । भूः फट । भुवः फट । स्वः फट । महः फट । जनः फट । तपः फट । सत्यं फट । सर्वलोक फट । सर्वपाताल फट । सर्वतत्व फट । सर्वप्राण फट । सर्वनाड़ी फट । सर्वकारण फट । सर्वदेव फट । ह्रीं फट । श्रीं फट । डूं फट । स्त्रुं फट । स्वां फट । लां फट । वैराग्याय फट । मायास्त्राय फट । कामास्त्राय फट । क्षेत्रपालास्त्राय फट । हुंकरास्त्राय फट । भास्करास्त्राय फट । चंद्रास्त्राय फट । विघ्नेश्वरास्त्राय फट । गौः गां फट । स्त्रों स्त्रौं फट । हौं हों फट । भ्रामय भ्रामय फट । संतापय संतापय फट । छादय छादय फट । उन्मूलय उन्मूलय फट । त्रासय त्रासय फट । संजीवय संजीवय फट । विद्रावय विद्रावय फट । सर्वदुरितं नाशय नाशय फट ।

सोमवार, 18 मार्च 2019

हनुमत् ताण्डव...स्तोत्र

श्री हनुमत्ताण्डव स्तोत्रम् ॥ वन्दे सिन्दूरवर्णाभं लोहिताम्बरभूषितम् । रक्ताङ्गरागशोभाढ्यं शोणापुच्छं कपीश्वरम्॥ भजे समीरनन्दनं, सुभक्तचित्तरञ्जनं, दिनेशरूपभक्षकं, समस्तभक्तरक्षकम् । सुकण्ठकार्यसाधकं, विपक्षपक्षबाधकं, समुद्रपारगामिनं, नमामि सिद्धकामिनम् ॥ १॥ सुशङ्कितं सुकण्ठभुक्तवान् हि यो हितं वचस्त्वमाशु धैर्य्यमाश्रयात्र वो भयं कदापि न । इति प्लवङ्गनाथभाषितं निशम्य वानराऽधिनाथ आप शं तदा, स रामदूत आश्रयः ॥ २॥ सुदीर्घबाहुलोचनेन, पुच्छगुच्छशोभिना, भुजद्वयेन सोदरीं निजांसयुग्ममास्थितौ कृतौ हि कोसलाधिपौ, कपीशराजसन्निधौ, विदहजेशलक्ष्मणौ, स मे शिवं करोत्वरम् ॥ ३॥ सुशब्दशास्त्रपारगं, विलोक्य रामचन्द्रमाः, कपीश नाथसेवकं, समस्तनीतिमार्गगम् । प्रशस्य लक्ष्मणं प्रति, प्रलम्बबाहुभूषितः कपीन्द्रसख्यमाकरोत्, स्वकार्यसाधकः प्रभुः ॥ ४॥ प्रचण्डवेगधारिणं, नगेन्द्रगर्वहारिणं, फणीशमातृगर्वहृद्दृशास्यवासनाशकृत् । विभीषणेन सख्यकृद्विदेह जातितापहृत्, सुकण्ठकार्यसाधकं, नमामि यातुधतकम् ॥ ५॥ नमामि पुष्पमौलिनं, सुवर्णवर्णधारिणं गदायुधेन भूषितं, किरीटकुण्डलान्वितम् । सुपुच्छगुच्छतुच्छलङ्कदाहकं सुनायकं विपक्षपक्षराक्षसेन्द्र-सर्ववंशनाशकम् ॥ ६॥ रघूत्तमस्य सेवकं नमामि लक्ष्मणप्रियं दिनेशवंशभूषणस्य मुद्रीकाप्रदर्शकम् । विदेहजातिशोकतापहारिणम् प्रहारिणम् सुसूक्ष्मरूपधारिणं नमामि दीर्घरूपिणम् ॥ ७॥ नभस्वदात्मजेन भास्वता त्वया कृता महासहा यता यया द्वयोर्हितं ह्यभूत्स्वकृत्यतः । सुकण्ठ आप तारकां रघूत्तमो विदेहजां निपात्य वालिनं प्रभुस्ततो दशाननं खलम् ॥ ८॥ इमं स्तवं कुजेऽह्नि यः पठेत्सुचेतसा नरः कपीशनाथसेवको भुनक्तिसर्वसम्पदः प्लवङ्गराजसत्कृपाकताक्षभाजनस्सदा न शत्रुतो भयं भवेत्कदापि तस्य नुस्त्विह ॥ ९॥नेत्राङ्गनन्दधरणीवत्सरेऽनङ्गवासरे । लोकेश्वराख्यभट्टेन हनुमत्ताण्डवं कृतम् ॥ १०॥ इति श्री हनुमत्ताण्डव स्तोत्रम्॥